नमो की इजरायल यात्रा से पहले

दुनिया में हिन्दू और यहूदी दो ही जातियाँ ऐसी हैं जिनका अस्तित्व लगातार आक्रमणों, मुसीबतों और समस्याओं से घिरे होने के बावजूद मिटा नहीं है बल्कि अपने पूरे तेज़ के साथ दुनिया को आलोकित किये हुए है. इन दोनों जातियों की दीर्घजीविता का एक रहस्य ये भी है कि हमने अपने धर्मग्रन्थ और धर्मविधानों की हमेशा काल-सापेक्ष व्याख्या की और कभी भी किसी विचार के साथ जड़ नहीं बने रहे. हम दोनों को ही पता है कि आज से हज़ारों-लाखों साल पहले लिखे गये धर्मविधान और किताब तो नहीं बदले जा सकते पर हाँ उनकी काल-सापेक्ष व्याख्या जरूर की जा सकती है.

यहूदियों की किताब उठाकर देखिये, पूरा का पूरा ओल्ड-टेस्टामेंट हिंसा, व्यभिचार, अवैज्ञानिकता, पशु-बलि की कहानियों और आदेश से भरा हुआ है. तौरात यहूदियों का धर्मग्रंथ हैं, इसके बिलकुल शुरूआती किताब “बुक ऑफ़ जेनिसेस” में आदम, उनकी पत्नी हव्वा तथा उनकी संतानों का वर्णन है. आदम के पहले दो बेटे हुये, एक का नाम था केन और दूसरे का एबल. दोनों अलग-अलग कार्य-व्यवसाय में लगे थे, एबल चरवाहा था और केन खेती करता था. दोनों ने ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये उन्हें भेंट अर्पित करने का निश्चय किया. एबल ने अपनी सर्वोत्तम भेड़ों में से कुछ पहलौठे मेमने छांटे और प्रभु के लिये उसकी कुर्बानी थी और उधर केन ने अपनी उपज का कुछ अंश प्रभु को अर्पित किया. प्रभु केन की भेंट देखकर नाराज़ हो गये और एबल के भेंट को स्वीकार कर लिया.

इन कथा का अर्थ है कि यहूदियों की ये आदिम काल से मान्यता रही है कि पशु-बलि और जीव-हत्या जेहोवा को आनंदित करने का सबसे बड़ा जरिया है और प्रभु इसके सिवा किसी और भेंट को स्वीकार नहीं करता.

यहूदी समाज तो तौरात और तालमूद के साथ इतना बंधा हुआ है कि उन्होंने इजरायल प्राप्ति के पश्चात लगभग मृत हो चुके हिब्रू भाषा को पुनर्जीवित किया पर तौरात और तालमूद के साथ बंधे यहूदी समाज ने अपने ग्रंथों और धर्मविधानों की काल-सापेक्ष व्याख्या का साहस दिखाया. उन्होंने एक तरफ जहाँ पशु-बलि को प्रतीक रूप में अपनाया तो दूसरी तरफ अपने ग्रंथों में वर्णित कई क्रूर और हिंसक आदेशों की समयानुकूल व्याख्या कर उसे सबके लिये स्वीकार्य बनाया. जेहोवा सिर्फ पशु-बलि से प्रसन्न होगा इस मान्यता को भी उन्होंने छोड़ दिया.

हम हिन्दू भी ऐसे ही हैं, हमने न केवल अपने किताबों की युगानुकुल व्याख्या की बल्कि अपनी परंपराओं को विश्व-कल्याण और पर्यावरण रक्षण के अनुरूप परिवर्तित भी किया. ताज़ा उदाहरण है पिछली बार गणपति उत्सव के लिए इको-फ्रेंडली गणेश मूर्तियों की स्थापना करना. हिन्दू चिंतन तो प्रकृति-पूजन ही है, इसलिये जब गणपति की मूर्ति विसर्जन पर्यावरण के लिये संकट बन रही थी तो हमने फ़ौरन इको-फ्रेंडली गणेश जी की मूर्तियाँ स्थापित करने का साहसिक कदम उठाया और इस फैसले से न तो हमारा धर्म कमजोर हुआ, न आस्था में कमी आई और न ही हमारा हिंदुत्व खतरे में आया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इको-फ्रेंडली गणपति स्थापना की अपील की और हमने तुरंत हामी भर दी क्योंकि हमारे संस्कार में प्रकृति को भोग्या नहीं बल्कि माँ समझने का संस्कार है और माँ को हमारे किसी काम से हानि पहुंचे ये हम कभी नहीं कर सकते. युगानुकुल धर्मविधान या किसी स्थापित परंपरा को परिवर्तित करने का हमारा ऐसा साहसिक कदम कोई पहली बार नहीं उठा है, पिछले वर्ष नेपाल में आयोजित गढ़ीमाई उत्सव के दौरान होने वाले पशु-बलि के क्रूर तस्वीर सामने आये, किरकिरी हुई फिर हमें भी लगा कि यह विकृत परंपरा शायद कभी गलती से हमारी परंपरा में शामिल हो गये हैं इसलिये ये बंद होना चाहिये और गलती महसूस होते ही गढ़ीमाई उत्सव प्रबंधन समिति ने पशु-बलि की घृणित प्रथा को पूर्णतया रोक दिया. हिंदुत्व प्रकृति पूजक धर्म है, हमारे ऋषियों ने प्रकृति की हर शक्ति की उपासना देव रूप में की है इसलिये ऐसे किसी भी कृत्य से परहेज करना जो प्रकृति के लिये ठीक नहीं हमारी नज़र में पूजा ही है.

इन समानताओं के साथ हिन्दू और यहूदी समाज में एक बड़ी समानता ये भी है कि धर्म और राष्ट्र हमारे लिये एकाकार हैं, जैसे हिंदुत्व और भारत पर्याय हैं वैसे ही यहूदी और इजरायल आपस में पर्याय है.

विश्व को शांति, सद्भाव, सह-अस्तित्व देने के लिये उपयुक्त तत्वज्ञान हमारे पास है, इस सदी का विज्ञान भी हिन्दू चिंतन के समर्थन में खड़ा है. हिंदुत्व के अध्येता जो स्वयं हिन्दू नहीं हैं वो भी बता रहे हैं कि विश्व को शांति, सद्भाव, सह-अस्तित्व देने वाले अगर कोई है तो केवल हिंदुत्व का तत्वज्ञान है पर उसे धारण करने वाला हिन्दू समाज दुर्बल और भ्रमित है, इसके इतर यहूदी दुर्बल नहीं है, वो किसी भ्रम में भी नहीं है. वो न तो अपनी अतीत की गलती को दुहराता है और न ही अपने राष्ट्र और मजहब के रक्षण को लेकर कोई भ्रम पालता है, शत्रु को लेकर भी उनकी नीति बड़ी स्पष्ट है और ज्ञान-विज्ञान और तकनीक में तो विश्व में वो अजेय हैं ही.

हम यहूदी समाज से कुछ सीखें, अपनी कमियों को दूर करें ताकि दुर्बल हुआ हमारा समाज पुनः सबल हो. हिन्दू-यहूदी और भारत-इजरायल गठजोड़ बढ़े ताकि फिर से विश्व क्षितिज पर सिर्फ और सिर्फ भारत का ही तेज़ आलोकित हो. इन्हीं सद-कामनाओं के साथ ..

भारत माता की जय ………. जियानवाद अमर रहे.

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