अस्पताल का पता नहीं, खोज रहे हो एम्बुलेंस!

ये जो लोग इस पर आहत होते रहते हैं कि फलाने को ठेला पर लाश ले जाना पड़ी, फलाने को साइकिल पर, क्या उनको ये बात पता नहीं कि सरकारी अस्पतालों में कितने एम्बुलेंस या मुर्दा ढोने वाले वाहन होते हैं?

आप भारत में हैं जहाँ बीमार को एम्बुलेंस मिलती नहीं और आपको लाश को ठेले पर ले जाने में लग रहा है कि बाप रे क्या हो गया! ये फ़ैशन हो गया है.

हाँ, मैं संवेदनहीन हूँ. क्योंकि मैं अपने देश के चिकित्सा के इन्फ़्रास्ट्रक्चर को जानता हूँ. दूसरी बात ये भी जानता हूँ कि हर सरकारी हस्पताल में कितने लोग रोज़ मरते हैं. ज़िले के सदर अस्पतालों में हर रोज़ कई लोग मरते हैं. वहाँ ग़रीब जाते हैं. गरीब के लिए एम्बुलेंस ना होती है, ना ही होगी.

आप सरकार को घेरिए कि चिकित्सा की व्यवस्था इतनी घटिया क्यों है. लेकिन इस ‘लाश ढोने के लिए नहीं मिली एम्बुलेंस, सर पर ढोई लाश‘ वाली इमोशनल पोस्ट से ब्लैकमेलिंग बंद कीजिए.

आदमी ठेले पर बैठ कर अस्पताल जाता है, रिक्शे पर जाता है, रास्ते में मर जाता है. गरीब, अस्पताल मरने के समय में ही जाता है. ये बात जान लीजिए. गरीब को नहीं देखा है तो उड़ीसा हो आईए एक बार, बिहार के शिवहर चले जाईए.

आप इस पर नहीं लिखेंगे कि प्राइमरी हेल्थ सेंटर का क्या हाल है, कितनी दूर पर है, उसमें डॉक्टर है कि नहीं. क्योंकि आपको पता ही नहीं. आपको क्या लगता है बेगूसराय के सदर अस्पताल में हवाई जहाज़ से लाश ढोई जाती है? क्या लगता है कि बालासोर के सरकारी हॉस्पिटल से लाश ले जाने के लिए एम्बुलेंस लगी रहती होगी?

अस्पताल का पता नहीं, खोज रहे हो एम्बुलेंस! बीमार के लिए एम्बुलेंस पहले ज़रूरी है. हर अस्पताल में एम्बुलेंस भी नहीं होती, पता है? गरीब मरेगा और किसी के कंधे पर जाएगा, साइकिल पर जाएगा, ठेले पर जाएगा क्योंकि यहाँ ज़िंदा आदमी भी वैसे ही अस्पताल जाता है. आपकी हर सरकार चिकित्सा और शिक्षा को लेकर उदासीन रही है.

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