प्रियतम के अतिरिक्त अन्य कुछ चिंतन में ही न आवे सो भक्त!

श्रीविजयलक्ष्मी मैया की आयु अब लगभग 70 वर्ष है. बहुत वर्ष पहले जब वह वृन्दावन आयीं तो बिल्कुल अकेली थीं. उड़ीसा में श्रीजगन्नाथ पुरी में वह अपने गुरु जी के आनुगत्य में भगवान की सेवा किया करती थी. परिवार वालों के बहुत बार बुलाने पर भी, भगवान की सेवा को छोड़ मैया वापिस घर नहीं गयीं.

मैया के गुरुदेव ने उन्हें आज्ञा दी थी कि जब मैं भगवान के धाम चला जाऊं तब तुम वृंदावन में श्रीराधारमण मंदिर चली जाना. गुरुदेव के स्वधाम पधार जाने के पश्चात मैया उड़ीसा से नंगे पाँव घने जंगलों से होती हुई पैदल ही वृंदावन के लिए निकल पड़ी. भगवान हमेशा मैया की रक्षा करते थे इसलिए उसे कभी रहने या खाने में परेशानी नहीं हुई.

पैदल चलते-चलते मैया को कई दिन बीत गए. कमजोर और असहाय मैया एक वृक्ष की छाया में कुछ देर आराम करने रुकी. न जाने कब उनकी आँख लग गयी और अचानक ट्रेन की आवाज से मैया की आँख खुली तो उसने किसी से पूछा कि मैं कहां हूं ? राहगीर ने जवाब दिया मथुरा रेलवे स्टेशन. मैया हैरान थी कि वह वहां कैसे पहुंची और उसे वहां कौन लाया ? उड़ीसा से वृंदावन की 1300 किलोमीटर की दूरी पैदल उसने किस तरह पार कर ली, यह उसके लिए आश्चर्य का विषय था.

उस शाम वह पहली बार श्रीराधारमण के मंदिर दर्शन करने गयी शयन आरती पर. उन्हें अपने गुरुदेव के वचन याद आ रहे थे कि श्रीराधारमण साक्षात भगवान हैं और वे ही तुम्हारा ध्यान रखेंगे.

मैया ने देखा कि शयन आरती के समय गोस्वामी जी के हाथ में दो मालाएं थी ; यह मालाएं किसी परिवार के सदस्य या भक्तों को दी जाती थीं. मैया कभी राधारमण को देखती कभी मालाओं को. अचानक गोस्वामी जी ने उसे दोनों मालाएं दे दीं. उस समय मैया पर जो श्रीजी की साक्षात कृपा का वर्षण हुआ वो बताने में असक्षम थीं. मैया की आँखों से आंसुओं की धारा बह चली जो उसके हृदयगत भावों को प्रकट कर रही थी.

श्रीजी की मंगला आरती के पश्चात जो मैया अपने राधारमण को गीतगोविन्द सुना कर रिझाती हैं ; ये वही मैया हैं, जिनके आप सब श्रीजी की मंगला में दर्शन करते हैं.

सत्य ही है -प्रियतम के अतिरिक्त अन्य कुछ चिंतन में ही न आवे सो भक्त !

प्राण-प्रियतम को अधिकाधिक सुख देने के अतिरिक्त जीवन का अन्य कोई उद्देश्य ही न हो सो प्रेमी !

श्रीराधारमण की कृपा से जिसमें यह दोनों ही गुण हों सो रसिक !

धन्य हैं ऐसे भक्त और धन्य हैं हम सबके राधारमण !!

श्रीराधारमण दासी परिकर

– साभार अंजना अग्रवाल की फेसबुक वाल से

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