कहीं ‘रोहिणी’ सच में गल गई, तो कहीं पर ‘रोहिणी’ फट रही है!

२५ मई २०१७ को रोहिणी नक्षत्र लगा था. इस दरम्यान भीषण गर्मी पड़ती है. जितनी ज्यादा तेज गर्मी पड़ती है तो अकसर लोग मानते हैं कि उतनी ही अच्छी बरसात होती है. रोहिणी के पहले ९ दिन खास माने जाते हैं. इस बार पूरे नौ दिनों में इन्दौर और मालवा के क्षेत्र में लगभग रोजीना कई जगह मूसलाधार और कहीं कहीं छुटपुट थोडी थोडी देर के लिए बारिश होती रही. यानि रोहिणी पूरी की पूरी गल गई. मालवा के ग्रामीण इलाकों में इससे किसानों में इस वर्ष अच्छी बरसात होने के मौसम विभाग के दावों पर शंका होने लगी है।हालाकि जब मुख्य मंत्री के कार्यक्रम में अचानक जोरदार आंधी के साथ जमकर पानी गिरा और पंड़ाल उखड़ गया तो लोगों को लगा जरूर इस मर्तवा जम कर रिम झिम पानी गिरेगा.

रोहिणी के गलने से पानी के गिरने या नहीं गिरने का कोई वैज्ञानिक आधार हो या न हो. पर यह सच है कि जब जब भी भारत में कम बरसात हुई है तब तब प्रशान्त महासागर में ” अलनीनो” आया है. अल निनो नाम की एक समुद्रीय घटना होती है. धरती का सबसे बड़ा भाग जो सूर्य से दिखेगा, जहां पर जमीन बहुत कम और सिर्फ पानी ही पानी नजर आयेगा, वह है दक्षिणी प्रशान्त महा सागर.

जब उत्तरी गोलार्ध में सर्दी का मौसम होता है तब दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी पड़ती है. खास कर दिसम्बर से मार्च के महिने में प्रशान्त महासागर के विषवत् रेखा के आसपास इन्डोनेशिया, न्यूज़ीलेन्ड़ के इलाके का समुद्र का पानी ज्यादा गहराई तक गर्म होता है. उसी समय दक्षिणी अमेरिका के देश पेरू के समुद्र में कम गहराई तक पानी गर्म होता है. ऐसा जब जब होता है भारत में सामान्य वर्षा अभी तक हुई है. लेकिन जब प्रशान्त महासागर के पश्चिमी इलाके का पानी गहराई में बह कर पेरू के पास के समुद्र को काफी गहराई तक गर्म कर देता है, तो वहां मौजूद गहरे पानी की मछलियां गर्म पानी को सहन नहीं कर पाती हैं, वह मरने लगती हैं और पेरू के तट पर बीच पर हजारों मरी हुई मछलियां पड़ी मिलती हैं. ऐसा जब जब होता है तो भारत के लगभग बहुतेरे हिस्से में सूखा पड़ता है. इसे कहते हैं ‘अलनिनो’ आगया इस कारण सूखा पड़ जाता है.

यह भी महज एक संयोग की बात ही है कि जब जब दक्षिणी प्रशान्त महासागर में अल निनो आया उस समय भारत के अनेक इलाकों में प्री मानसून बरसात हुई वह भी रोहिणी नक्षत्र में. इस लिये अगर यह कहा जाये कि जब जब रोहिणी गलती है तो अल निनो आ जाता है और बरसात छिन्न भिन्न हो जाती है, इसमें गलती कहाँ है? यह तो पुरातन भारतीय परम्पराओं को आधुनिक वैज्ञानिक आघार ही प्रदान करता है.

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर “एन सी ई पी ” नामक एक क्लाइमेट प्रिड़िक्शन सेन्टर पिछले कई दशकों से कार्य रत है. इसके द्वारा प्रशान्त महासागर के पानी का अलग अलग गहराईयों में पानी का तापमान नापा जा रहा है. फिर हर महिने के दूसरे गुरूवार को इन आंकड़ों की वैज्ञानिक समीक्षा की जाती है. इस विश्लेषण के आधार पर अल – निनो सम्बन्धी जानकारी प्रकाशित की जाती है.

