दुश्मनों में ये खौफ़… बल्कि यही खौफ़ होना चाहिये

अल-फ़तह और फ़िलिस्तीन के नेता यासिर अराफ़ात के इंतकाल के बाद फिलिस्तीन के लोगों में एक चुटकुला चल पड़ा था. चुटकुला कुछ यूं था –

जब यासिर अराफ़ात वफ़ात पाकर जन्नत तक पहुँचे तो देखा, वहां जन्नत के दरवाजे पर फिलिस्तीन मुक्ति मोर्चा, अल-फ़तह और हमास के मुजाहिदीन हजारों के संख्या में खड़े हैं. 72 हूर, शराब के प्याले लिये फिरते गिलमा और मुश्क और काफूर की खुशबू से सराबोर जाम की तलब उन मुजाहिदिनों को मदहोश कर रही है पर जन्नत के दारोगा रिजवान हैं कि गेट पर पहरा डाले बैठें हैं और किसी भी मुजाहिदीन को अंदर ही नहीं जाने दे रहे.

शोर बढ़ता जा रहा है, अचानक उनमें से किसी मुजाहिदीन की नज़र अभी-अभी शहीद हो कर आये यासिर अराफ़ात पर पड़ती है और भीड़ ख़ुशी से चीख पड़ती है कि लो जी, हमारे सद्र (राष्ट्रपति) भी यहाँ आ गये, अब तो हमने एंट्री ज़रूर मिल जानी है.

यासिर अराफ़ात पूछ्ते हैं, तुम लोग बाहर क्यों खड़े हो? मुजाहिदीन कहते हैं, देखिये न हुज़ूर, ये जन्नत के दारोगा रिजवान हमसे कह रहे हैं कि तुम्हारे मुल्क का नाम ही हमारी रजिस्टर में नहीं है. यासिर अराफ़ात बोले, चिंता न करो अब मैं आ गया हूँ, उनसे मैं बात करता हूँ.

मुजाहिदीन की भीड़ मुतमईन हो गई. अराफ़ात रिजवान के पास गये, सलाम किया और अपना परिचय देते हुए कहा, हमारे लोगों को अंदर जाने क्यों नहीं देते? रिजवान ने कहा, आपका बड़ा एहतेराम है हमारी नज़र में पर आप लोग जिस मुल्क का नाम बता रहें हैं वो हमारे लिस्ट में है ही नहीं.

यासिर अराफ़ात चक्कर में आ गये कहा, अरे फिर से देखो. इस फिलीस्तीन के लिये कुर्बान हुये शुह्दाओं की लंबी लाइन लगी है और आप कहते हैं कि फ़िलीस्तीन नाम का कोई मुल्क ही नहीं है? दारोगा रिजवान ने फिर से लिस्ट खंगाली पर वहां फ़िलिस्तीन नाम का कोई मुल्क न मिला.

फिर तो अराफात साहब आग-बबूला हो गये, कहने लगे मैं खुदा से खुद बात करूँगा. फरिश्तों में कोहराम पड़ गया कि ये कैसी मांग जिसे पूरा नहीं किया जा सकता. इधर अराफ़ात आगबबूला थे वहीं तक़रीर शुरू कर दी. इस तक़रीर की गूँज खुदा को भी सुनाई दी तो पता करवाया कि मामला क्या है.

रिज़वान ने जब तस्दीक कर दी कि मेरे मौला ये लोग खुद को जिस मुल्क का शहीद बता रहें हैं वो मुल्क तो हमारे लिस्ट में हैं ही नहीं. इस पर खुदा ने सबसे आला फ़रिश्ते जिब्रील को बुलवाया और कहा, देखो, जब तक इन लोगों के मुल्क की तस्दीक नहीं हो जाती यहीं जन्नत के बाहर वाले मैदान में एक शरणार्थी कैंप बनवा दो और उसमें इनको रहने को बोलो.

