यहूदी राष्ट्रवाद बनाम वैज्ञानिक प्रगति : भारत इज़राइल से क्या सीख सकता है?

आज इज़राइल और यहूदियों पर तमाम बातें होती हैं जिनमें इज़राइली लोगों द्वारा किया गया तकनीकी तथा आर्थिक विकास प्रमुख है. एक छोटे से देश को विश्व में इतना महत्व मिलना अपने आप में अद्भुत है. ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आखिर इज़राइल इतना उन्नत देश कैसे बना? इज़राइल के लोगों की उद्यमशीलता को पूर्व प्रधानमंत्री शिमोन पेरेस कुछ इस तरह परिभाषित करते हैं, “इज़राइल जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से सदैव एक छोटा देश रहेगा. हम कभी बड़ा मार्केट नहीं बन सकते ना ही बड़े-बड़े उद्योग कारखाने लगा सकते हैं. किंतु आकार में बड़ा होने पर जहाँ संख्या का लाभ मिलता है वहीं संख्यात्मक रूप से कम होने पर गुणवत्तापूर्ण कार्य करने के अवसर प्राप्त होते हैं. ऐसे में हमारे पास एक ही चारा था कि हम रचनात्मक गुणवत्ता को लेकर आगे बढ़ें.” शिमोन पेरेस के इस कथन में सकारात्मक प्रवाह है जो किसी समुदाय को अपनी दुर्बलता को शक्ति में परिवर्तित करने का मार्ग दिखाता है. परन्तु मात्र प्रेरक वचन और उत्साहवर्धन ही इज़राइल की उन्नति का कारण नहीं हैं.

इज़राइल यहूदियों का देश है. वही यहूदी जिन्हें जर्मनी की धरती से हिटलर ने लगभग समाप्त ही कर दिया था. जर्मनी की सत्ता पर हिटलर के उदय से पूर्व ही वहाँ के जनमानस में यहूदियों के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न कर दिया गया था. यहूदियों पर कार्टून बनाये जाते, जगह-जगह उन्हें लज्जित किया जाता और उपहास किया जाता था. इसके विरोध में जब यहूदियों ने अपने समुदाय की आवाज बुलंद करने के लिए संगठन बनाये तब 1929 में तत्कालीन जर्मन विदेश मंत्री हेलपैक ने यहूदियों को ‘राष्ट्रवादी’ होने की गाली दी थी. इसके प्रत्युत्तर में अल्बर्ट आइंस्टीन ने हेलपैक को एक पत्र लिखा. उस पत्र में आइंस्टीन ने लिखा था कि “यहूदी समुदाय केवल रिलिजन से ही नहीं अपितु रक्त एवं परम्पराओं से बंधा समाज है. गैर-यहूदी (Gentiles) लोगों का यहूदियों के प्रति दृष्टिकोण इसका प्रमाण है…” आइंस्टीन इस पत्र में आगे बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं, “यहूदियों के साथ यह त्रासदी है कि ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट होने के बाद भी उन्हें एक रखने के लिए किसी समुदाय का सहयोग उपलब्ध नहीं है.

यहूदियों का उद्धार तभी संभव है जब प्रत्येक यहूदी को एक जीवंत समाज से जुड़ने पर व्यक्तिगत शक्ति के रूप में आनंद की अनुभूति हो जो उसे शेष विश्व की नफरत से लड़ने की क्षमता प्रदान करे. मैं गैर-यहूदियों द्वारा यहूदियों का भद्दा मजाक उड़ाते देखता हूँ जो अब बंद होना चाहिए. तब मुझे यह एहसास होता है कि (थियोडोर) हर्ज्ल की वह परिकल्पना जिसमें समस्त यहूदियों को फिलिस्तीन के पास बस जाने की बात कही जाती है सर्वथा उचित प्रतीत होती है.” हेलपैक को उत्तर देते हुए आइंस्टीन आगे लिखते हैं, “आपको यह सब राष्ट्रवाद प्रतीत होता है किन्तु यह एक साम्प्रदायिक प्रयोजन है जिसके बिना हम (यहूदी) इस द्वेषपूर्ण विश्व में न जी सकते हैं न मर सकते हैं. आप इस प्रयोजन को सदैव राष्ट्रवाद जैसे बुरे नाम से संबोधित कर सकते हैं और आरोप लगा सकते हैं परंतु किसी भी परिस्थिति में इस राष्ट्रवाद का ध्येय शक्ति अर्जित करना नहीं अपितु आत्मसम्मान, गरिमा और स्वास्थ्य है. यदि हमें (यहूदियों को) इस ‘असहिष्णु’, संकीर्ण तथा हिंसक विश्व में न रहना होता तो मैं वह प्रथम व्यक्ति होता जो राष्ट्रवाद को वैश्विक मानवता के लिए उखाड़ फेंकता.”

