दुनिया की कई शक्तियां नहीं चाहतीं कि हम समझें महाभारत के संदेश

आम भारतीय के मन में यह धारणा बिठा दी गई है कि महाभारत घर में नहीं रखी जानी चाहिए, इससे झगड़े होते हैं. मगर बिना किसी जांच-पड़ताल के कह सकता हूँ कि यह हम भारतीयों के दिलोदिमाग पर गुलामी के दौरान बिठाई गई होगी. वरना महाभारत वो श्रेष्ठ साहित्य है जो हमारे पूर्वजों की विश्व को अनमोल देन है.

अगर यह इतनी ही अनावश्यक होती तो इसे हजारों वर्षों तक एक धरोहर के रूप में सुरक्षित नहीं रखा जाता. इसमें व्यक्ति, परिवार, समाज, देश के लिए हर वो सन्देश है जिसकी एक मानव को उसके जीवन में जरूरत पड़ सकती है.

राजनीति, राज्य-नीति, परिवार नीति, धर्मनीति, युद्धनीति, अर्थनीति, न्यायनीति आदि आदि हर उस नीति का विस्तार पूर्वक उदाहरण सहित व्यवहारिक ज्ञान दिया गया है जो आज भी संदर्भित है.

आज भी मानव जीवन का ऐसा कोई प्रसंग नहीं जो महाभारत में ना हो और जो महाभारत में लिखा गया है वो आज के जीवन में ना घट रहा हो. संक्षिप्त में कहना हो तो महाभारत वो साहित्य है जिसे पढ़कर आप अपने सर्वनाश से बच सकते हैं, अगर आप बचना चाहे तो.

महाभारत के लिए क्या धृतराष्ट्र और दुर्योधन ही दोषी हैं? वे तो मुख्य खलनायक हैं ही और उन्हें इसकी सजा मिली भी. मगर क्या भीष्म दोषी नहीं? वे भी बराबर के दोषी हैं. क्या उनकी प्रतिज्ञा समाज देश के हित से अधिक महत्वपूर्ण और मूल्यवान थी? लगता तो ऐसा ही कुछ है.

कहते हैं कि वो हस्तिनापुर के राजसिहांसन से बंधे हुए थे. ये क्या बात हुई कि आप सिंहासन से बंधे हैं फिर चाहे उस सिंहासन वाले देश का सर्वनाश हो रहा हो, वो हारने वाला हो, गुलाम होने जा रहा हो. मगर आप अपने आप को सिंहासन से जोड़े रखेंगे. इसे भीष्म प्रतिज्ञा नहीं भीष्म मूर्खता कहा जाना चाहिए.

अरे धृतराष्ट्र तो अंधा था ही और दुर्योधन तो अभिमानी और अहंकारी और साथ ही दूसरे की सफलता की आग में जलने वाला एक बिगड़ैल बेटा था. और यह भीष्म भी जानते थे.

मगर उन्होंने क्या किया? सिर्फ यह कह कर अधर्म के साथ खड़े हो गए कि मैं प्रतिज्ञा से बंधा हुआ हूँ. इसे खाई में कूदना कहते हैं. अगर वो चाहते तो सख्त हो कर ना केवल कौरव वंश को भी बचा लेते साथ ही लाखों आम लोगों का खून बहने से भी रोक लेते.

ऐसे ही कई और महापुरुष (?) इस महाभारत के लिए दोषी हैं, जो हैं तो महाज्ञानी मगर उनका ज्ञान किसी काम नहीं आया. हमें भीष्म, द्रोणाचार्य नहीं बनना है, ना ही कर्ण जैसे दोस्तों को पालना है, ना ही गांधारी जैसी माता बनना है जो अपने ही पुत्रों के विनाश को सिर्फ इसलिए नहीं रोक पाईं क्योंकि उन्होंने आँख पर पट्टी बाँध ली थी.

ऐसे अनगिनत सन्देश हमें एक सच्ची कहानी के माध्यम से रोचक ढंग से समझाने का प्रयास किया गया है. मगर हम इतने मूर्ख हैं कि इस महाग्रंथ को पढ़ना तो दूर घर में रखना भी नहीं चाहते.

दुनिया की कई शक्तियां हैं जो नहीं चाहतीं कि हम महाभारत के सन्देश को समझे. हम जागरूक हों अपने कर्तव्य और अधिकारों को लेकर. हम कर्मयोगी बने और सुखमय सुरक्षित जीवन जी सके. हम चक्रवर्ती राष्ट्र बनें.

इसके विपरीत यह प्रयास किया जाता है कि हम कर्महीन बने. ऐसा-ऐसा अज्ञान परोसा जाता है कि जिसका कोई आधार नहीं. जैसे कि हमें यह दिन-रात घोट कर पिलाया जाता है कि हमें हर किसी के अपराध को माफ़ कर देना चाहिए. मगर यह नहीं बतलाया जाता कि सौ के बाद शिशुपाल को भी उसके किये की सजा देनी पडी थी.

पांडवों ने तो पांच गांव ही मांगे थे मगर जब वो नहीं मिले तभी युद्ध लड़ा गया. मगर हम अपना आखिरी गांव भी छोड़ने वाली अहिंसा के ज्ञान को अपने माथे पर तिलक की तरह सजाये बैठे हैं. क्योंकि कौरव नहीं चाहते कि आप अपना पांच गांव मांगो.

दुर्योधन यही चाहता है, धृतराष्ट्र भी यही चाहता है और शकुनि भी… और इनकी संख्या बढ़ती जा रही है. मगर कब तक अपने गांव नहीं मांगोगे. उलटे वे एक-एक गांव तुमसे छीन रहे हैं.

कोई कहता है कि महाभारत युद्ध के लिए उकसाती है. अरे मूर्ख, महाभारत में श्री कृष्ण मथुरा छोड़कर द्वारका इसलिए गए थे कि युद्ध ना हो. तब तक वो कंस का वध कर चुके थे. अर्थात शक्तिशाली थे और उनकी शक्ति से दुनिया परिचित हो चुकी थी, मगर फिर भी उन्होंने यदुवंश की भलाई के लिए मथुरा छोड़ा.

मगर वे ही आप को अपने हक़ के लिए अंत में शस्त्र उठाने के लिए कहते हैं. वो हिंसक नहीं हैं मगर अहिंसा के पुजारी भी नहीं हैं, वो आक्रामक नहीं हैं मगर कायर भी नहीं हैं, साम्राज्यवादी नहीं हैं तो पलायनवादी भी नहीं है! वे केवल कर्मयोगी हैं, व्यवहारिक हैं. उनके संदेशों का निचोड़ गीता में है. यह जीवन सार है.

हे आर्यपुत्रों, घर-घर महाभारत और गीता का सस्वर पाठ करो. अपनी हर मुश्किल का हल उसमें से ढूंढो. पिछले कुछ समय में अपने आर्यावर्त का, हर शताब्दी के नए-नए धृतराष्ट्र और उनके अपने-अपने दुर्योधन के लिए उस काल के शकुनि के कहने पर, कई बार विभाजन कर चुके.

फिर भी दुर्योधन की ना तो प्यास बुझी, ना ही शकुनि का षड्यंत्र रुक रहा. अब क्या अपना इंद्रप्रस्थ भी किसी जुएं में हार जाना चाहते हो? ध्यान रहे आज का दुर्योधन तुम्हें जंगल में भी नहीं रहने देगा. इसलिए हे आर्यपुत्रों, श्रीकृष्ण के अर्जुन बनो, युधिष्ठिर नहीं.

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