पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है? प्रार्थना की भी कोई विधि है?

रामकृष्ण के जीवन में ऐसा उल्लेख है. एक शूद्र महिला, रानी रासमणि ने मंदिर बनवाया. चूंकि वह शूद्र थी, उसके मंदिर में कोई ब्राह्मण पूजा करने को राजी न हुआ. हालांकि रासमणि खुद भी कभी मंदिर में अंदर नहीं गई थी, क्योंकि कहीं मंदिर अपवित्र न हो जाए! यह तो ब्राह्मण होने का लक्षण हुआ. जो अपने को शूद्र समझे, वह ब्राह्मण. जो अपने को ब्राह्मण समझे, वह शूद्र.

रासमणि कभी मंदिर के पास भी नहीं गई, भीतर भी नहीं गई, बाहर-बाहर से घूम आती थी. दक्षिणेश्वर का विशाल मंदिर उसने बनाया था, लेकिन कोई पुजारी न मिलता था. और रासमणि शूद्र थी, इसलिए वह खुद पूजा न कर सकती थी. मंदिर क्या बिना पूजा के रह जाएगा? वह बड़ी दुखी थी, बड़ी पीड़ित थी. रोती थी, चिल्लाती थी–कि कोई पुजारी भेज दो!

फिर किसी ने खबर दी कि गदाधर नाम का एक ब्राह्मण लड़का है, उसका दिमाग थोड़ा गड़बड़ है, शायद वह राजी हो जाए. क्योंकि यह दुनिया इतनी समझदार है कि इसमें शायद गड़बड़ दिमाग के लोग ही कभी थोड़े से समझदार हों तो हों. यह गदाधर ही बाद में रामकृष्ण बना.

गदाधर को पूछा. उसने कहा कि ठीक है, आ जाएंगे. उसने एक बार भी न कहा कि ब्राह्मण होकर मैं शूद्र के मंदिर में कैसे जाऊं? गदाधर ने कहा, ठीक है. प्रार्थना यहां करते हैं, वहां करेंगे. घर के लोगों ने भी रोका, मित्रों ने भी कहा कि कहीं और नौकरी दिला देंगे. नौकरी के पीछे अपने धर्म को खो रहा है? पर गदाधर ने कहा, नौकरी का सवाल नहीं है; भगवान बिना पूजा के रह जाएं, यह बात जंचती नहीं; करेंगे.

मगर तब खबर रासमणि को मिली कि यह पूजा तो करेगा, लेकिन पूजा में यह दीक्षित नहीं है. इसने कभी पूजा की नहीं है. यह अपने घर ही करता रहा है. इसकी पूजा का कोई शास्त्रीय ढंग, विधि-विधान नहीं है. और इसकी पूजा भी जरा अनूठी है. कभी करता है, कभी नहीं भी करता. कभी दिन भर करता है, कभी महीनों भूल जाता है. और भी इसमें कुछ गड़बड़ हैं; कि यह भी खबर आई है कि यह पूजा करते वक्त पहले खुद भोग लगा लेता है अपने को, फिर भगवान को लगाता है. खुद चख लेता है मिठाई वगैरह हो तो. रासमणि ने कहा, अब आने दो. कम से कम कोई तो आता है.

वह आया, लेकिन ये गड़बड़ें शुरू हो गईं. कभी पूजा होती, कभी मंदिर के द्वार बंद रहते. कभी दिन बीत जाते, घंटा न बजता, दीया न जलता; और कभी ऐसा होता कि सुबह से प्रार्थना चलती तो बारह-बारह घंटे नाचते ही रहते रामकृष्ण.

आखिर रासमणि ने कहा कि यह कैसे होगा? ट्रस्टी हैं मंदिर के, उन्होंने बैठक बुलाई. उन्होंने कहा, यह किस तरह की पूजा है? किस शास्त्र में लिखी है?

रामकृष्ण ने कहा, शास्त्र से पूजा का क्या संबंध है? पूजा प्रेम की है. जब मन ही नहीं होता करने का, तो करना गलत होगा. और वह तो पहचान ही लेगा कि बिना मन के किया जा रहा है. तुम्हारे लिए थोड़े ही पूजा कर रहा हूं. उसको मैं धोखा न दे सकूंगा. जब मन ही करने का नहीं हो रहा, जब भाव ही नहीं उठता, तो झूठे आंसू बहाऊंगा, तो परमात्मा पहचान लेगा. वह तो पूजा न करने से भी बड़ा पाप हो जाएगा कि भगवान को धोखा दे रहा हूं. जब उठता है भाव तो इकट्ठी कर लेता हूं. दो-तीन सप्ताह की एक दिन में निपटा देता हूं. लेकिन बिना भाव के मैं पूजा न करूंगा.

और उन्होंने कहा, तुम्हारा कुछ विधि-विधान नहीं मालूम पड़ता. कहां से शुरू करते, कहां अंत करते.

रामकृष्ण ने कहा, वह जैसा करवाता है, वैसा हम करते हैं. हम अपना विधि-विधान उस पर थोपते नहीं. यह कोई क्रियाकांड नहीं है, पूजा है. यह प्रेम है. रोज जैसी भाव-दशा होती है, वैसा होता है. कभी पहले फूल चढ़ाते हैं, कभी पहले आरती करते हैं. कभी नाचते हैं, कभी शांत बैठते हैं. कभी घंटा बजाते हैं, कभी नहीं भी बजाते. जैसा आविर्भाव होता है भीतर, जैसा वह करवाता है, वैसा करते हैं. हम कोई करने वाले नहीं.

उन्होंने कहा, यह भी जाने दो. लेकिन यह तो बात गुनाह की है कि तुम पहले खुद चख लेते हो, फिर भगवान को भोग लगाते हो! कहीं दुनिया में ऐसा सुना नहीं. पहले भगवान को भोग लगाओ, फिर प्रसाद ग्रहण करो. तुम भोग खुद को लगाते हो, प्रसाद भगवान को देते हो.

रामकृष्ण ने कहा, यह तो मैं कभी न कर सकूंगा. जैसा मैं करता हूं, वैसा ही करूंगा. मेरी मां भी जब कुछ बनाती थी तो पहले खुद चख लेती थी, फिर मुझे देती थी. पता नहीं, देने योग्य है भी या नहीं. कभी मिठाई में शक्कर ज्यादा होती है, मुझे ही नहीं जंचती, तो मैं उसे नहीं लगाता. कभी शक्कर होती ही नहीं, मुझे ही नहीं जंचती, तो भगवान को कैसे प्रीतिकर लगेगी? जो मेरी मां न कर सकी मेरे लिए, वह मैं परमात्मा के लिए नहीं कर सकता हूं.

ऐसे प्रेम से जो भक्ति उठती है, वह तो रोज-रोज नई होगी. उसका कोई क्रियाकांड नहीं हो सकता. उसका कोई बंधा हुआ ढांचा नहीं हो सकता. प्रेम भी कहीं ढांचे में हुआ है? पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है? प्रार्थना की भी कोई विधि है? वह तो भाव का सहज आवेदन है. भाव की तरंग है.

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