GST पर सर्वाधिक पूछे जाने वाले दो सवालों के उत्तर

पहला सवाल मनमोहन सिंह के समय यूपीए सरकार द्वारा लाये गए GST बिल का बीजेपी और मोदी जी ने विरोध क्यों किया.

बीजेपी और मोदी जी का GST का विरोध उसके केंद्रीयकृत स्वरूप को लेकर था, जिसमें राज्यों के कर लगाने के अधिकार को खत्म करने अनुशंसा थी.

GST आने के बाद राज्यों का अपना कर संग्रह प्रभावित होता, पहले से कम हो जाता. कोई भी राज्य अपने राजस्व का लगभग 70-80% हिस्सा इनडायरेक्ट टैक्सेज़ से हासिल करता है.

कांग्रेस के GST बिल में राज्यों के कम कर संग्रह पर केंद्र सरकार की तरफ से कोई गारंटी नहीं थी कि घाटे की भरपाई होगी. वहीं, मोदी सरकार ने, पांच साल तक जितना घाटा होगा, उसकी भरपाई की गारंटी दी है और इसके लिए संविधान में संशोधन किया है.

कांग्रेस केवल एक दर पर GST लाना चाहती थी और अभी मोदी सरकार के GST का विरोध वो इसी आधार पर कर रही है.

GST की अलग-अलग दर इसीलिए आयी हैं ताकि हर वस्तु मैक्सिमम टैक्स ब्रेकेट में न हो जाये. 28% चुनिंदा वस्तुओं पर है. अधिकतर वस्तुएं 12% और 18 % पर हैं. ज्यादातर उपयोग वस्तुओं को 5% पर रखा गया है.

कांग्रेस के GST बिल में राज्यों को उनका हिस्सा कम था, मोदी सरकार में बराबर का हिस्सा है. स्टेट GST और केंद्रीय GST दोनों बराबर हैं.

कांग्रेस के GST बिल में स्टेट सेल्स टैक्स डिपार्टमेंट को कंपनियों की जाँच के अधिकार नहीं थे, अब हैं.

मोदी जी और बीजेपी को कांग्रेस के समय जितने ऑब्जेक्शन थे, उन्होंने अपने बिल में उसे दूर किया है.

मोदी जी या बीजेपी GST का विरोध नहीं कर रहे थे, उसके स्वरूप का विरोध कर रहे थे.

आज भी कांग्रेस या कोई पार्टी GST का विरोध नहीं कर रही है, उसे लागू किये जाने के तरीके पर एतराज कर रही है.

दूसरा सवाल GST से पेट्रोल और डीज़ल को बाहर क्यों रखा गया है.

GST लागू होने के बाद राज्यों के राजस्व में कमी आ सकती है. उनके नुकसान को कम्पनसेट करने के लिए एक कंसोलिडेटेड फंड ऑफ़ इंडिया बनेगा जिसमें सेस से मिली रकम जमा होगी.

शराब, सिगरेट, लक्जरी कार के ऊपर 28% GST और साथ में 15% सेस है, गुटखा पर 135% सेस है. इस सेस की रकम उस कोष में जमा होगी जिससे अगले पांच साल तक राज्यों को GST की वजह से होने वाले घाटे की भरपाई होगी.

पेट्रोल-डीज़ल को राज्यों के अनुरोध पर GST से बाहर रखा गया है. राज्यों को उनके इनडायरेक्ट टैक्सेज़ की करीब 30% आमदनी पेट्रोल और डीजल से होती है. अभी राज्यों को अधिकार है कि वो पेट्रोल और डीज़ल पर अपनी ज़रूरत के मुताबिक टैक्स लगा सकेंगे.

इस अधिकार से राज्यों को उनकी 30% आमदनी की गारंटी बनी रहेगी. दो साल के बाद जब राज्य अपने टैक्स रेवेन्यू का मूल्यांकन करेंगे और अगर पाते हैं कि GST की वजह से उनका रेवेन्यू कलेक्शन बढ़ा ही है, तब ऐसी उम्मीद है कि सेस भी घटेंगे और पेट्रोल-डीज़ल GST के दायरे में आ जायेंगे.

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