श्रद्धांजलि डॉ एस के सिंह : वो ज्ञान का एक वट वृक्ष था जो गिर गया

आदरणीय डॉ एस के सिंह सर,

देखिये न.. कल से बदहवास जैसा घूम रहा हूँ…. मां तीन बजे रात को पूछ रही “क्या हुआ बताओ… तुम सो क्यों नहीं रहे हो’?… बहन पूछ रही..”भइया ठीक से खा क्यों नहीं रहे हो”…पिता मां से कह रहे कि “अतुल ठीक से बात क्यों नहीं कर रहा..” ? मित्र पूछ रहे कि “कहां खो गए यार”?

सर.. समझ में नहीं आ रहा कि कैसे कह दूं कि इस धरती पर भगवान ने एक शख्स को भेजा था.. वो मुझसे तीस साल बड़ा था लेकिन वो एक साथ मेरा पिता भी था, माँ भी… बहन भी और मित्र भी.. वो बेहतरीन आदमी इस दुनिया से सदा के लिए चला गया.. वो ज्ञान का एक वट वृक्ष था जो गिर गया. जिसकी छांह में, मैं घण्टो सुस्ता सकता था.. कुछ भी कह सकता था. अधिकारपूर्वक कुछ भी मांग सकता था.. कुछ पूछ ही नहीं, कुछ बता भी सकता था..

आज मैं कैसे विश्वास कर लूं कि आप इस दुनिया में नहीं रहे.. और कैसे कह दूं कि आप और हम इस आभासी दुनिया में महज लाइक और कमेंट से बनते-बिगड़ते रिश्तों की दौड़ में मिल गए थे, अफसोस कि आज कहीं खो गए… आप मेरे लेखन के प्रशंसक थे.. अब नहीं रहे.. आत्मीयता बढ़ने के बाद एक आत्मीय समालोचक की भूमिका में थे.. अब नहीं बताने आएंगे कि ह्रस्व इ और दीर्घ ई का प्रयोग कैसे होता है.. अब नहीं चाहेंगे कि मुझे व्याकरण की अनगिनत गलतियों के लिए कहीं शर्मिंदा न होना पड़े.. और मैं आपकी इस चिंता को हँसकर टाल दूँ कि.”क्या सर हमको साहित्य का न ही ‘स’ आता है और न ही हिंदी का ‘ह’. जान लेंगे क्या बच्चे की..” ?

और फिर देखिये न शायद अब अगले दिन किसी स्टेटस पर आपका कमेंट भी नहीं आएगा कि..”. वाह सवा रुपया का ईनाम.. लोटा गिर गया..” ..मैं सवा रुपया और लोटा का नाम सुनकर खूब हंसूगा… और जब आपके घर जाऊंगा तो आप तुरन्त बताएंगे कि

“आज वाला पोस्ट पढ़ के मजा आ गइल हो. ऑफिस में रहनी ह त पढ़के आतना ठठा के हंसनी हं की सभ केहू पूछे लागल ह.. क्या हो गया सर…”?

वाह! फिर तो ये तारीफ सुनकर मैं खूब खुश हो जाऊँगा… लगातार पाँच घण्टे की मैराथन बातचीत के बाद रात को खाना खाउंगा तो आप पूछेंगे कि..

“परसो चार पराठा खाए आज तीन रोटी क्यों.. मिठाई लs.. ना त दही या दूध लs..”?

अरे ! मैं हैरान हो जाऊंगा आपके इस स्नेह को देखकर… फिर बारह बजे खाना खाकर लौटूंगा. आप अपनी गाड़ी चलाकर मुझे कमरे तक छोड़ने आएंगे…. बाद में घर पहुंचाते वक्त पता चलेगा कि आपका बड़ा सा हाथ मेरे शर्ट की छोटी सी पॉकेट के तरफ आ कर कुछ रख गया है…” ..कमरे पर आकर पता चलेगा कि ये जो सवा रुपया आपने कहा था ये तो एक हजार का नोट है..’

सर क्या कहूँ… मैंने आपसे ही मिलकर जाना था कि “बड़ा आदमी वही होता है, जिसके पास जाकर स्वयं के छोटे होने का एहसास न हो”…

आज एक-एक कर जब सब कुछ याद आ रहा तो रोना आ रहा.. कहने को एक-दो बातें हों तब न… लगातार डेढ़-दो साल ये क्रम चला है.. मैं गोदौलिया रहता था और आप संकटमोचन.. फिर कैसे मुलाकात के तीन दिन से ज्यादा हो जाते या मैं कहीं बनारस से दूर किसी प्रोग्राम में चला जाता था तो आप परेशान हो जाते थे.. तब मैं भी बेचैन हो जाता था… और उस बेचैनी में जब-जब मोबाइल खोला तब-तब देखा कि आपका मैसेज पहले से ही हाज़िर है..

“आवा मरदे आश्रम पर..देखाs निशु के अम्मा का बनवले बाड़ी..खाइल जाव..”

