धर्म परिवर्तन के गिरोहों, आदिकाल से चले आ रहे आदिधर्म के आदिदेव का नाम महाकाल भी है

इस देश में जब ईसाई धर्म को मानने वाले आये तो क्या उन्होंने यहां अपना नया धर्म ग्रंथ रचा? नहीं. वे बाईबिल को ही मानते और ईसा मसीह को ही पूजते रहे. इस देश में इस्लाम को मानने वाले आये तो क्या उन्होंने भी यहां कोई अपने लिए नया धर्मग्रंथ लिखा? नहीं. वे कुरान को ही मानते हैं.

यही नहीं, भारत में रहने वालों में से जिन्होंने ईसाई या इस्लाम धर्म स्वीकार किया वे भी सम्बंधित मूल धर्म ग्रंथों के साथ-साथ इन धर्मो के मूल स्थान की आस्था और संस्कृति को मानने लगे. वे हर बात के लिए रोम और मक्का की ओर देखते हैं.

ठीक इसी तरह सदियों पहले हिंदूइज़्म और बुद्धइज़्म जब भारत से बाहर गए तो वहां के लोग जिन्होंने इस आस्था को स्वीकार किया वे भारत की ओर ही देखते हैं और यहां की मान्यताओं को ही मानते रहे हैं.

तो फिर एक सीधा सरल सा सवाल उठता है कि आर्य अगर बाहर से आये थे तो अपने साथ कौन सा ग्रन्थ और आस्था ले कर आये? उलटे उनका एकमात्र पूज्य ग्रंथ ऋग्वेद तो सप्त सिंधु अर्थात हिमालय और सिंधु-सरस्वती के साथ जुड़ा हुआ है.

आर्यों के साहित्य में कहीं भी किसी अन्य मातृ स्थान का उल्लेख नहीं मिलता. अगर वो कहीं बाहर से आये होते तो जाहिर है कि अपनी भूमि और अपने घर को किसी ना किसी तरह याद करते. क्या उन्हें होम सिकनेस नहीं होनी चाहिए थी. जैसे मुग़ल हमेशा अपने मूल स्थान को याद करते रहे.

अतः यह सोचना भी कितना हास्यास्पद है कि कोई सभ्यता जिसके पास संस्कृत जैसी सशक्त भाषा हो और वेद जैसा महान और प्राचीनतम ग्रंथ हो वे अपना मूल स्थान छोड़ कर किसी और जगह जाकर बसेंगे. और तो और दूर देश में जाकर अपना श्रेष्ठ रचेंगे. मगर यह झूठ कि आर्य बाहरी थे, आक्रमणकारी थे, जान बूझ कर भारत में फैलाया गया. वो भी पिछले दो सौ साल में, पहले अंग्रेज द्वारा फिर वामपंथी द्वारा.

आर्य आक्रमण सिद्धांत बहुत ही सुनियोजित तरीके से आर्य बनाम द्रविड़ के विवाद को बढ़ावा देने का षड्यंत्र रहा है और इसका उद्देश्य समझना कोई मुश्किल काम नहीं. जिसका मकसद यहां फूट डालना है. यह प्रमाणित करना और यहां के मूल निवासी को यह बतलाना कि यहां बाहर से लोग आते रहे हैं. जिससे बाहर से आये मुगलों और अंग्रेज मिशनरी का आना स्वाभाविक रूप से यहां स्वीकार्य हो जाए.

इसीलिए आर्यों से सम्बंधित वेद, संस्कृत, गंगा, गाय, गीता पर तरह तरह से प्रहार हो रहे हैं और होते रहेंगे, और कुछ स्थानीय लोगों को इन से सुनियोजित ढंग से दूर किया जाएगा. जिसके कारण भारत के लोग दो भागों में बट जाएँ. इस तरह से हिन्दू के मूल पर प्रहार करके सनातन धर्म की निरंतरता को तोड़ना है.

संक्षिप्त में कहें तो आर्यों को अलग बता कर हमारी जड़ों को खोखला करना है. सच कहें तो वैश्व‍िक बौद्ध‍िकता ने अपने आपको धर्मान्तरण कराने वाले गिरोह के हाथों बेच दिया है. और इनका मकसद साफ़ है कि अगर मुसलमानों और अंग्रेजों को हमलावर बोलते हो तो आर्य भी हमलावर थे.