ध्यातव्य है कि अल्बर्ट आइंस्टीन ने जब यह पत्र लिखा उस समय तक वे अपनी रिलेटिविटी थ्योरी के लिए विख्यात तथा बहुत हद तक विवादित वैज्ञानिक बन चुके थे. विज्ञान के इतिहास में आइंस्टीन से अधिक प्रसिद्धि किसी अन्य वैज्ञानिक को नहीं मिली. इज़राइल के प्रथम राष्ट्रपति चैम वेइज़मैन ने प्रोफेसर आइंस्टीन को “महानतम जीवित यहूदी” कहा था. सामान्यतया कला, विज्ञान क्षेत्र के लोग राजनीतिक प्रपंचों से विमुख होते हैं. आइंस्टीन भी ऐसे ही थे; जब उन्हें इज़राइल देश की स्थापना के पश्चात 1952 में वहाँ का राष्ट्रपति बनने का न्योता दिया गया था तो उन्होंने इस प्रस्ताव को विनम्रता से ठुकरा दिया था. परन्तु आइंस्टीन जैसा गैर-राजनीतिक व्यक्ति भी अपने समुदाय, अपने रिलिजन के लोगों के अस्तित्व के प्रति चिंतित था यह उनके लिखे पत्र से स्पष्ट होता है. आइंस्टीन अपने पत्र में डॉ० थियोडोर हर्ज्ल की उस संकल्पना से सहमत होते दीखते हैं जिसमें यह कहा गया था कि एक दिन ‘तनख’ ग्रन्थ में वर्णित पवित्र भूमि जो ईश्वर द्वारा अब्राहम और उसके बेटे और पोते को वचन में दी गयी थी उस पर यहूदियों का राज होगा. शेष विश्व भले ही इसे बाइबिल से पूर्व की कपोल कल्पना मानता हो और आज यरुशलम पर तीन रिलिजन को मानने वाले अधिकार जताते हों; यद्यपि एरिक हॉब्सबॉम सरीखे वामपंथी इतिहासकार यहूदी राष्ट्रवाद को नकार कर यह कहते हों कि इज़राइल की भूमि पर यहूदियों का कब्जा अनधिकृत है तथापि आज इज़राइल की भूमि पर उन्हीं यहूदियों का राज है जो स्वयं को ईश्वर द्वारा विशेष रूप से चयनित मानते हैं.

आज जो इज़राइल हम देखते हैं और तारीफ़ करते नहीं थकते उसके पीछे कई यहूदी विद्वानों तथा वैज्ञानिकों का परिश्रम छुपा है. इनमे से अधिकतर वे हैं जो इज़राइल की स्थापना से पहले यूरोप अमेरिका में जन्मे और नाम कमाया. आधुनिक भौतिकी की बात करें तो आइंस्टीन के अतिरिक्त नील्स बोहर, मैक्स बॉर्न, हान्स बेटा, जॉन वोन न्यूमन इत्यादि के बिना हम आज की तकनीकी उपलब्धियों की कल्पना भी नहीं कर सकते थे. प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड और रिलिजन को अफीम बताने वाले दार्शनिक कार्ल मार्क्स भी मूल रूप से यहूदी ही थे. किसी वैज्ञानिक की उत्पादकता उसके H-index से मापी जाती है. विश्व में सबसे अधिक H-index वाले प्रो० स्टीवन वाईनबर्ग यहूदी हैं. कई यहूदी विद्वानों ने कालांतर में अपना रिलिजन त्याग कर इसाई मत अपना लिया था या नास्तिक हो गये थे परन्तु उनके रक्त में जो सांस्कृतिक धरोहर घुली-मिली थी उससे वे कभी विरक्त नहीं हो पाए. यही कारण है कि जब यहूदियों का देश इज़राइल बना तो उसने विश्व के सभी यहूदियों को अपना नागरिक स्वीकार किया.

