नक़ली चेहरा ओढ़ कैरेक्टर में रहा करो, बाकी पता तो सबको है कि नौटंकी में ही आए हो

दिन में पत्रकार और चौबीस घंटे बैकग्राउंड में कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता बने कुछ लोगों ने कल #NotInMyName का हैशटैग चलाया और, जैसा कि हमेशा होता है, जंतर मंतर पर भीड़ जुटा लाए. भीड़ आयी थी विरोध प्रदर्शन करने, जो कि एक संवैधानिक अधिकार है, ‘मुसलमानों की भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्या’ के विरोध में.

यहाँ तक मुझे बहुत ज्यादा गलत नहीं लगता. ग़लती इतनी ही है कि मुसलमानों की जगह ‘इन्सानों’ की हत्या के लिए होता तो बेहतर होता. लेकिन मीडिया सिर्फ ‘मुसलमानों की उग्र हिन्दुओं द्वारा की गई हत्या’ को ही हत्या मानती है, तो ज़ाहिर है लोगों को लगता है कि हिन्दुओं की हत्या कहीं नहीं हो रही. होती है कि नहीं, हुई है कि नहीं, इसके लिए गूगल का सहारा लीजिए तो पता चल जाएगा कि सच क्या है.

विरोध प्रदर्शन का मतलब पोस्टर, हैशटैग, भीड़ की तस्वीर से लेकर सेल्फी तक होती है. कोई बड़ा आदमी कुछ भाषण दे दे तो उसे और भी फ़ुटेज मिलती है. भीड़ का प्रदर्शन हमेशा ही प्रायोजित होता है आज के समय में, और इसका इन्सानियत, संवेदना से बिल्कुल मतलब नहीं होता. इसका सीधा मतलब राजनैतिक होता है.

इसमें उसकी ‘माँ ख़ून के आँसू रो रही थी’, ‘मैंने भारत माता को फलाने की माता की आँखों से रोते देखा’ से लेकर ‘ईद में माँ इंतज़ार करती रही’ की गार्निशिंग चलती रहती है. ज़ायक़ा बढ़ता जाता है, और जुनैद की माँ को, नजीब अहमद की माँ की तरह, रोहित वेमुला की माँ की तरह पता चलता है कि उनके बेटे की लाशों का इस्तेमाल हो रहा है.

इसमें संवेदना नहीं होती इसीलिए आपको वहाँ विरोध से ज्यादा मेला दिखता है. और गंभीर मुद्दों के लिए बने पोस्टर को पकड़ा नौजवान अपनी युवाशक्ति को मुस्कुराहट के साथ दिखाता दिखता है. आपके बड़े नेता, पत्रकार दाँत निकाल कर हँसते नज़र आते हैं.

आप हँसते क्यों हैं? क्या किसी की मौत पर हो रहे विरोध पर, जो कि आपके हिसाब से भारत के हर हिस्से में होती रही है, आपको हँसी आ सकती है? मुझे नहीं लगता मुझे हँसी आएगी.

विरोध भी भीड़तंत्र हैं, जिसे एक हाँकने वाला हाँकता है और आप स्वार्थसिद्धि हेतु वहाँ मोबाइल लेकर पहुँच जाते हैं. दोस्तों को बताते हैं कि आपने हेशटैग पर ट्वीट कर दिया, पोस्टर थामे खड़े होकर फोटो खिंचा ली, और आपका विरोध पर्व संपन्न हुआ.

अब आते हैं कि ये प्रोटेस्ट जो हुआ, वो क्या होने वाला था, क्या हो गया. लिंचिंग को लेकर विरोध होना था, और हैशटैग का जलवा ऐसा रहा कि ये विरोध भी वही हो गया जो इसको नहीं होना था : मोदी ये है, फासिज्म आ गयी, हिन्दू आतंकवादी है, गाय माता नहीं है, भोजन है, हिन्दुत्व के सामने हम खड़े होंगे…

एकदम सेक्स इट अप टाइप हो गया. गर्दा उड़ा दिया गया मोदी का और हिन्दुओं के आतंकवाद का. हालाँकि आतंक का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन हिन्दू हों तो मान लिया जाएगा क्योंकि हिन्दू तो कोई धर्म है ही नहीं. ये तो ISIS टाइप एक संस्था है जिसमें आतंकियों को ट्रेनिंग दी जाती है.

