यूं इंदिरा ने बनवाया वीवी गिरि को राष्ट्रपति

देश के राजनीतिक इतिहास में सामान्यत: सत्तारुढ़ दल के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ही विजयी होते हैं, लेकिन जैसे कि हर जगह अपवाद होता है वैसे ही राष्ट्रपति चुनाव में भी एक बार ऐसी घटना घटी जिसमें सत्तारुढ़ दल के प्रधानमंत्री ने ही अपने दल के उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया और वे चुनाव हार गये.

1969 में तत्कालिन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की 2 मई 1969 को मृत्यु हो गयी. भारतीय इतिहास में यह पहली बार था कि किसी राष्ट्रपति का उसके कार्यकाल के दौरान ही निधन हो गया हो, तब संविधानानुसार उपराष्ट्रपति वी.वी.गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बन गये. 1969 तक यह परम्परा सी बन गयी थी कि उपराष्ट्रपति ही राष्ट्रपति बनते थे.

जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी भी प्रधानमंत्री बनी. किंतु कांग्रेस के दिग्गज नेताओ को इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री बनना पसंद नहीं आया और उन्होंने हर मोर्चे पर इंदिरा का विरोध करके उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास किया दूसरी ओर इंदिरा अपने पैर कांग्रेस और भारतीय राजनीति में जमाने का प्रयास कर रही थी.

इंदिरा विरोधी नेताओं ने 1969 के राष्ट्रपति चुनाव को इंदिरा को नीचा दिखाने के मौके के रूप में इस्तेमाल करना चाहा. उन्होंने वीवी गिरि को उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति बनाने की जगह नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति बनाये जाने का प्रस्ताव कांग्रेस की ओर से पारित कर उनको उम्मीदवार घोषित कर दिया.

पर इंदिरा भी कहां हार मानने वाली थी, उन्होंने वीवी गिरि को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिलवाकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव में खड़ा करवा दिया. उस समय वे कांग्रेस संसदीय दल की नेता थी किंतु इंदिरा ने किसी भी प्रकार का पार्टी व्हिप जारी करने से इंकार कर दिया तथा चुनाव मे अपनी पार्टी के सांसद-विधायको को अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील की.

जब वोटों की गिनती की गयी तो यह भारतीय इतिहास का पहला चुनाव था जिसमें पहले दौर की मतगणना के आधार पर कोई भी उम्मीदवार जीत के लिये आवश्यक 50% मत हासिल नहीं कर सका, तब दूसरी वरीयता के मतों की गणना की गयी और निचले क्रम के उम्मीदवारों को बाहर किया गया तब जाकर भारत के राष्ट्रपति के चुनाव परिणाम का फैसला आ पाया.

इस चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी चुनाव हार गये और प्रधानमंत्री इंदिरा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार वीवी गिरि चुनाव जीत गये. इस जीत के बाद इंदिरा गांधी कांग्रेस की निर्विवाद नेता बन गयी और उन्होंने पार्टी और संगठन में विरोधी नेताओं को एक ओर धकेल कर पूरे दल और देश पर अपनी पकड़ बना ली जो 1984 में सिख अंगरक्षकों के हत्या किये जाने तक बनी रही.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY