आषाढ़ के उस एक दिन, क्रांति आने वाली थी, किरांती बस आने ही वाली थी…

photo courtesy : pib.nic.in

आषाढ़ का एक दिन, सप्तमी तिथि, विक्रम संवत 2074… वैसे तो ये तारीख 1 जुलाई 2017 की है मगर अब हिंदुत्व का प्रभाव आषाढ़ के बादलों सा ही विश्व पर व्याप्त हुआ दिखता है. तारीख़ बदल गई है, अब तिथि कहलाती है.

कुछ ही साल पहले बुद्धिपिशाचों ने इनकार में सर हिलाया था. ‘कोई मोदी लहर नहीं आ रही’ का राग पंचम सुर में भी सुनाया था. लहर सचमुच नहीं आई, सूनामी आई थी. मठ बहे, गढ़ ध्वस्त हुए.

सन सैंतालिस से काफी पहले से राज करती आ रही ए. ओ. ह्यूम्स की बनायी पार्टी की चतुरंगिनी सेनायें हिंदुत्व के ज्वार में ऐसे समाई मानों साक्षात काल ही अपने विशाल जबड़े फैलाए महारथियों को लीले जाता हो.

बैसाखी चोर इस्लामिक रिपब्लिक तक मदद मांगने भागे. अर्थ शास्त्रियों की लुंगी से बेनामी सम्पत्ति की बहियाँ जब्त कर ली गई. जैसा कि आक्रमण के बाद होता है, आखिर एक दिन नए चक्रवर्ती ने मुद्रा तक बदल डाली.

हाहाकार रह-रह कर उठता था, मगर आम जन की तनी भृकुटियाँ देख, आवाज उठाने वालों की आवाज भी चालीस से चार डेसिबल पर आ, मिमियाने लगती थी. नेपथ्य से लात खाए श्वान सदृश्य क्याऊं-क्याऊं की सी ध्वनि आई.

हमने झुककर पूछा, क्या हुआ साथी? कोने में सिमटे रविशुद्दीन के विस्फरित नेत्रों में भय व्याप्त था, कहीं दूर की ओर इशारा करते वो फुसफुसाए, ये आहट सुनते हो? फासीवाद आ गया है साथी! कलम पर पहरे थे, आवाज उठाने वाले ही उठा दिए गए थे.

मासूम भटका हुआ समुदाय विशेष मुफलिसी में दिन गुजारने को मजबूर था. उसके खाने-पीने की चीज़ों, यहाँ तक की गोश्त पर भी पाबंदियां लगाईं जा रही थी. घर में पकाए जाने पर क़त्ल होता था, कच्चे गोश्त की तलब पर भी सख्त पहरे बिठा दिए गए थे. लव जिहाद अब भी होता है कि नहीं होता, ये सवाल बाकी था.

कल तक अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी था, आज जाने कैसे धोती वालों को विश्वविद्यालयों में बिठाया जाने लगा था. कल बौद्धिक वर्ग के लिए, अंग्रेजी लिखना जानते हों तो अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, भूगोल, इतिहास, कोई भी ज्ञान मैंडेटरी नहीं था. केवल चुस्त भाषा काफी है.

अधेड़ वय तक छात्र राजनीति से जुड़ाव (हॉस्टल कब्जा, फेलोशिप) रहे तो हर विषय पर आपसे पूछने अख़बारनवीस पहुँचते थे. मुंबई से पुणे भी जो कल फ्लाइट से जा रहे थे उनकी प्रज्ञा के लिए अब पिनकोड का प्रमाण काफी नहीं रहा.

भूख से, और कच्चे गोश्त की भूख के साथ-साथ प्यास से बिलबिलाते, लाल गढ़ और प्रचार के मठों में अपने जख्म सहलाते बुद्धिपिशाचों ने अपनी कलम निकाली. फ्लेंक अटैक की मुद्रा में आये ‘रेजिस्टेंस’ ने ‘यू आर द रेजिस्टेंस’ का नारा बुलंद किया.

किताबें बाजार में उतरी तो जरूर, बौद्धिक मठों से उनका प्रचार भी भरपूर हुआ, मगर जमीन पर अब भाषा ही बदल दी गई थी. हिंदी ना अब वो हिंदी रही, ना अंग्रेजी अभिजात्यों की भाषा बची थी. गंगा-जामुनी तहजीब का जाने कैसा मतलब निकाल कर मूर्खों ने सब घालमेल कर डाला था.

आलोचकों की कोई सुनता ना था. पुरस्कार लौटाए जाने पर इनाम में मिली रकम वापिस करने की छींटाकशी होती. कैसे वापिस करते रकम? किरांती पेय सस्ता भी तो नहीं होता! ऊपर से टूटती कमर पर ये जी.एस.टी. का प्रहार!

कलम-कागज, लैपटॉप-स्मार्ट फोन भी 12 से 18 फीसदी के टैक्स में आम इंसान की पहुँच के और पास हो चला था. वो फिर से पोर्टल पर, सोशल मीडिया पर, और अपनी कलम से घर के कागज़ पर अभिजात्यों की किताबों को घटिया कहने वाले थे.

जीएसटी से सैकड़ों बरबाद हुए, हजारों मरे, लाखों की रोजी-रोटी छिनी, यहाँ दंगा, वहाँ आगजनी, कहाँ विक्षोभ. यह मुसलमान, दलित, फेडरल स्ट्रक्चर, स्त्रियों के खिलाफ है. स्त्रियाँ अब गाय का मुखौटा पहने बिना सुरक्षित कहाँ हैं? पहन भी लें तो कहीं केरल में काट दी जाएँगी, कहीं अख़लाक़ के फ्रिज में पायी जायेंगी.

हम सबके विरोध में लिखते जो जी.एस.टी. से टमाटर महंगा ना हुआ होता. ये हमें विरोध में टमाटर भी चलाने नहीं देना चाहता, ऊपर से ना तो शराब पर जी.एस.टी. लगाया, ना पेट्रोल पर! हम नशे में हुल्लड़ करें कैसे साथी, हम आग लगायें कैसे मुल्क को? मगर मुखर होते आम जन, महंगी हुई शराब, कहीं किसानों को ना मिलते उचित दाम, तो कहीं महंगे हुए टमाटर के खिलाफ, लड़ेंगे साथी.

हम कागजों में लड़ेंगे साथी, हम भाषणों में लड़ेंगे साथी, हम पांच सितारा कांफ्रेंस में लड़ेंगे साथी, हम विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए कविता की आलोचना लिखने में लड़ेंगे साथी, हम विश्वविद्यालय की नवयौवनाओं के लिए कविताएँ चुराने में लड़ेंगे साथी… हम लड़ेंगे साथी…

हम जी.एस.टी. ना भी समझे तो क्या? हम हर परिवर्तन, हर सुधार से लड़ेंगे साथी! ओजपूर्ण वक्तव्यों से दिवार के सहारे रविशुद्दीन अब खड़े हो गए थे. उन्होंने माइम भी बुलवा लिए थे. स्क्रीन रंगने के लिए वो इधर-उधर काले पेंट का डब्बा ढूंढ रहे थे. आषाढ़ के उस एक दिन, क्रांति आने वाली थी, किरांती बस आने ही वाली थी…

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