श्रेष्ठ नस्ल ही तो हर हाल में दिखाती है बेहतर प्रदर्शन

पिछले दो-तीन दिनों से यहूदियों की दुष्टता और नीचता के बारे में वामपंथियों, गाँधीवादियों, सेक्युलरों और मुस्लिमों के साथ-साथ कुछ अतिविशिष्ट मेधावान त्रिकालदर्शी हिन्दुत्ववादियों के मुँह से इतना कुछ सुनने को मिला है, कि मैं अभी तक हैरत में हूँ कि इन सब सज्जन संत समूहों ने एक साथ मिल कर अभी तक परमपूज्य प्रातःस्मरणीय स्वर्गीय श्री श्री हिटलर जी महाराज को शांति का नोबेल पुरस्कार क्यूँ नहीं दिलवा दिया!?

ख़ैर, नीच और दुष्ट क़ौम यहूदी के बारे में जो कुछ बातें इस ग़रीब ने यहाँ-वहाँ से सुनी हैं वो निम्नलिखित हैं. याद रहे यह बातें ज़मीनी तौर पर सत्यापित नहीं हैं लेकिन फिर भी इन में से हर एक बात कई स्वतंत्र और भिन्न स्रोतों से सुनी है:

1. यहूदी मत में धर्म परिवर्तन से संख्या वृद्धि बिल्कुल नहीं की जाती, हालाँकि कोई यहूदी किसी दूसरे धर्म में जाना चाहे तो कोई दण्ड भी नहीं है. शायद दुनिया में भीड़ बढ़ा कर इस पर कब्ज़ा जमाने की नीयत ये नहीं रखते और ‘क्वांटिटी’ के बजाय ‘क्वॉलिटी’ के दम पर राज करने में अधिक विश्वास रखते हैं.

2. यहूदियों को ईश्वर की ‘विशेष संतानें’ होने के कारण एक ‘श्रेष्ठ नस्ल’ मानने वाला यह धर्म पिता की अपेक्षा माँ के रक्त को अधिक शक्तिशाली और प्रभुत्वशाली मानता है और नस्ल के आधार के रूप में भी उसी को मान्यता देता है. अतः यदि कोई यहूदी पुरुष किसी ग़ैर-यहूदी स्त्री से शादी कर ले तो उनकी संतानें यहूदी नहीं होंगी, लेकिन यदि कोई यहूदी स्त्री किसी ग़ैर-यहूदी पुरुष से विवाह कर ले, तो उसकी संतानें स्वतः यहूदी के रूप में ही जन्म लेंगी; और

3. अमेरिका में बेहद अमीर और ताक़तवर यहूदियों का वहाँ की धनसत्ता के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा है, और यह समुदाय अनेक स्कूलों का संचालन भी करता है. इन यहूदी संचालित स्कूलों में एक विशिष्ट प्रकार का आरक्षण है. उदाहरणार्थ, यदि किसी ईसाई या मुस्लिम या किसी भी ग़ैर-यहूदी बच्चे को किसी परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक लाने पर प्रथम श्रेणी में मान लिया जाता है, तो उसी स्कूल में पढ़ने वाले यहूदी बच्चे को प्रथम श्रेणी में माने जाने के लिए कम से कम 90 प्रतिशत अंक लाने होंगे. उनका स्पष्ट मानना है कि अगर तुम श्रेष्ठ नस्ल हो तो तुम्हें हर हाल में बाक़ी नस्लों से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर के दिखाना ही होगा.

– अरविन्द कुमार

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