भारत या हमसे जुड़ी हर चीज़ से तकलीफ़ है इन्हें

ज़ाकिर नाइक को आपने विज्ञान पर कभी लेक्चर देते सुना है? अगर सुना होगा तो याद करिये कि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में मुस्लिमों की देन पर वो क्या बोलता है. अपनी तक़रीर में बड़ी बेशर्मी से वो सब चीज़ों की खोज का श्रेय अरब को दे देता है.

मज़े की बात है कि शून्य और अंकों की खोज से लेकर बीजगणित, ज्यामिति, दाशमिक प्रणाली, त्रिकोणमिति और पायथागोरस के सिद्धांत को भी वो अरबों की देन बताता है जिसके बारे में निर्विवाद है कि उसे हमारे पूर्वजों ने खोजा.

उसकी ये बेशर्मी यहीं तक नहीं है, जिस ज्ञान के लिये दुनिया चरक और सुश्रुत की एहसानमंद है, ज़ाकिर की नज़र में वो चिकित्सीय-ज्ञान तो अरब से निकला था.

खैर, ज़ाकिर जैसी अरबी भेड़ अगर अपने पूर्वजों के प्रति घृणा प्रदर्शित करे तो ताअज्जुब नहीं होता. ताअज्जुब तब होता है कि जब मौलाना वहीदुद्दीन खान जैसे बड़े मुस्लिम विद्वान (जिनका गैर-मुस्लिमों में भी बड़ा सम्मान है) ऐसा करते हैं.

आज उनकी एक किताब पढ़ रहा था, किताब का नाम है “रास्ते बंद नहीं”. एक ये प्रेरक किताब के रूप में काफ़ी अच्छी है पर दुःख के साथ कहना पड़ता है कि वहीदुद्दीन खान भी उसी मनोरोग से ग्रस्त हैं जिससे ज़ाकिर नाइक पीड़ित है.

इस किताब में एक “पत्थर के सबक” नाम से एक छोटा प्रेरणादायी प्रसंग है. वहीदुद्दीन खान साहेब लिखते हैं कि राजस्थान का एक छात्र हाईस्कूल की परीक्षा में एक के बाद एक लगातार तीन साल फेल हो गया, फिर इस निराशा में वो घर से भाग गया. रास्ते में उसे प्यास लगी तो उसने एक कुआँ देखा जहाँ कुछ महिलायें पानी भर रही थीं.

उसने देखा की जिस पत्थर पर पानी भरने वाले घड़ा रखते हैं वो घिस चुका है. इसे देखकर उसने सोचा कि जब बार-बार रखे जाने से एक मिट्टी का घड़ा पत्थर को घिस सकता है तो अगर मैं भी लगातार मेहनत करूं तो क्यों पास नहीं होऊंगा और फिर उससे प्रेरणा पाकर वह घर लौट गया और फिर उसने जी-तोड़ मेहनत की और प्रथम श्रेणी में कामयाब हुआ.

अब बताइए जिस देश का बच्चा-बच्चा ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान’ वाली दोहा पढ़कर बड़ा होता है, क्या उसे नहीं पता कि ये मूल प्रसंग ‘वरदराज’ से जुड़ा है, जो कभी मंदबुद्धि हुआ करते थे पर एक कुएं पर लगातार घिस रही रस्सी को देखकर उससे प्रेरणा पाकर विद्वान् बने और संस्कृत में मुग्धबोध और लघुसिद्धांत कौमुदी जैसे ग्रंथों की रचना की.

वरदराज के कुएं वाली ये कथा इस देश में मैंने भी पढ़ी, आपने भी पढ़ी और हम सबने पढ़ी तो फिर ये कैसे माना जाये कि मौलाना वहीदुद्दीन खान जैसे बड़े मुस्लिम विद्वान (जिनकी किताब लोकप्रियता के चलते इस्लामिक देशों में थोक में बिकती है) इस कथा के बारे में नहीं जानते होंगे?

और अगर जानते हुये भी उन्होंने वरदराज की कथा को राजस्थान के किसी काल्पनिक बालक से जोड़ा फिर हम भी क्यों न वी एस नायपॉल की उस बात कर यकीन कर लें जो उन्होंने अपने लम्बे अनुभव के निष्कर्ष रूप में कहा था. नायपॉल ने अपनी किताब में लिखा था –

“एक मतान्तरित गैर-अरबी मुस्लिम अपने को हर जाहिलिया से इतर दिखाने की ज़िद में अपने ही पूर्व के इतिहास, संस्कृति और पूर्वजों को खारिज करता है. यह एक ही साथ एक प्रकार की गहरी हीन-भावना तथा इस्लामिक अहंकार का मिश्रण है”.

ज़ाकिर की तरह ही मौलाना वहीदुद्दीन खान द्वारा भी अपने सम्पूर्ण अतीत और पूर्वजों के योगदान को झुठलाने तथा उनके स्मरण को कुफ्र समझने के पीछे भी यही मानसिकता है और दरअसल बात ये है कि इनको हर उस चीज़ से तकलीफ़ है जो भारत या हमसे जुड़ी है.

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