यथार्थ सन्देश : धर्म मनुष्य के लिये है, मनुष्य धर्म के लिये नहीं

धर्म मनुष्य के लिये है, मनुष्य धर्म के लिये नहीं. जैसे रोटी मनुष्य के लिये है, मनुष्य रोटी के लिये नहीं. अतः व्यक्ति निज कल्याण के लिए तथा समष्टि के कल्याण के लिए यह बोध कराना जरुरी है कि हर आदमी के भीतर कहीं कोई परमात्मा है, जिसे ढूँढना प्रत्येक का दायित्व है.

शाश्वत परमात्मा की प्राप्ति की नियत क्रिया ही धर्म है. जिसमें केवल उस परमात्मा की ही प्राप्ति का विधान हो, लोकरीति का जिसमें रंचमात्र भी समावेश न हो, वही हमारा-आपका, मानवमात्र का विशुद्ध धर्मशास्त्र है और वह है भगवान श्रीकृष्णोक्त ‘गीता’, जिसमें स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार केवल एक परमात्मा के चिन्तन को ही नियत कर्म कहा है और इसी नियत कर्म के अन्तर्गत उसी परमात्मा का परिचायक दो-ढ़ाई अक्षर का नाम ‘ॐ’ अथवा ‘राम’ का जप तथा समकालीन किसी तत्त्वदर्शी की शरण में जाने का विधान है.

सभी महापुरुषों ने तत्त्वदर्शी महात्माओं की शरण और सान्निध्य पर बल दिया है; क्योंकि धर्म उन्हीं की अनुभूति है.

भगवान हैं, किन्तु ‘तत्त्वदर्शी सद्गुरु’ के बिना वे हमारे दर्शन और प्रवेश के लिए नहीं है. चूँकि उनकी अनुभूति अन्तःकरण में होती है, इसलिए हृदय से योग-क्रिया जागृत करनेवाले तत्त्वदर्शी महापुरुष के अभाव में उस परमात्मा का कोई उपयोग हमारे लिए नहीं रह जाता. किन्तु एक परमात्मा में श्रद्धा और उस प्रभु का परिचायक दो या ढाई अक्षर के नाम का जप- यह धर्मनिष्ठा का ही अंग है.

● बौद्ध कहते हैं- ”बुद्धं शरणं गच्छामि’,
● जैन कहते हैं- ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्राणि मोक्षमार्गः’ अर्थात् तीर्थंकरों का दर्शन, उनका बताया ज्ञान और उनकी तरह चरित्र बनाने से मोक्ष मिलेगा.
● इस्लाम के अनुयायी कहते हैं कि मुहम्मद ही अल्लाह के रसूल हैं, संदेशवाहक हैं, दूत हैं.
● सिख कहते हैं, ‘वाहे गुरु’.
● ईसा कहते हैं- ‘सांसारिक बोझ से दबे हुए लोगो! मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा. जो मेरे पीछे आयेगा, उसे अपने आपको भूलना होगा और मेरा अनुसरण करना होगा.’

सभी महापुरुष अपनी ओर बुलाते हैं. लगता है सभी अपनी-अपनी दुकानझ लगाये बैठे हैं; किन्तु ऐसा कुछ नहीं है. अपने-पराये की भावना तो हमारे-आपके भीतर है, इसलिए ऐसा दिखायी देता है.
महापुरुषों का आशय केवल इतना है कि जो महापुरुष साधन द्वारा चलकर उस हृदयस्थ परमात्मा में स्थिति पा चुका है, अपने समकालीन उस तत्त्वदर्शी की शरण में जाओ.

किन्तु तत्त्वदर्शी को हम-आप कैसे पहचानें? धूर्तों ने भी इस वेश से लाभ उठाया है. राजा प्रतापभानु और भगवती सीता इसी वेश में छले गये, हनुमान बाल-बाल बच गये. सभी तत्त्वदर्शी होने का दावा करने लगें तो?

वस्तुतः यह कोई समस्या है ही नहीं. हृदय से क्रिया जागृत कर देने की क्षमतावाला तत्त्वदर्शी यदि दृष्टि में नहीं है तो इसका कारण अपने पुण्य-पुरुषार्थ में ही कमी है- ‘पुन्य पुञ्ज बिनु मिलहिं न संता.’ (मानस, ७/४४/६) तब तक आप एक परमात्मा में निष्ठा और उस परमात्मा का परिचायक कोई दो-ढाई अक्षर का नाम-जप करते हुए पुण्य अर्जित करें. जिस दिन यह पुण्य काँटे पर खड़ा हो जायेगा, तो सन्त-सद्गुरु जिस सिंहासन पर होंगे अथवा जिस कीचड़ में लोटते होंगे, आप वहाँ तक अपने आप पहुँच जायेंगे अथवा वे ही आपसे मिल लेंगे. आप उनको समझ जायेंगे, अनुभवी सूत्रपातों द्वारा वे आपको समझा लेंगे.

श्री परमात्मने नम:

भगवन्! त्रुटियों हेतु क्षमा निवेदित.

(http://yatharthgeeta.com से साभार)

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