मूल निवासी वाद के मूल में यही है कि इस प्रक्रिया में हिंदुस्तान जितना टूट सकता है, टूट जाए, बंट जाए. जिससे अंत में इस देश पर ईसाई या इस्लाम का आधिपत्य हो जाये. इसलिए, आर्य बाहरी थे, इस झूठ को स्कूल से लेकर हर जगह हर तरह से बोला-लिखा जाता है.

अब जिसका मकसद ही झूठ फैलाना है उसे आप चाहे जितने तर्क और तथ्य दे दो वो अपना राग अलापता ही रहेगा. और यही हो रहा है. हम उनके साथ बेवजह बहस में फंस जाते हैं. जबकि उनसे उपरोक्त सीधे सरल सवाल पूछे जाने चाहिए और उन्ही सवालों पर अड़े रहना चाहिए. जब तक उसका जवाब नहीं दे लेते तब तक किसी बातचीत में उलझने का कोई आचित्य नहीं.

इसी तरह के कुछ और सरल और सीधे सवाल मैंने पहले एक लेख (क्यों फैलाया गया आर्य आक्रमण और उनके बाहरी होने का झूठ) पर भी किये थे जिस पर कोई वामपंथी अपना जवाब नहीं दे पाया और इधर उधर की बात ही करता रहा.

इन मूल निवासी के तथाकथित समर्थकों से यह भी तो पूछना चाहिए कि इनका यह ज्ञान तिब्बत के मूल निवासी या इसराइल के यहूदियों के लिए क्यों नहीं जागता. अमेरिका में पनप रहे सभी प्लांटेड बौद्धिक ज्ञानी अमेरिका के मूल निवासी के लिए क्यों नहीं अपना प्रेम प्रगट करते. जबकि इनके तथाकथित अमेरिकी उच्च विश्वविद्यालयों की नींव में अमेरिका के मूल निवासियों का ही खून है.

अमेरिका के मूल निवासी के साथ यूरोप द्वारा किया अतिक्रमण का इतिहास अधिक पुराना नहीं और जगजाहिर है. अफ्रिका और अमेरिका के मूल निवासियों के साथ किये गए अत्याचार पर इन प्लांटेड बौद्धिक लोगों की ना कलम चलती है ना ही इनकी नजर जाती है.

बहरहाल, अंत में सरल और सीधे सपाट शब्दों में यही कहना चाहूंगा कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोग ऋग्वेदीय आर्य ही थे. वेदों की रचना यही इस भूमि पर एक दिन या एक पीढ़ी द्वारा नहीं की गई. यह हजारों साल में कई पीढ़ियों द्वारा धीरे-धीरे परिष्कृत होकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में श्रुति के द्वारा पहुंची.

वैदिक सभ्यता से लेकर सिंधु-सरसवती सभ्यता और आज तक के भारत के जीवन संस्कृति और मानवीय सभ्यता के विकासक्रम में एक निरंतरता है.आदिकाल से चली आ रही यह निरंतरता ही सनातन धर्म है. यह देवभूमि है जहाँ आदिकाल से एक आदि संस्कृति पनपी जहां आदिदेव पूजे गए.

यह वही आदिदेव हैं जिन्हे मेसोपोटामिया से लेकर अरब और ग्रीक और अन्य सभ्यताएं पूजती रही हैं, अलग-अलग रूप में अलग-अलग तरह से. अब भारत के आर्यों की संतानों को छोड़ कर, विश्व के अन्य लोगों ने उस आदिदेव को भूलकर नए-नए देवता चुन लिए और नई-नई पूजा पद्धति को स्वीकार कर लिया तो इससे आदि इतिहास तो समाप्त नहीं हो जाता.

धर्म परिवर्तन गिरोह के लोगों, लाख कोशिश कर लो यह कभी नहीं कह पाओगे कि दुनिया सिर्फ 2000 साल पहले या 1400 साल पहले ही जन्मी थी. ध्यान रहे, आदिकाल से चले आ रहे आदिधर्म सनातन के आदिदेव का नाम महाकाल भी है, जिन्हें किसी काल और स्थान की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY