ज़हर और नफ़रत की कौन सी खेती है यह?

एनडीटीवी की तमाम रिपोर्टें बता रही हैं कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं. भारत के हर किसी हिस्से में चुन-चुन कर मुसलमान मारे जा रहे हैं. ट्रेन में, यूनिवर्सिटी में, कश्मीर में, हरियाणा में, झारखंड में, उत्तर प्रदेश में, राजस्थान में, दिल्ली में. यहां, वहां हर कहीं मुसलमान मारे जा रहे हैं. भीड़ मार रही है.

यह भीड़ गोरक्षकों की भीड़ है. तीन-चार घटनाओं के ब्यौरों में लथपथ आधे-आधे घंटों की इन रिपोर्टों में सिर्फ मुसलमानों के मारे जाने की खबर दो-तीन दिन से देख रहा हूं. खास कर रवीश की एक रिपोर्ट तो भयानक तस्वीर पेश करती है.

रवीश की इसी रिपोर्ट के ब्यौरे बाकी रिपोर्टों में भी हैं. रवीश की रिपोर्ट लेकिन डॉक्यूमेंट्री की कलात्मकता से सराबोर है. रिपोर्ट में लगातार ट्रेन चलती रहती है तरह-तरह से. लेकिन मन में डर बोती हुई, भय की भयानक तसवीर प्रस्तुत करती रवीश की रिपोर्ट की मानें तो भारत में मुसलमान अब हरगिज सुरक्षित नहीं हैं.

हिंदुओं की भीड़ उन्हें मारती जा रही है. गोया यह हिंदुओं की भीड़ नहीं, मुहम्मद गोरी या महमूद गजनवी की खूंखार और आक्रमणकारी सेना हो. हिंदी, अंगरेजी में लिखे कैप्शन, वॉयस ओवर, नैरेशन और पीड़ित परिवारों के बयान के बीच चलती ट्रेन, ट्रेनों के बदलते ट्रैक की आवाज़ बहुत डराती है. रवीश कुमार खुद भी बहुत डरे दीखते हैं इस रिपोर्ट को पेश करते हुए.

मिस्टर रवीश कुमार यह कौन सा भारत है, भारत की यह कौन सी पत्रकारिता है, यह कौन सी तसवीर पेश कर रहे हैं आप. यह कौन से मुसलमान और कौन से हिंदू, कौन से गोरक्षक और कौन सी भीड़ है जो पूरे देश में कोहराम मचाए हुए हैं.

पत्रकारिता के नाम पर यह कर क्या रहे हैं आप? ज़हर और नफ़रत की कौन सी खेती है यह? देश को गृह युद्ध की तरफ ढकेलने के लिए ऐसी रिपोर्ट पेश करना इतना ज़रुरी है? शर्म कीजिए रवीश कुमार, शर्म करो एनडीटीवी. अति की भी एक सीमा होती है. भारत के मुसलमान क्या गाजर, मूली हैं, जो इस तरह कटते जा रहे हैं और हिंदू उन्हें काटे जा रहे हैं.

फिर भी रवीश और एनडीटीवी की रिपोर्टों की आंख से देख कर एक सवाल यह भी बनता है कि अगर देश में मुसलमानों के खिलाफ इतना ख़राब माहौल बना है तो आखिर क्यों? क्या सिर्फ़ इस लिए कि भाजपा सरकार है. या कुछ और भी है? सभ्य समाज और देश के लिए यह सोचना बहुत ज़रूरी है.

मुसलमानों को भी सोचना चाहिए कि उन के खिलाफ भारत में ही नहीं, दुनिया भर में माहौल क्यों बन गया है. क्या उन को अपने भीतर सुधार की ज़रूरत नहीं है.

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