राहें अनेक हैं, कुछ करने की ठान तो लीजिए

बहुत बड़ी, विशालकाय कंपनियों में से एक के ह्युमन रिसोर्स हेड ने एक बार ‘सैलरी कैसे तय होती है’ ये सिखाने की कोशिश की थी. उन्होंने जो उदाहरण इस्तेमाल किया, वो हमें अब तक याद है.

उनका सवाल था कि आखिर पांच लोग अगर तुम्हारे सामने हों, और सबके मार्क्स अच्छे ही हों तो तुम कैसे चुनोगे कि किस इंजिनियर की शुरूआती सैलरी बीस हज़ार महिना से कम हो सकती है और किसकी तनख्वाह पचास हज़ार महिना रखनी चाहिए? काम करते हुए तुमने किसी को देखा नहीं है, इसलिए सिर्फ पढ़ाई के स्तर से जांच के ये अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है. लेकिन अगर सोचा जाए कि कोई आई.आई.टी. में कैसे गया होगा? तो इस सवाल का जवाब आसान हो जाता है.

आई.आई.टी. तो पहले ही दुनिया के सबसे मुश्किल टेस्ट्स में से एक है. उसमें पास कर के कोई ढंग की रैंक लाने के लिए लड़के ने पहले ही काफी मेहनत की होगी. छात्र कम पढ़ रहा है या जितनी मेहनत की जरूरत है उतनी कर रहा है, ये सिर्फ उसे खुद पता है.

मतलब आई.आई.टी. या आई.ए.एस. या ऐसी कोई मुश्किल परीक्षा पास करने वाला खुद पर खुद ही नजर रखता है और अगर किसी एक दिन कम मेहनत की हो तो अगले दिन फ़ौरन उसकी भरपाई करेगा.

किसी दिन कम मेहनत ना की हो ऐसा नहीं हो सकता. दो साल की प्लस टू की पढ़ाई में किसी न किसी दिन किसी रिश्तेदार की शादी में जाना पड़ा होगा. किसी दिन क्रिकेट मैच देखने का मन किया होगा, कभी घर में मेहमान आये होंगे. उन सभी दिन जो पढ़ाई का नुकसान हुआ, वो उसने खुद ख़याल रख के, उसकी भरपाई की है.

अब फैसला लेना आसान है. जो पहले ही एक बार अपनी काबिलियत सिद्ध कर चुका है, उसे चुनते वक्त ज्यादा सोचना नहीं पड़ता. काम के दौरान नौकरी में भी वो खुद को अपने आप ही मोटिवेट करेगा, मैनेजर पर बोझा नहीं बढ़ाएगा. उसे चुनना फायदे का सौदा है, उसे बड़े पैकेज पर लिया जा सकता है.

इसकी तुलना में किसी अनजान से कॉलेज से आ रहे इंजिनियर को छोटा पैकेज मिलेगा. बिलकुल यही उस वक्त भी होगा जब नौकरी देने वाला दिल्ली के किसी सेंट स्टीफेंस के पास आउट को देखे, और बिहार की किसी कस्बे से आये ग्रेजुएट को देखेगा.

स्टीफेंस वाला तीन साल के ग्रेजुएशन में दो चार प्रोजेक्ट कर चुका है, उसके रिज्यूमे पर समर ट्रेनिंग का जिक्र है. नौकरी देने वाले को उस से समझ आ रहा है कि इसके पास खाली किताबी ज्ञान नहीं, ये उसके प्रैक्टिकल एप्लीकेशन से भी वाकिफ है.

उधर जो कस्बे से निकल के पहुंचा है, उस बेचारे का रिज्यूमे कैसा है? सादा. ऊपर से सरकारी मास्टर साहब तो मुस्कुराने पर दहाड़ते थे, काहे रे बुड़बक, हम पढ़ा रहे हैं कि चुट्कुल्ला सुना रहे हैं? दांत बेसी चियारोगे तो देंगे दू लात, बाहरे भगा देंगे. बैठो मुंह बंद कर के. भकोलचंद.

तो बेचारा जब इंटरव्यू में पहुंचा तो ना तो उसके चेहरे पर स्माइल है, डांट के डर से कॉन्फिडेंस भी डोला हुआ है. अंग्रेजी जो नै आता है सो तो हैइये है. क्या उम्मीद करते हैं छोटे कस्बे से पहुँचने वालों का क्या होगा? जवाब आसान है लेकिन जाने दीजिये, बोलना-लिखना अच्छा नहीं लगता.

किस्मत से अब इन्टरनेट युग है और पप्पा ने कस्बे वालों को भी स्मार्ट फ़ोन दिला दिया है. खाली भोकाली टाइट करने के लिए तो मिला नै है ना बौआ, उसका इन्टरनेट इस्तेमाल भी करते होंगे?

तो थोड़ा ढंग से इस्तेमाल कर लीजिये. पहले तो यू ट्यूब पर जा के सॉफ्ट स्किल्स, इंटरव्यू, कम्युनिकेशन, जैसे विषयों के विडियो देख देख कर अपनी भाषा सुधारी जा सकती है.

जो प्रोजेक्ट्स बड़े शहरों में मिलते हैं वो छोटे में नहीं मिलेंगे. इसके लिए आप दूसरा नुस्खा आजमाइए. अगर आप इंजीनियरिंग, कंप्यूटर, आई.टी. जैसे विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं तो आप आराम से एंड्राइड एप बनाना सीख सकते हैं.

सॉफ्टवेयर फ्री आता है, गूगल भी मुफ्त है, ज्यादातर चीज़ें ढूंढ के मिल जाएँगी. एप बना के उसे डिस्ट्रीब्यूशन में डाल दीजिये. शुरू में एप चलेगा कैसे, आपको कोई जानता नहीं? क्यों कोई डाउनलोड करेगा जैसे सवाल हैं.

तो हे महामूर्ख, आप अपनी ही यूनिवर्सिटी के पिछले साल के क्वेश्चन पेपर, नोट्स इत्यादि बड़ी मेहनत से जुगाड़ने का प्रयास करते रहे हैं. अगर सिर्फ एक विषय के पिछले दस साल का अपनी ही यूनिवर्सिटी का प्रश्न पत्र लेकर उसे चैप्टर के हिसाब से, जवाब के साथ डाल देंगे तो आपकी अपनी यूनिवर्सिटी में ही उसे हज़ार लोग इस्तेमाल करने लगेंगे.

आप जब तक चार साल की पढ़ाई ख़त्म कर के निकलेंगे तब तक उसके 10000 डाउनलोड आराम से गूगल प्ले स्टोर पर लिखे हुए दिखेंगे. अब उस एप के डेवलपर के तौर पर अपना नाम रिज्यूमे में लिखिए.

इंटरव्यू लेने आये व्यक्तियों के मोबाइल में गूगल प्ले स्टोर होता है, आप आराम से इंटरव्यू के दौरान अपना कारनामा उन्हें दिखा सकते हैं. कोई समर ट्रेनिंग का अलग सर्टिफिकेट किसी से नहीं लेना होगा. धरती पर चाहे वो जहाँ भी बैठा हो, आपका सर्टिफिकेट उसकी नाक के सामने होगा.

बाकी मेहनत ना करने की इच्छा हो तो भी कोई बात नहीं. अभी फाइनल इयर के कई छात्र होंगे जिन्हें अज्ञात कारणों से नौकरी नहीं मिल रही. ऐसे सीनियर्स से मिलिए, उनका फ्रस्ट्रेशन थोड़े ही समय बाद आपका भी फ्रस्ट्रेशन होगा. आराम से अपनी बारी का इन्तजार कीजिये.

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