भारत में सन 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के पश्चात् हिन्दू राष्ट्रवाद की जो धारा बही है उसके अविरल प्रवाह में कमोबेश वैसी ही बाधाएँ हैं जो किसी जमाने में जर्मनी में यहूदियों के साथ थीं. वे भी संगठित नहीं थे, हम भी नहीं हैं. अपना व्यक्तिगत स्वार्थ हिन्दू समाज को खाए जा रहा है. हमारा इतिहास विकृत कर पढ़ा दिया गया, स्वदेशी तकनीकें ध्वस्त कर दी गयीं, सामाजिक समरसता को जातिगत कोढ़ लग गया. हमारी विराट भूमि क्षत-विक्षत कर सीमित दी गयी जो कभी ईरान से प्रारंभ होकर कम्बोडिया तक जाती थी. यहूदी राष्ट्रवाद तो हिटलर की कुत्सित मानसिकता के चलते एक डेढ़ दशक में उग्र हुआ जिसकी परिणति इज़राइल के रूप में 1948 में सामने आई. किन्तु हिन्दू समाज तो विगत आठ सौ वर्षों से कुचला जा रहा है. यहूदियों की तुलना में हिन्दुओं का क़त्ल-ए-आम कई गुना अधिक किया गया. विडम्बना यह रही कि उस जमाने में नरमुंडों की गिनती करने वाली कोई व्यवस्था अथवा सॉफ्टवेयर उपलब्ध नहीं था. आज एक अख़लाक़ की मृत्यु से खिन्न होकर 1981 में भारत की विज्ञान नीति निर्धारित करने वाले प्रो० पुष्प मित्र भार्गव पुरस्कार लौटा देते हैं किंतु शताब्दियों तक हुए हिन्दुओं के नरसंहार पर उनकी जानकारी नगण्य है. कुछ वर्ष पूर्व टाटा इंस्टिट्यूट के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ ने वैदिक गणित के अस्तित्व को ही नकार दिया था. जिन सवा सौ करोड़ हिन्दुओं के पूर्वज अपनी मिट्टी को छोड़ कर कहीं नहीं गये उसी भारत में आर्य आक्रमण/विस्थापन के नए-नए वैज्ञानिक प्रमाण आज भी नित गढ़े जाते हैं.

भारत में हिन्दू राष्ट्रवाद की लौ जलाए रखनी है तो यहूदियों और उनके परमेश्वर द्वारा वचन में दी गयी भूमि इज़राइल से बहुत कुछ सीखना आवश्यक है. राष्ट्रवाद की लौ में मात्र संस्कृति का तेल जलाने से ही प्रकाश नहीं होगा. इसमें वैज्ञानिक, आर्थिक एवं तकनीकी उद्यम की संयुक्त बाती भी जलनी चाहिए. आज हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाले को अवैज्ञानिक मूढ़ घोषित कर अपमानित किया जाता है. क्या आर्थिक, तकनीकी एवं विज्ञान के विषय पढ़ने वाले हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना साकार करने पर विचार नहीं कर सकते? हिन्दू राष्ट्र का वैचारिक आधार किसी सम्प्रदाय के लोगों को काटना मारना या मतांतरित करना कभी नहीं रहा. यहूदियों के पूर्वज तो उनके लिए कुछ नहीं छोड़ गए थे फिर भी पिछली शताब्दी यहूदी वैज्ञानिकों की ऋणी रही है. हम हिन्दुओं पास तो फिर भी ज्ञान विज्ञान का प्राचीन प्रचुर भंडार है हम इसका समुचित उपयोग क्यों नहीं कर पा रहे हैं इस पर विचार करें. आज वामपंथी विचारक हमें सिखाते हैं कि अपनी प्राचीन संस्कृति और धर्म की बात करना गुनाह है और यह वैज्ञानिक प्रगति में बाधक है. यदि आइंस्टीन के समय और उनके बाद यहूदियों ने इस सिद्धांत को अपनाया होता तो आज इज़राइल सिर ऊंचा कर खड़ा न होता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारी बढ़ती हुई जनसंख्या को गुणवत्तापूर्ण कौशल प्रदान करने की बात कहते हैं. प्रधानमंत्री के इस स्वप्न को राष्ट्रवाद के मूल्यों द्वारा ही पोषित और साकार किया जा सकता है. ऐसा राष्ट्रवाद जिसमें न केवल सांस्कृतिक अपितु आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, सैन्य तथा तकनीकी मूल्यों को भी वरीयता दी जाए.

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