दुनिया ने शरण नहीं दी, तब भारत के इस राजा ने बचाई थी 500 यहूदी महिलाओं और 200 बच्चों की जान

इज़राइल आजकल चर्चा में है. इस देश ख़ास तौर पर पोलिश/यहूदियों के साथ हमारे देश के मैत्रीपूर्ण संबंधों की पुरानी परम्परा रही है. दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को प्रगाढ़ करने वाली एक भावपूर्ण घटना आज नेट पर पढ़ने को मिली जिसे पढ़कर मन गद-गद हुआ और अपने देश (भारत) की महानता पर गर्व हुआ.

1942 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया था. सबसे खराब हालत पोलैंड की थी क्योंकि ब्रिटेन को जीतने के लिए जर्मनी द्वारा पोलैंड को जीतना जरूरी था. जर्मनी के सैनिक यहूदियों को खोज-खोज कर मार रहे थे. पोलैंड के सैनिकों ने अपने देश के पोलिश/यहूदी परिवारों की 500 महिलाओं और करीब 200 बच्चों को एक समुद्री जहाज़ में बिठाकर समुद्र में छोड़ दिया और शिप-कैप्टन से कहा कि इन्हें किसी भी देश में ले जाओ जहाँ इन्हें शरण मिल सके. अगर जिन्दगी रही और ये लोग जिंदा रहे और हम भी बचे रहे तो दुबारा मिलेंगे.

पांच सौ शरणार्थी/यहूदी पोलिश महिलाओं और दो सौ बच्चों से भरा वह जहाज ईरान के इस्फहान बंदरगाह पहुंचा. वहां किसी को शरण क्या उतरने तक की अनुमति नहीं मिली. फिर अदन में भी अनुमति नही मिली. कईं अन्य देशों से भी निराशा ही हाथ लगी. अंत में समुद्र में भटकता-भटकता यह जहाज गुजरात/कच्छ के नवानगर के तट पर पहुंचा.

नवानगर के तत्कालीन महाराजा दिग्विजय सिंह (Maharaja Digvijaysinhji Ranjitsinhji Jadeja of Nawanagar) ने ब्रिटिश शासकों के विरोधपूर्ण रवैये के बावजूद न सिर्फ पांच सौ महिलाओं और बच्चों के लिए अपना एक राजमहल जिसे हवामहल कहते हैं, वह रहने के लिए दिया बल्कि अपनी रियासत के एक सैनिक स्कूल में उन बच्चों की पढाई-लिखाई की व्यवस्था भी की. कहते हैं कि ये शरणार्थी जामनगर में कुल नौ साल तक रहे.

इन्हीं शरणार्थी बच्चो में से एक बच्चा बाद में पोलैंड का प्रधानमंत्री भी बना गया. आज भी हर साल उन यहूदी शरणार्थियों की वंशज नवानगर/जामनगर (जाम रावल ने 1540 ई. में जामनगर शहर को नवानगर रियासत की राजधानी के रूप में बसाया था।) आते हैं और अपने पूर्वजों को याद करते है.

पोलैंड की राजधानी वारसा में चार सड़कों का नाम महराजा दिग्विजय सिंह रोड रखा गया है. सुना है उनके नाम पर पोलैंड में कई योजनायें चलती है. हर साल पोलैंड के अखबारों में महाराजा साहब दिग्विजय सिंह के बारे में आर्टिकल और विशेषांक छपते हैं. Maharaja Digvijaysinhji Ranjitsinhji Jadeja of Nawanagar साहब की ये पंक्तियाँ पढ़ने लायक हैं. जब जहाज़ से पोलिश शरणार्थी उतर रहे थे तो महाराजा ने उनसे कहा:

“On disembarking, the Maharaja warmly welcomed the Polish women and children, saying “Do not consider yourself orphans. You are now Nawnagaris and I am Bapu, father of all the people of Nawanagar, so also yours.”

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