हाथ भी उठाएंगे? कीबोर्ड तो कोई हथियार नहीं होता

आज बंगाल से एक मित्र का फोन आया था. उनके मुताबिक, दंगों को लेकर अब वहाँ एक नए झूठ को गढ़ना शुरू हुआ है. एक-एक मुद्दे को विस्तार से समझेंगे.

1. कुछ कथित स्थानीयों को दिखाया जाता है जो कहते हैं कि हमलावर मुस्लिम बंगालीभाषी नहीं थे. हिन्दी बोल रहे थे, वे बिहारी थे.

2. लोकल लोग नहीं थे, हम किसी को पहचान नहीं सके. कोई परिचित नहीं था.

अब इन दोनों मुद्दों को क्रमवार देखें ?

पहले मुद्दे पर सवाल ये है कि क्या बंगाल में हर हिन्दी बोलने वाला बिहारी ही होता है? कई बंगलादेशी मुसलमान मिल जाते हैं जो ठीक-ठीक हिन्दी बोल लेते हैं. और ये जो लोग बिहारी होने का आरोप लगा रहे हैं वो किस बिनाह पर बोल रहे हैं? कौन सा लहजा या विशिष्ट उच्चारण पकड़ लिया? कितना जानते हैं अलग-अलग लहजों को कि सीधा मुंह उठाए बिहारी पर आरोप लगा लिए ?

दूसरे मुद्दे को देखें – सहसा कोई अपने ही एरिया में गलत काम नहीं करता. टेररिस्ट भी कभी भी लोकल नहीं होता. जो लोग उसका शिकार होते हैं वे या उनके परिजन, कोई भी उसे पहचानते नहीं. पूरे मुहल्ले में कोई भी उसे नहीं जानता – सिवा…….

– अब यह बात दोनों मुद्दों में कॉमन है. सिवा कौन… जो उसका लोकल कांटैक्ट है?

स्लीपर सेल शब्द तो सुना ही होगा? यही स्थानीय संपर्क सूत्र हैं जो टेररिस्ट को या आने वाली भीड़ का मार्गदर्शन करते हैं. टेररिस्ट कभी अंधाधुंध फायरिंग करता है तो मुस्लिम मोहल्ले में नहीं.

आज-कल मुसलमान सभी जगह पर मिल जाते हैं तो कोई मारा जाये तो उसका इलाज नहीं, बल्कि लोकल कौम के लिए उनकी मौत इस्लाम को बरी करने के काम आती है – चंद लोगों के कारण इस्लाम को और सब मुसलमानों को गलत न समझा जाये – टेप सुनी ही होगी?

आने वाले टेररिस्ट की और उसे यहाँ रास्ता दिखाने वाले की विचारधारा क्या इस्लाम नहीं होती? फिर अल्लाह का इस्लाम मुल्ला का इस्लाम का गीत भी बजने लगता है, नहीं क्या?

बंगाल के दंगों की बात कर रहे थे, अगर ये मुसलमान बाहरी थे तो उनको किसने बताए हिंदुओं के घर, दुकान और मारने के लिए हिन्दू? कोई लोकल अल्लाह का बंदा ही होगा ना?

और एक सवाल, ये भीड़ कोई जादुई चिराग घिस कर तो पैदा नहीं की थी. कैसे इतने लोग बिना किसी को खबर होते आ सके, और इतने विध्वंस के बाद कैसे सुरक्षित गायब हो सके और किसी को पता ही नहीं कौन थे, कहाँ से आए, कहाँ गए?

बाकी घर में आसरा देने वाले या फायर ब्रिगेड को फोन करने वाले भाई लोग साथ खड़े हो कर लड़ने का भाईचारा नहीं दिखाये?

इनके पहले यह भी स्क्रिप्ट चलाने की कोशिश हुई – यह सब बीजेपी के कारण हो रहा है नहीं तो हम तो भाई-भाई के तरह रह रहे थे.

एक बात रख रहा हूँ, समझ में आए तो समझ लीजिये – हिंदुओं के पास आत्मरक्षा के लिए भी पर्याप्त संख्याबल नहीं रहता. नौकरी से कोई फ्री नहीं. अब इस सिचुएशन का उल्टा क्या होता है, यह आप समझ सकते हैं. उनके पास हमले के लिए पर्याप्त मात्रा में खाली और attack ready संख्याबल है.

इस्राइल की केवल तारीफ न करें, हालात हमारे भी वहीं है जो उनके थे. हाथ भी उठाएंगे? कीबोर्ड कोई हथियार नहीं होता.

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