प्रधानमंत्री के बाद सबसे कुशल और चतुर मंत्री जेटली

जेटली जी से अधिकतर लोग नाराज़ रहते हैं, लेकिन मुझे आज भी लगता है कि मोदी सरकार में प्रधानमंत्री के बाद सबसे कुशल और चतुर मंत्री अरुण जेटली ही हैं. ये बात अलग है कि औरों की तुलना में वे प्रचार से दूर रहते हैं.

जेटली जी की आलोचना में एक तर्क ये आता है कि वो मोदी लहर के बावजूद 2014 का चुनाव हार गए थे और राज्यसभा से संसद में आए. लेकिन मेरा सुझाव है कि सुरेश प्रभु और मनोहर पर्रीकर सहित मोदी सरकार के और भी कितने मंत्री राज्यसभा से रहे हैं, एक बार वो गिनती भी तो कर लीजिए.

जेटली जी की आलोचना करने वालों का दूसरा तर्क ये रहता है कि वे ‘देसी’ टाइप के नहीं है, बल्कि लुटियंस के पेज थ्री कल्चर वाले हाई प्रोफाइल लोगों के दोस्त हैं. लेकिन मुझे ये गलत नहीं लगता. बल्कि मेरी राय है कि लुटियंस गैंग से जेटली जी की दोस्ती से फायदा मोदी सरकार को ही होता है. आखिर गुजरात के मोदी-शाह को दिल्ली के रंग-ढंग समझाने में जेटली जी की बड़ी भूमिका रही है.

इसके अलावा भी सरकार हो या पार्टी, दोनों को ही अपना काम निकलवाने के लिए हर वर्ग और हर तरह के लोगों से संपर्क रखना पड़ता है. जिस तरह के लोगों से जुड़ना है, उसी तरह के व्यक्ति को वह काम देना पड़ेगा. लुटियंस वालों से निपटने के लिए उनके पैंतरे समझने वाला और उनके बीच फिट हो सकने वाला उन्हीं के जैसा व्यक्ति होना चाहिए. वह जेटली ही है.

इसके अलावा भी नोटबंदी या जीएसटी जैसे बड़े आर्थिक सुधार क्रियान्वित करने में सबसे बड़ी भूमिका जेटली जी के वित्त मंत्रालय ने ही निभाई है. वित्तमंत्री सक्षम न होता, तो ये काम इस तरह पूरे न हो पाते.

जेटली जी के मामले में जिस एक बात में मैं मोदीजी से असहमत हूं, वो है एक व्यक्ति को तीन बड़े मंत्रालय. लेकिन ये भी मोदीजी की शैली है कि वे अपना मंत्रिमंडल हमेशा छोटा रखते हैं और विश्वसनीय लोगों को ज्यादा ज़िम्मेदारियां सौंपते हैं.

जब वे पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने केवल 10 या 11 ही मंत्री बनाए थे और एक समय ऐसा भी था, जब उनके सबसे विश्वसनीय मंत्री अमित शाह के पास गृह मंत्रालय सहित कुल 9 मंत्रालय थे.

इसलिए मोदीजी की कार्यशैली देखते हुए जेटली जी के पास 3 मंत्रालय होना कोई अचरज की बात नहीं है. हालांकि मैं शुरू से यही कहता रहा हूं कि रक्षा मंत्रालय की इस तरह उपेक्षा नहीं होनी चाहिए. वहां पर्रीकर जैसा कोई कुशल पूर्णकालिक मंत्री होना आवश्यक है.

लेकिन मज़े की बात ये है कि जेटली जी की आलोचना करने वाले सभी राष्ट्रवादी इस बात का मौन समर्थन करते हैं कि पर्रीकर को रक्षा मंत्रालय से हटाकर जेटली को रक्षामंत्री बना दिया गया.

इससे भी आगे जाकर वे तो अपने कमज़ोर तर्कों से ये भी समझाते हैं कि रक्षा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी निभाने से ज्यादा छोटे-से जिले के आकार वाले गोवा का मुख्यमंत्री बनना पर्रीकर जी के लिए क्यों जरूरी था. मैं इसे राष्ट्रवादियों के कन्फ्यूजन का ही एक उदाहरण मानता हूं.

फिलहाल तो मैं यही आशा कर रहा हूं कि अगले महीने राष्ट्रपति चुनाव हो जाने के बाद जल्दी ही रक्षा मंत्रालय को कोई पूर्णकालिक मंत्री मिले और दूसरी तरफ उधर कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगे. देखते हैं क्या होता है!

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