खुद को सबसे श्रेष्ठ समझने के दंभ के बीच कटते-पिटते बंगाल के हिन्दू

पश्चिम बंगाल में मुसलमानों द्वारा लगातार दंगे किये जा रहे हैं. सारे देशवासियों की संवेदनाएं बंगाली हिन्दुओं के साथ है. कल टीवी पर देखा एक दंगा पीड़ित बंगाली हिन्दू रोते हुए कह रहा है कि ‘यहाँ हम लोग सब शांति से रहता था. कभी कोई समस्या नहीं हुआ. हम लोग सब प्यार-मोहब्बत से रहता था. कल अचानक मुसलमान लोग हम लोगों पर हमला बोल दिया. सब नष्ट कर दिया. हिंया तोड़ दिया, हुंआ भांग दिया.

उसके व्यवहार से एकदम पता चल रहा था कि ये भी कोई सेक्युलर प्राणी ही है. ये या तो वामपंथी होगा या तृणमूल समर्थक. अरे पुरानी बातों को छोड़ो, जब मालदा में दो लाख मुसलमानों ने दंगा किया तब भी शिक्षा ले लेते. तुम भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था में लग जाते. लेकिन नहीं, ये ऐसा नहीं करेंगे. जब तक इनके घर में आग नहीं लगेगी ये सोते रहेंगे. और ये जब अपनी इज्ज़त लुटा कर होश में भी आयेंगे तो होश में आकर प्रतिकार नहीं करेंगे बल्कि हुंआ से जल्दी से जल्दी दूसरी जगह भागने की फिराक में रहेंगे.

इसके हकन करके रोने से भी मुझे इस पर रत्ती भर भी दया नहीं आयी. मेरा जन्म कोलकाता में हुआ. शिक्षा-दीक्षा सब इन्हीं के बीच रह कर की. जीवन के शुरूआती चौबीस साल इन्हीं के बीच गुज़ारे. मैं भूला नहीं हूँ कि ये हम हिन्दी भाषी लोगों को कितना हेय समझते थे और हम लोगों को ‘हिन्दुस्तानी’ कह कर सम्बोधित करते थे. हमारी तुलना में कोई बंगला भाषी मुसलमान इनके ज्यादा करीब होता था. सेक्युलर कीड़ा इनकी खून में बहता है.

अपने को सबसे श्रेष्ठ समझने का दंभ इनकी तबाही का कारण है. ये आज भी भाजपा को नॉन-बंगाली पार्टी ही मानते हैं, इस कारण दिल से कनेक्ट नहीं हो पाते. तीन दिन पहले बंगाल भाजपा के एक पुराने नेता से बात हो रही थी, दुर्भाग्य से ये पार्टी के आधार हैं. बातों के दौरान ये जनाब कभी भाजपा नेता बन जाते, तो कभी बुद्धि का भंडार श्रेष्ठ बंगाली बन जाते. मुझे समझाने लगे कि बंगाल बुद्धिमान लोगों का जगह है, हिंया हिन्दु-मुसलमान और जय श्री राम करने से कोई वोट नहीं देगा.

उन्हें इस बात का भी दुख था कि बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने जाधवपुर यूनिवर्सिटी के वामपंथी प्रोफेसर को अपमानित क्यों किया? इसे उन्होंने बंगाली शालीनता के खिलाफ माना.

दिलीप दा मेरे सबसे चहेते बंगाली नेताओं में से हैं. मेरे नाना जी के पुराने साथी हैं. उनके खिलाफ सुनना मेरे लिए असहनीय था.

मैंने कहा एग्रेसिव वामपंथ को ममता दीदी ने उसी स्टाईल में एग्रेसिव काडर डेवलप करके हराया. अगर दिलीप दा ऐसा कर रहे हैं तो प्रॉब्लम क्या है?

ये नेताजी बोले, आप लोग नहीं समझ सकता. देखा जब पूरे देश में भाजपा आ गया तब भी बंगाल, त्रिपुरा और केरल में फ्लॉप हो गया.

इतना सुन कर मैं कभी चुप नहीं रह सकता था. पर मैं उनसे नहीं किसी और राष्ट्रवादी बंगाली लीडर से मिलने गया था. ये भी उन्हीं से मिलने आए थे.

मैं किसी बहुत बड़े काम से मीटिंग करने गया था. उन सर से ये मेरी दूसरी मुलाकात थी. वो पहली ही मुलाकात में मझसे अभिभूत हो गए थे. वे मेरे साथ बड़े प्रोजेक्ट पर काम करने का प्लान बना रहे थे, इसी कारण बहुत प्यार से मिलने के लिए बुलाया था.

पूरी टीम का मुझ पर प्रेशर था कि ये प्रोजेक्ट रुकना नहीं चाहिए. इन सब मजबूरियों ने इन नेताजी के सामने मेरा मुँह बन्द करने पर मजबूर कर दिया. तब भी मैंने अपने गुस्सा को छिपाते हुए कहा कि कोलकाता के बड़ा बाजार में ओवर-ब्रिज गिर गया था. उसमें सैकड़ों लोग मर गए थे. पूरी पब्लिक सेंटिमेंट तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ थी, उस सेफ सीट पर आपके बंगाल भाजपा के अध्यक्ष चुनाव लड़ रहे थे. ऊपर से वो सीट हिन्दी भाषी डोमिनेटिंग हैं और आप जैसा घाघ राजनेता उनके इलेक्शन का इन्चार्ज था. फिर भी आप वो सीट हार गए.

इतना सुनते ही वो मुझ पर झल्ला गए. सर ने बीचबचाव करते हुए उसे वहाँ से विदा कर दिया.

ये सिर्फ इन्हीं का हाल नहीं है. इन लोगों ने राजनीति तो दूर की बात है हर छोटे-बड़े संस्थान को गुटबाजी का अड्डा बना दिया है. कुछ राष्ट्रवादी बंगालियों को छोड़ कर सभी का यही हाल है.

जो राष्ट्रवादी बंगाली हैं वे इस बात से चिंतित हैं कि यदि हम बंगाल गंवा देंगे तो फिर संपूर्ण देश में हमें अब वो गौरव और सम्मान कभी नहीं मिल पायेगा. कृपा करके राष्ट्रवादी बंगाली बंधु इस लेख को अपने से ना जोड़ें. आप ही के भरोसे हम लोग ये जंग लड़ रहे हैं.

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