आप इसे चाहे तो चुटकुला रूप में लें पर ये पूरा कथानक फिलीस्तीन के उस संतप्त एहसास का प्रगटीकरण है कि चाहे ये दुनिया हो या वो दुनिया, उनकी हैसियत केवल और केवल शरणार्थी की ही है.

इस लेख का उद्देश्य फिलीस्तीनी दुर्भाग्य पर चर्चा करना नहीं है बल्कि ये बताना है कि यहूदीवाद और जियानवाद अपने दुश्मन को किस कदर बेबस और लाचार बना देता है कि हकीकत तो दूर, सपनों और कल्पनाओं में भी वो बेहतरी का एहसास नहीं कर पाता.

इज़रायल अपने दुश्मन के दिलो-दिमाग और सोचने की क्षमता को किस तरह कुंद कर देता है ये केवल फिलीस्तीन की दफ़न हुई आकांक्षा में ही नहीं मिलता बल्कि इसके उदाहरण दुनिया भर में बिखरे पड़े हैं.

1990 के दशक के बिलकुल आरंभिक सालों में इज़रायल ने अपने शत्रु मिस्र से एक समझौता किया जिसके तहत मिस्र को वो कृषि के कुछ तकनीक सिखाने वाला था.

इज़रायल की दी गई तकनीक पर काम होता इससे पहले ही वहां के मदरसे और अखबार ये कहने और छापने लगे कि यहूदियों की दी गई तकनीक से पैदा हुआ खाद्यान्न हमारे बच्चों को नपुंसक और महिलाओं को कामुक बना देगा और इस घृणा तथा दुष्प्रचार ने उस तकनीक पर मिस्र में काम ही नहीं होने दिया.

इसी तरह का एक प्रसंग जोर्डन से भी जुड़ा है. भारत और पड़ोसी देश पाकिस्तान में तो कुछ लोगों ने पोलियो ड्रॉप से परहेज ही इसलिये रखा था कि कहीं यहूदियों की इजाद ये चीज़ हमारे बच्चों को नामर्द न बना दे. पूरी दुनिया का मुस्लिम मानस इस बात को लेकर हमेशा शंकित रहता है कि यहूदी उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहा है.

इज़रायल ने अपने दुश्मनों के दिल में ये खौफ़ बहुत अच्छे से डाल दिया है जिसके नतीजे में दुनिया के लगभग सारे मुल्क फिलीस्तीन के लिये बस ज़ुबानी हमदर्दी दिखाने भर की हिम्मत कर पाते हैं.

1948 में इज़रायल गठन के अगले ही दिन अरब देशों- मिस्र, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक ने मिलकर इज़रायल पर हमला कर दिया पर नए जन्में इज़रायल ने कार्तिकेय की तरह कुशल युद्ध नीति अपनाते हुये इन अरब टिड्डी दलों को रौंद डाला.

फिर अरब देशों ने ऐसी ही एक हिमाकत 1967 में भी की. अरब जितनी तेज़ी से हमलावर हुए थे उससे तीन गुनी तेज़ी से पीछे भाग गये. इज़रायल के पराक्रम से अभिभूत एक आयरिश पत्रकार ने तब लिखा था कि मुझे आज इस बात पर दुःख और शर्म है कि मैं यहूदी नहीं हूँ.

इस युद्ध के बाद मिस्र को ये एहसास हो गया कि इज़रायल अजेय है और थक-हार कर दस साल बाद उसने इज़रायल से संधि कर ली जिसे कैम्प-डेविड संधि कहा जाता है.

आतंकवाद और सीमा सुरक्षा की दृष्टि से संतप्त दुनिया और विशेषकर भारत के लिये इज़रायल की नीति और राष्ट्रवाद पाथेय है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़रायल यात्रा हमें इज़रायल से बहुत कुछ सीखने का मौका देगी और इस मौके का फायदा अगर हम अपने दुश्मन मुल्कों के दिलों में इस खौफ़ को डालने में करते हैं तो फिर कम से कम हमारी सीमायें सुरक्षित रहने की तो गारंटी है.

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