प्रेम और परवरिश ने तोड़ी मज़हब की दीवार

आप सबके दिल में कभी न कभी तो ये बात आती होगी कि मुसलमान होने के बाद भी मेरी सोच आम मुस्लिमों वाली क्यों नहीं… तो आइए आपको मिलाते हैं उस वजह से…

ये तस्वीर जो आप देख रहे हैं ये हैं श्री महेश चंद्र वशिष्ठ जी, मेरे पिताजी के रीडर हुआ करते थे और एक तरह से अपने स्वभाव की वजह से मित्र भी. मेरे माँ और पिताजी के मृत्यु के बाद इनका मेरे जीवन पर विशेष प्रभाव रहा है.

अपने बेटे की तरह पाला है बिना किसी भेदभाव के बिना मेरा मज़हब बदले. आगे कुछ बदला इन्होंने तो वो हैं मेरे संस्कार. वृन्दावन में निजी खर्चे से इन्होंने आश्रम बनवाया हुआ है उसके साथ लगती गौशाला है जिसमें गुजरात से लायी हुई गिर नस्ल की गायें हैं. अपनी आय में से ये 30 प्रतिशत हिस्सा आश्रम की सेवा में देते हैं.

पुलिस महकमें में होने के बावजूद न कोई नशा करते हैं और आज तक की सर्विस में कोई ये नहीं कह सकता कि महेश पंडित जी ने मुझसे 5 पैसे रिश्वत ली है. मैं आज जो कुछ हूँ इनकी बदौलत हूँ.

एक अनाथ को इन्होंने ज़मीन से उठा कर एक तरह से अपने कंधे पर बिठा दिया. 2007 में मेरी ट्रेनिंग पूरी होने के बारे जब मैं पहली बार इनके सामने आया था बावर्दी तो उस समय इनकी आँखें छलक गयी थीं जैसे कि किसी भी बाप को गर्व हो सकता था जब उसका बेटा उससे भी ऊँचे ओहदे पर चला जाये….
किंतु …मैं चाहे भविष्य में किसी भी पद पर चला जाऊं ….इनके क़दमों की धूल बराबर ही रहूँगा …..ऐसी परवरिश सिर्फ एक हिन्दू ही दे सकता है एक मुसलमान बच्चे को …..इसलिए हिंदुत्व और सनातन धर्म का संसार में कोई सानी नहीं.

आँसू बह चले हैं ये सब लिखते हुए. मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि इन्हें ऐसे ही स्वस्थ रखें और शतायु करें… और आप सबसे भी कहूंगा कि प्रार्थना कीजियेगा कि भगवान ऐसे इंसान बनाता रहे ताकि मेरे जैसे लोग लावारिस न रहें इस दुनिया में.

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