पुरस्कार वापसी आंदोलन का पुरस्कार उर्फ अवॉर्ड वापसी गैंग की मज़दूरी का भुगतान

स्वनामधन्य प्रख्यात उर्फ सत्ताई छायावाद के कुख्यात तथाकथित साहित्यकार… अशोक बाजपेयी को पुरस्कार वापसी आंदोलन का बढ़िया सम्मान मिलने जा रहा है. सुना गया है… यह सम्मान बिहार की राजधानी पटना में होना है. इसके लिए बिहार सरकार ने बाकायदा साढ़े तीन करोड़ से ऊपर की रकम का आवंटन भी कर दिया है.

देश में सहिष्णुता तौलने की प्रायोजित राजनैतिक-वैचारिक दूकानदारी के मुख्य मार्केटिंग मैनेजर इन स्वनामधन्य की भूमिका याद करते हुए आगे पढ़िए.

पहले अशोक बाजपेयी दिल्ली में एक आयोजन चाह रहे थे किसी अपनी संस्था के जरिये. नाम था सत्याग्रह विश्व कविता. उस समय साहित्य अकादमी ने अशोक वाजपेयी के प्रस्ताव को नकारते हुए साफ कर दिया था कि वह किसी के साथ साझेदारी में इतना बड़ा आयोजन करने के बजाय.. खुद इस तरह का आयोजन कर सकती है. साहित्य अकादमी ने विश्व कविता समारोह का आयोजन किया भी था, लेकिन उन्हें स्थान नहीं मिला.

केंद्र में सरकार बदलने का दौर आया 2014 में. उसके बाद बिहार में विधानसभा चुनाव के समय को याद करिये. चुनाव के दौरान असहिष्णुता को लेकर देश में माहौल बनाया गया. पुरस्कार वापसी अभियान को संगठित तरीके से चलाया गया. गिरोहों ने प्रायोजित ढंग से इसे अंजाम दिया.

बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के गठबंधन की जीत हुई. उसके बाद अशोक वाजपेयी ने बिहार सरकार को विश्व कविता समारोह का प्रस्ताव दिया. बिहार सरकार ने विश्व कविता समारोह के लिए तीन करोड़ साठ लाख का बजट आवंटित कर दिया है.

ऐसी खबर है कि आयोजन का जिम्मा बिहार संगीत नाटक अकादमी को सौंपा गया है लेकिन… समिति में अशोक वाजपेयी हैं. उन्होंने कविता सम्मेलन के बारे में कहा था कि उन्होंने एक समारोह में मुख्यमंत्री को इस आयोजन का सुझाव दिया था.

इस आयोजन को लेकर बैठक हुई तो वहां अशोक वाजपेयी की तरफ से औपचारिक प्रस्ताव पर विचार किया गया. वाजपेयी उस बैठक में शामिल होने पटना गए.

बैठक में उनके अलावा आलोक धन्वा, अरुण कमल और आरजेडी के नेता दीवाना भी शामिल हुए थे. उस बैठक में तय हुआ था कि समारोह पटना और बिहार के किसी एक और शहर में आयोजित किया जाएगा.

इसी बीच कुछ लोगों ने कहा कि अशोक जी ने इस समारोह से खुद को अलग कर लिया है लेकिन बिहार सरकार और आयोजक संस्था ने अभी तक ऐसी किसी जानकारी से इंकार किया है.

यहाँ इस बात का उल्लेख बहुत जरूरी लगता है कि… देश में भाजपा की सरकार बनने के बाद असहिष्णुता का मुद्दा काफी गरम हुआ था. तमाम स्वनामधन्य लेखकों और साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार वापसी की मुहिम चलायी गयी और ऐसा माहौल बनाया गया जैसे भारत में आक्रांताओं की सरकार बन गयी है.

यह अलग बात है कि जब कश्मीर में सेना के गाल पर आतंकी पैसों के बल से थप्पड़ पड़े और एक जवान को आतताइयों ने पीट-पीट कर मार डाला तब कहीं किसी तथाकथित साहित्यकार और कलाकार के जमीर से असहिष्णुता और घृणा की आवाज़ नहीं आयी.

दिल्ली में कहीं कैंडल मार्च नहीं हुए. कोई अशोक बाजपेयी और कोई मुन्नवर राना ने ज़बान नहीं खोली. किसी रवीश कुमार को इसमें स्क्रिप्ट नज़र नहीं आई, कोई स्क्रीन काली नहीं हुई.

उसकी वजह रचनाधर्मिता की आड़ में इस तरह के काले कारनामे हैं, जो अब अपनी मज़दूरी का भुगतान पा रहे हैं.

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