पूर्णतः खड़ी हो गयी इस्लामी ख़िलाफ़त की खाट

दे दनादन… दे दनादन… दे दनादन… दे दनादन… लो कल्लो बात, हो गयी खाट खड़ी. 3 साल पूरे नहीं हुए और सुथनिया पीली हो गयी. देशप्रेमियो! कल ख़िलाफ़त का तीजा है. इस शुभ घड़ी का बहुत दिन से इंतज़ार था.

सभ्य सँसार पिंजरे में बंद कर जलाये जाते बच्चों-सैनिकों के वीडियो से खिन्न था. तीखे कटर, चाकुओं, तलवारों से हाथ बांध कर गले काटे जाते काफ़िरों के whatsapp उसे कुपित कर रहे थे.

समुद्र किनारे लाइन बना कर भूने जाते काफ़िरों के चित्रों से क्रोधित था. चेनों से बांध कर 6-6, 7-7 साल की बेची जाने वाली लड़कियों की मंडियाँ सभ्य समाज की आँखें अंगारा बना रही थीं.

अब यह हुआ कि कल यानी 29 जून को 850 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक अल नूरी मस्जिद पर इराक़ी सेना का क़ब्ज़ा हो गया. यही वो मस्जिद है जहाँ अबू बक़र अल बग़दादी ने 4 जुलाई 2014 को ख़ुद को इस्लामी ख़लीफ़ा घोषित किया था.

यहीं से उसने काफ़िरों के क़त्ल के आदेश जारी किये थे. यहीं से यजदियों को जीवित क़ब्र में दफ़ना देने के निर्देश दिए गए थे. यहीं से सँसार बनाने की बड़ मारी गयी थी. यहीं से स्पेन, भारत को वापस इस्लामी क़ब्ज़े में लाने का ज़हर उगला गया था.

इसी 850 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक अल नूरी मस्जिद को आईएसआईएस के सिमटते, सिकुड़ते हत्यारों ने पिछले सप्ताह विस्फोट से उड़ा दिया था. वस्तुतः इराक़ी सेना ने अल नूरी मस्जिद के खण्डहरों पर क़ब्ज़ा किया है. इस क़ब्ज़े के साथ इस्लामी ख़िलाफ़त की पूर्णतः खाट खड़ी हो गयी. बिस्तर गोल करके गली में रख दिया गया.

हम सब पिछले 3 वर्ष से ग़ज़वा ए हिन्द की हदीसों की भारत में गुपचुप कानाफूसी की सी आहटें सुन रहे थे. पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया जैसे देशों में ग़ज़वा ए हिन्द की हदीसों की बढ़-चढ़ कर व्याख्या हो रही थी.

इनमें भारत के काफ़िरों पर आक्रमण के लिए ख़ुरासान से काले झंडे वाले लश्करों की डींगें मारी जा रही थीं. उस लश्कर की मदद के लिये आसमान से ईसा के उतरने की घोषणा की व्याख्या हो रही थी.

सभ्य संसार ने ख़िलाफ़त और उसके बग़लबच्चों को वाक़ई ईसा के पास भेज दिया. आईएसआईएस के कुटते, पिटते, छितते हत्यारों और उनके हिमायतियों की हाय हाय, उनके बैन फ़ज़ा में गूँज रहे हैं.

स्वाभाविक है यह समय हर्ष का है. दिन में होली और रात में दीपावली एक साथ मनाने का है मगर बंधुओं ध्यान रहे ‘ग़ज़वा ए हिन्द का सपना अभी मरा नहीं है.’ हर राष्ट्रवादी का कर्तव्य है कि वो ऐसा सपना देखने वाली हर आँख नोच ले. यह भी ध्यान रहे कि ऐसी बहुत सी आँखें भारत में भी हैं.

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