सोशल मीडिया पर महिलाओं के इनबॉक्स में आने वाले अश्लील संदेशों का करारा जवाब

टीवी, फेसबुक, ट्विटर पर एक बहस छिड़ती रहती है कि सोशल मिडिया पर महिलायें टारगेट होती हैं, ट्रोल होती हैं. फिर लोग कहते हैं, महिलाओं की आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है.

हाल ही में साक्षी धोनी का मामला तुल पकड़ा था. बरखा दत्त भी अपनी आपबीती लेकर पूरे जोश से मैदान में उतर आयी थी. महिलाओ पर आये इस खतरे पर अक्सर कोई ना कोई लेख दिख जाता है.

तो मुझे लगा कि चलो देखे तो सही कितनी कोशिश हो रही है आवाज दबाने की. बस दिल कड़ा करके कल रात सारे मैसेज रिक्वेस्ट और फ़िल्टर्ड मैसेज खोल कर पढ़ डाले. बहुत से पॉजिटिव मैसेज थे, हौसलाअफजाई करते हुए, उतने ही निगेटिव मैसेज थे नंगी पिक माँगते हुए, साथ में सोने की डिमांड करते हुए, बताते हुए कि मैं सेक्सी हूँ आदि-आदि.

पर जब मुद्दा महिला के ट्रोल होने का है तो ऐसा एक भी मैसेज नहीं था जो मेरे लिक्खाड़ पुरुष मित्रों को नहीं मिलता. जरा पूर्वाग्रह हटा कर पुरुषों के पोस्ट पर आये कमेंट चेक कीजिये, उनके अनुभव पूछिये, महिलाओं के पोस्ट से ज्यादा बदतमीजी मिलेगी. साफ नजर आयेगा कि जिसकी कलम में जितनी धार होती है, गालियां उतनी ज्यादा पड़ती हैं. पर पुरुषों के मामले में वो ट्रोलिंग का विरोध जरूर करें पर लेख का टाइटल कभी ऐसा नहीं होता ,”पुरुष की आजादी पर प्रहार” या “पुरुषों की आवाज खतरे में”.

फिर यहाँ आपके साथ ऐसा क्या स्पेशल हो रहा हैं जो पुरुषों के साथ नहीं होता? महिलाओं के दिमाग में ये बात क्यों बैठ गयी है कि वो ज्यादा ट्रोल हो रही हैं? क्योंकि महिलाएं बराबरी के अधिकार के लिये संघर्ष तो कर रही हैं पर अभी तक मानसिक रूप से तैयार नहीं हुई हैं बराबरी के घाटे सहने के लिए.

हाँ ये जरूर है कि पुरुषों को भी जब ट्रोल किया जाता है तो बात अक्सर उनकी माँ-बहन पर जाकर अटकती है, लेकिन ये माँ-बहन की गालियाँ भी सिर्फ इसीलिये ताकत रखती हैं क्योंकि पढ़ी-लिखी महिलाएं भी कहीं ना कहीं इसे अपनी इज्जत पर हमला मानती हैं.

ज्यादा से ज्यादा सोशल मिडिया पर क्या हो सकता है? आपकी फोटोशॉप्ड नंगी तस्वीरें आएंगी. पर जब नारीवाद की लड़ाई का महत्वपूर्ण मुद्दा बिना हव्वा बनाये शारीरिक नग्नता में पुरुषों की बराबरी का है (जोकि होना भी चाहिये), तो फिर घबराना कैसा? जब ट्रोल करने वाला लिंग की तस्वीर इनबॉक्स में भेजता है, हमबिस्तर होने की बात करता है पूरी बेशर्मी से, तो हम क्यों नंगेपन से शरमाएँ.

करते रहो नंगा, हम तैयार बैठे हैं इसे महत्व नहीं देने के लिये. जब किसी पुरुष के अंगों पर यहाँ हमला होता हैं तो वह उसे ज्यादा महत्व नहीं देता, फिर बराबरी की इच्छा रखने वाली महिलाये क्यू छाती पीट रही हैं इस मसले पर? जब आप खुद ही इतना महत्व देंगी तो स्त्री अंगो के लिए टैबू खत्म कैसे होगा?

तो महिलाओं, कुल मिलाकर आज भी आप सबसे ज्यादा सुरक्षित सोशल मिडिया पर हैं (कम से कम पुरुषों से ज्यादा असुरक्षित नहीं हैं), बशर्ते आप अपनी आवाज अपने दिमागी जंजीरो की वजह से ना दबाएँ. और जब यहाँ जंजीरे तोड़ेंगी तो बाकी जगह भी तोड़ने की ताकत आएगी.

तो बस तोड़ते-फोड़ते रहिये और चीजों को उतना ही महत्व दीजिये, जितनी है. हर मसला स्त्री-पुरुष का नहीं होता, बस इंसान का होता है.

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