अभी अभी २६ जून २०१७ को प्रकाशित इस समीक्षा के अनुसार जुलाई २०१६ से लेकर दिसम्बर २०१६ तक प्रशान्त महासागर का तापमान हमेशा रहने वाले औसत तापमान से कम नापा गया था. लगता है भारत के मौसम वैज्ञानिकों ने इसी के आधार पर जल्दबाजी में घोषणा कर दी थी कि ‘इस वर्ष भारत में औसतन अच्छी बरसात होगी. ‘ यद्यपि मैं उनके इस निष्कर्ष से सहमत नहीं था.

” एन सी ई पी ” के अनुसार जनवरी २०१७ से लेकर फरबरी २०१७ तक प्रशान्त महासागर का तापमान सामान्य से अधिक रहा. पर मई- जून २०१७ के प्रशान्त महासागर के तापमान ने सब गड़बड़ कर दी है. अब यह अच्छी तरह से प्रमाणित होगया कि पूर्वी प्रशान्त महासागर की गहराई में समुद्र का पानी औसत से ०.७ डिग्री सेल्शियस ज्यादा गरम है. अर्थात पोसिटिवली “अलनिनो ” आ चुका है. मार्च अप्रेल के महिनों में भी आकड़े बताते हैं कि मध्य प्रशान्त महासागर में पानी ज्यादा गरम होने लगा था.

अर्थात अब यह स्वीकारना ही पड़ेगा कि “अल-निनो” आ चुका है और अब पानी सिर्फ इस बात पर निर्भर करता है कि बंगाल की खाडी में कितना जोरदार तूफान उठेगा. यह भी हमें मानना पड़ेगा कि बरसात में पानी की झिर लगने के तीन दौर होते है. इनमें से पहिला दौर पूरी तरह फेल होता जा रहा है. दूसरा दौर बंगाल की खाड़ी में बन रहे दबाव का होगा. इसे मालवा महाकौशल मराठवाड़ा में आने में ६ से १० दिन लग सकते हैं. बरसात के तीसरे दौर का बीजारोपण , उपग्रहों की नजर में बन जरूर रहा है , पर कमजोर है.

मेरा तो अनुमान है कि हमें बड़े पैमाने पर भविष्य के कम पानी की समस्या से जूझने की रणनीति अभी से तैयार कर लेना चाहिये. प्याज का दंगल तो सरकार ने अपने खजाने का दिवाला निकालकर जैसे तैसे सम्भाल लिया. पर अगर “अल-निनो” के कारण ‘ पीने के पानी ‘ की आपा धापी मची तो पता नहीं कहाँ क्या हो जायेगा.

यह सब इस लिये लिखना पड़ रहा है कि हमारे मौसम विज्ञानी अपनी भविष्यवाणियां लगता है www.weather.com और गूगल देवता का आशीर्वाद लेकर कर रहे हैं. अगर उनके पास अल निनो का कोई अपने हिन्दुस्तानी मॉडल होता तो ऐसी उल्टी सीधी घोषणाएं नहीं करते. क्योकि जब वह कहते हैं कि भारी से भारी वर्षा होगी तो आसमान से बादल गायब हो जाते हैं. और जब मौसम विभाग कहता है कि बम्बई में सामान्य वर्षा होगी , तो पता लगता है मेरीन ड्राईव पर ३०-४० फुट ऊंची समुद्र की लहरें तांडव मचा रही होती हैं.

अरे भाई, कम से कम हमारे मौसम विज्ञानिकों को भारतीय अन्तरिक्ष संस्थान ‘इसरो’ के अपने पूरी तरह स्वदेशी उपग्रह “कल्पना सेटेलाईट” के चित्र तो देख लेना चाहिये, जो हर छ: घण्टे में बादल कहाँ कहाँ पर हैं इसकी सूचना लगातार दे रहे हैं. मौसम वैज्ञानिकों को सिर्फ करोड़ों रुपये खर्च करके विदेशी ‘वेदर रडार मंगाकर’ , विदेश यात्राएं करके, अन्तर्राष्ट्रीय गोष्टियों में शोधपत्र पढ़कर, अपने प्रमोशन के लिए सरकारी फाईलों के कागजों का पेट भरने की ज़रुरत नहीं है. उन्हें जमीन से जुड़कर देश के विश्वविद्यालयों का सहयोग लेकर पूरी तरह भारतीय मॉडल बनाना चाहिये. विदेशी साफ्टवेअर और वेदर मॉडलों का सृजन दूसरे मुल्कों में ठीक होता होगा, हमारे देश का पर्यावरण और ऊपरी आसमान की स्थिति भिन्न है. हमे अपना “वेदर मॉडल” बनाना चाहिये.

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