एक पोस्टर जो कि ऊपर तस्वीर में हैं उसमें अंग्रेज़ी में लिखा था: “गाय माता नहीं है. गाय भोजन है. लोगों को मत मारो उनके भोजन के लिए.” दूसरे पोस्टर में लिखा था: “हम हिन्दू आतंकवाद का विरोध करते हैं.” तीसरे में लिखा था: “ब्राह्मणवाद और हिन्दू आतंकवाद को ‘ना’ कहिए.”

इस तीन पोस्टरों से पता चलता है कि इसमें जुनैद की माँ को बकरा बना दिया गया. यहाँ सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं से घृणा की बदबू आती है. इसमें विरोध नहीं है, इसमें एक सड़ी हुई सोच है. इसमें वो सोच है जो कि एक पार्टी की जीत से इतनी दुःखी, बिलबिलायी हुई है कि वो किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार है. ये छटपटाहट हर नए महीने नए हैशटैग के साथ उमड़ आती है.

गाय किसी की माता है तो आपको क्या दिक़्क़त है? गाय आपके लिए भोजन है, तो किसी को दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए. मुझे नहीं है. लेकिन मुझे इस बात से दिक़्क़त है कि तुम मुझे ये बता रहे हो कि गाय माता नहीं है. मैं मानता हूँ कि है. तुम्हारी नहीं होगी, तुम मत मानो.

लेकिन गाय सिर्फ भोजन है क्योंकि कुछ लोग खाते हैं, तो फिर हर मुसलमान आतंकवादी है क्योंकि कई हज़ार मुसलमान पूरी दुनिया में बम मारते फिरते हैं, लोगों को जान से मार रहे हैं. लेकिन मैं नहीं मानता कि हर मुसलमान आतंकी है. ऐसा कहना एक मूर्खतापूर्ण बात होगी. क्योंकि जब तक हर मुसलमान आतंकी नहीं बन जाता, तब तक ये कहना गलत है.

गाय को माता मानना आस्था का अंग है. मुहम्मद को अल्लाह का पैग़म्बर मानना आस्था की बात है. क़ुरान आकाश से उतरी थी ये भी आस्था है. आप इनमें से किसी को भी वैज्ञानिक तथ्य नहीं मान सकते. ना ही हर जगह विज्ञान लगाने की ज़रूरत है क्योंकि विज्ञान के पास हर बात का जवाब नहीं होता.

जब विरोध करने जाओ, तो कम से कम गंभीरता दिखाओ. जब विरोध करने जाओ तो एक नक़ली चेहरा ओढ़ लिया करो और कैरेक्टर में रहा करो. क्योंकि सबको पता है कि करने तो तुम नौटंकी ही जा रहे हो. ऐसे विरोधों का फ़्रंट जुनैद होता है, और पोस्टर पर मोदी, ब्राह्मणवाद, मनुस्मृति से लेकर तमाम बातें दिखती हैं. आँख मूँदकर, स्वयं को सबसे ऊपरी दर्जे का ज्ञानी मानकर, एक पूरे धर्म को आतंकवादी कह देना, तुम्हें तुम्हारे ही तर्क के विरोध में खड़ा कर देता है.

ऐसी भीड़ और भेड़ में मात्रा का अंतर है. तुम भीड़ हो. तुम अटेंशन सीकिंग भेड़चाल वाली सेल्फीबाज़ युवाशक्ति हो. तुम आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझती हुए पीढ़ी की वो इकाई हो जो किसी के साथ सिर्फ इसलिए खड़ा हो जाता है क्योंकि उसे लगता है इस पर उसे दस लोग शाबाशी दे देंगे.

तुम बस इस्तेमाल होने के लिए बने हो क्योंकि तुम्हारा विवेक तुम्हारे पास नहीं है. उसको तुमने कभी इस्तेमाल ही नहीं किया, तो कोई और तुम्हें घुमा रहा है. तुम ट्रेंड करते हैशटैग को ढकेलने वाली बाइनरी से ज्यादा कुछ भी नहीं हो. तुम एक निकृष्ट, नक़ली और दोगली भीड़ का वो अंग हो जिसे इलाज चाहिए.

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