देश को गृह युद्ध में झोंकना ही है मकसद, कश्मीर में तो पहले ही कामयाब हैं ‘वो’

किसी भी के साथ कोई हादसा या किसी की भी हत्या सर्वदा दुखद ही होता है. वह चाहे किसी भी समाज का, किसी भी वर्ग का हो. लेकिन आप ने कभी गौर किया है कि किसी मुस्लिम या किसी दलित के साथ हादसा होने पर या हत्या होने पर देखते ही देखते पूरे देश में एक आंदोलन खड़ा हो जाता है तो क्यों और कैसे?

नहीं जानते हों तो अब से जान लीजिए. यह सब सिर्फ़ एनजीओ फंडिंग का प्रताप है. उन एनजीओ का, जिन को क्रिश्चियन मिशनरी और गल्फ फंडिंग की बहार हासिल है. कहीं-कहीं सरकारी बहार भी. मीडिया से जुड़े कई लोग भी इस तरह के एनजीओ चलाते हैं. कभी खुद तो कभी परिवारीजनों के मार्फ़त. एक नहीं कई-कई एनजीओ. सो सामाजिक आंदोलन चलता रहता है.

यही हाल बहुत सारे बुद्धिजीवियों, लेखकों और रंगकर्मियों का भी है. यह तमाम बुद्धिजीवी, लेखक और रंगकर्मी भी कई-कई एनजीओ चलाते हैं या प्रकारांतर से जुड़े रहते हैं. सो तमाम मीडिया में खबरें चलने लगती हैं, बुद्धिजीवियों और लेखकों की बयान बहादुरी नफ़रत की सारी हदें पार करने लगती हैं. जगह-जगह नाच, गाने और नाटक होने लगते हैं.

पूरे देश में एक खौफनाक मंज़र रच दिया जाता है. फिर इस खौफनाक मंज़र के मद्देनज़र तमाम लोग फैशनपरस्ती में भी उतर आते हैं. फ़ेसबुक पर सक्रिय एनजीओ गिरोह के तमाम लोग कमर कस कर ऐसे उतर लेते हैं गोया पानीपत या गाजापट्टी की लड़ाई आन पड़ी हो. सो दिल्ली में जंतर मंतर सहित देश में तमाम ऐसी जगहें सज जाती हैं.

आप गौर कीजिए कि अभी उत्तर प्रदेश के रायबरेली में एक साथ पांच लोग जला दिए गए. लेकिन यह देशव्यापी खबर तो छोड़िए कायदे से प्रदेश स्तर की भी खबर नहीं बन सकी. क्या यह घटना जघन्य नहीं थी, कि मनुष्य विरोधी नहीं थी?

पर फ़ेसबुक या ट्विटर पर भी यह घटना अभियान नहीं बनी. इस घटना के विरोध में नाटक, नाच, गाना और जलसा होना तो दूर की बात है. तो सिर्फ़ इस लिए कि यह सभी पांच के पांच लोग ब्राह्मण लोग थे.

क्रिश्चियन मिशनरी या गल्फ फंडिंग प्रायोजित एनजीओ को इस घटना पर यह सब करने से कोई भुगतान नहीं होता तो यह लोग कोई धरना, प्रदर्शन भी कैसे करते? लेकिन एक मुख्यमंत्री को शैंपू, साबुन देने के लिए दुनिया भर का नाटक यह एनजीओ वाले कर लेते हैं. न्यूज़ की हाइक भी ले लेते हैं.

इसी तरह बीते हफ़्ते बिहार में महादलित बावन मुसहर और मुरहू मुसहर की हत्या भीड़ ने मिल कर कर दी. इस की चर्चा भी किसी ने नहीं की. न न्यूज़ में, न फ़ेसबुक पर. किसी दलित गिरोह या सेक्यूलर गैंग ने भी इस की नोटिस नहीं ली. फेसबुक और ट्विटर पर भी सन्नाटा छाया रहा।

घटना पिछले सप्ताह पटना से 170 किमी दूर रोहतास के कोचास थानान्तर्गत परसिया में घटी. दोनों महादलित युवकों पर चोरी का आरोप है, इन्हें कथित तौर पर शौकत अली के घर में घुसते हुए पकड़ा गया था लेकिन पुलिस ने अज्ञात लोगों पर हत्या का मामला दर्ज किया है. लेकिन चूंकि यहां दलित और मुस्लिम के बीच का पेच फंस गया तो इस बिना पर इन एनजीओ के संचालकों का पेमेंट फंस जाता, इस लिए ख़ामोश रहे.

ठीक यही पेंच उत्तर प्रदेश के रामपुर में भी बीते दिनों फंसा था. रामपुर में दलित लड़कियों को कुछ मुस्लिम लोगों ने न सिर्फ़ दिन दहाड़े उठा लिया, उन के साथ बदसलूकी की बल्कि इस सब की वीडियो बना कर फ़ेसबुक पर पोस्ट कर दिया. लेकिन इस घटना पर भी सिरे से चुप्पी बनी रही.

देश भर में कोई धरना, कोई प्रदर्शन, कोई नाटक, कोई गाना, बजाना या कोई जंतर मंतर नहीं हुआ. तो सिर्फ़ इस लिए कि एनजीओ वालों को यहां भी पेमेंट नहीं मिलना था. यह और ऐसी बहुतेरी घटनाएं हैं. जिन की तफ़सील में यह और ऐसे पेंच निरंतर सक्रिय हैं.

आप गौर कीजिए कि कश्मीर में हो रही तमाम मुस्लिमों की हत्या पर भी, आए दिन आतंकवादी घटनाओं पर भी देश में कोई आंदोलन कहीं क्यों नहीं होता? क्यों नहीं होता कोई धरना, कोई प्रदर्शन, नाच, गाना, नाटक, जलसा आदि? न जंतर मंतर, न कहीं और.

तो सिर्फ़ इस लिए कि इस बाबत भी किसी एनजीओ को कभी कोई पेमेंट नहीं मिल सकता. इस लिए भी कि एनजीओ को क्रिश्चियन मिशनरी और गल्फ फंडिंग का मुख्य मकसद देश को गृह युद्ध में झोंकना ही है. और कश्मीर में उन का मकसद पहले ही से कामयाब है.

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