उस दिन समझ में आता कि प्रेम की डोर नाज़ुक कहने वाले बड़े ही मूर्ख किस्म के लोग हैं..

हां.. एक टीस निकल रही.. लग रहा कि अभी भी कुछ ठीक से बयां नहीं हो पा रही है…. तीन साल के सम्बन्धों में आपके गाज़ीपुर तबादले के पहले के दो साल में कितनी यादें मेरे जेहन में दर्ज हैं.. कैसे लिखूं, एक-एक बातें.. कैसे कहूं कि मैं आपके फेसबुक मित्रों में आपके सबसे करीब था.. सबसे पास. आप मेरे फेसबुक से बने मित्रों में सबसे करीब थे और सबसे पास..

लेकिन आदरणीय सर.. विश्वास नहीं हो रहा अब भी कि आप नहीं है.. जानते हैं क्यों… चित्रलेखा एक बार श्वेतांक से कहती है… “जीवन एक अविकल पिपासा है.. इसे पानी की नहीं घृत की आवश्यकता है श्वेतांक, जिस दिन प्यास मर गयी उस दिन जीवन मर गया..”

सर आपको मैंने कभी बताया नहीं था न… लेकिन अफ़सोस आज बता रहा हूँ कि आपको जब-जब देखा तब-तब लगा कि जीवन एक अविकल पिपासा है.. याद तो होगा ही कि आप और हम इलाहाबाद जा रहे थे.. और आपने बेगम अख्तर की ग़ज़ल.. “रश्म-ए-उल्फ़त निभा गया कोई” गुनगुनाते हुए कहा था कि..

“अतुल मैं अब हारमोनियम सिखूंगा, तुमको तबला बजाना है.. इस जीवन को संगीतमय कर देना है. ये फेसबुक बहुत कीमती समय बर्बाद कर रहा है.”

सर मैं हैरान होता था उम्र के इस पड़ाव पर एक प्रशासनिक अधिकारी को देखकर.. जिसके ऊपर दो-दो जनपद का भार था. फिर भी आपके पास जीवन को सुंदर बनाने की अविकल पिपासा थी.. अनेक लालसाएं थीं.. कुछ और करने की, सीखने समझने और पढ़ने की तमन्ना थी…

आप बताते कि “ए अतुल तहरा बियाह में खद्दर सिलवाईब” मैं मजाक में कह देता कि “सर जब इतनी सी बात है तो कहिए तो कल ही ब्याह कर लूँ ”

आपका वो ठठाकर हंसता हुआ चेहरा देखकर आज मुझे रोना आ रहा है.. कि आप मेरी शादी को लेकर कितने उत्सुक हैं….

आपको ध्यान से देखता कि अगले ही छण गाड़ी चलाते.. एसी की कूलिंग बढ़ाते.. और म्यूजिक सिस्टम में कुमार गन्धर्व की आवाज से आवाज में मिलाकर “हिरना समझ बुझ चरना”..
उड़ जाएगा हंस अकेला..’गाते..

आह! तब आपके व्यक्तित्व में एक गजब का विरोधाभास प्रतीत होता था.. वो निर्गुण और सगुण का अद्भुत समन्वय था, वो आपका व्यक्तित्व था अलहदा सा.. मैं मन ही मन कहता था

“भारत के हर प्रशासनिक अधिकारी को डॉ एस के सिंह जैसा होना चाहिए..”

सर मैं जानता हूँ कि आपको कोई बीमारी नहीं थी.. आप दुनिया के सर्वाधिक प्रसन्न व्यक्ति थे.. ये भी जानता था कि आप मैम से कितना प्रेम करते थे.. शायद किसी प्रेयसी से बहुत ज्यादा… उनका असमय चले जाना आप बर्दाश्त नहीं कर सके.. आज छह महीने के भीतर मां और बाप दोनों को खो चुके निशु भैया और दोनों दीदी का क्या हाल होगा ये सोचकर मेरी रूह कांपने लगती है.. हां आपके जीवन के आखिरी दिनों में मैं आपके पास न रह सका. आपके पैर न छू सका.. आपको पकड़कर रो न सका. इसके लिए स्वयं को जीवन भर माफ नहीं कर पाऊंगा..

बस स्वयं को यही दिलासा दे रहा हूँ कि ये जीवन गोदौलिया चौराहा है…. यहां से एक दिन सबको छूटना ही है.. आप कल हरिश्चंद्र गए थे.. मैं और ये सब लोग शायद मणिकर्णिका जाएंगे… लेकिन सर.. मुझे विश्वास है.. हम और आप मिलेंगे जरूर किसी दिन.. उसी तरह ठठाकर घंटों हंसते रहने के लिए.. बिना मन घूमने के लिए.. ख्याल और ध्रुपद और भजन में डूबे रहने के लिए…
हां आखिरी प्रणाम स्वीकार करियेगा.. गलती हो गयी हो कुछ तो माफ करिएगा..

रोते हुए आपका
अतुल

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