विवेक के क्षण

मैं अनन्त चल चुका
बिन ठौर का पता किए
थकान जन्मों जन्मों की
ना अब के भी मिटा सका
खेद मुझे क्यों न हो.

अनन्त काल चक्र में
क्षण का ही स्वामित्व मिला
भविष्य भूत की सोच में
उसको भी न जी सका
खेद मुझे क्यों न हो.

ना आंनद की बून्द कोई
हृदय की प्यास वही
जरा जन्म वर्तुल से
अवकाश नहीं पा सका
खेद मुझे क्यों न हो.

जो मेरा स्वरूप था
सहज था अनुरूप था
समीप था समीप से
पर उसे ना छू सका
खेद मुझे क्यों न हो.

स्पष्ट था प्रतिबिम्ब सा
श्वास में स्वरबद्ध था
भीतर की भीत पीछे
जो स्वयं उपलब्ध था.
पर बाहर की आंख से
भीतर ना झांक सका
खेद मुझे क्यों न हो.

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