सेक्युलर देश है, इसलिए नहीं पूछना चाहिए भीड़ का मज़हब

अक्सर हम पढ़ते हैं कि भीड़ ने थाना फूँक दिया या फिर अपने समुदाय के संदिग्ध लोगों को ले जाती पुलिस की गाड़ी पर हमला कर के उन्हें छुड़ा लिया. पुलिस देखती रह गई.

दो कारण होते हैं, पुलिस को भीड़ जान से नहीं मारती. उन्हें पुलिस का खौफ खत्म करने में ज्यादा दिलचस्पी होती है – जो कि ज्यादा खतरनाक बात होती है.

दूसरा कारण यह भी है कि पुलिस को उच्चाधिकारियों के आदेश की प्रतीक्षा रहती है. बिना आदेश के कोई कदम उठाया तो ऊपरी अधिकारी जांच लगाकर और ट्रांसफर में घुमाकर जिंदगी मौत से बदतर बना देते हैं. नेताओं के कहने पर ही होता है लेकिन नेता अपना नाम आने नहीं देता.

पुलिस को यदि स्टैंडिंग ऑर्डर्स मिले कि ऐसे परिस्थितियों में बेहिचक गोली चलाओ, तुम्हारे बंदूक से मेरी गोली चलेगी – तो फिर कंट्रोल करना कठिन नहीं होगा.

जब आधे किलोमीटर दूर से भीड़ के दस लोग एक साथ टपकेंगे, वे भी सर में या गले में लगी गोली से – स्पॉट पे उनकी लाशों का साथ देने सिर्फ टूटी चप्पलें बचेंगी.

PAC या RAF के उतरते ही सन्नाटा क्यों छा जाता है? बस एक जमाने में पुलिस का भी यही डर हुआ करता था.

जब रोग पे पुरानी दवा असर नहीं करती तब नई और शक्तिशाली दवा दी जाती है. पुलिस को इसी तरह बेअसर कर दिया है नेताओं ने. रोग भीड़ है या राजनेता यह समझना चाहिए.

AIDS से लोग नहीं मरते. लेकिन वो आप की रोगप्रतिरोधक शक्ति को खत्म कर देता है. उसके बाद ऐसा कोई रोग, जिससे आप डरते ही नहीं थे, आप की विकेट गिरा देता है. AIDS का डर इसीलिए है.

बस इसी से समझ जाइए. AIDS का इलाज हो तो रोग पर काबू पाना मुश्किल नहीं. पुलिस को काम करने की आज़ादी दीजिये, वो भीड़ को काबू में कर सकती है. सिर्फ भीड़ के भेड़ियों को इतना समझ में आए कि नेता उनको बचा नहीं सकता.

शुरुआत में लिखा है कि भीड़ पुलिस को जान से नहीं मारती. अब तक यही होता था, पर डीएसपी मोहम्मद अय्युब पंडित के बाद भरोसा नहीं. उनके बारे में भी सुना है कि उन्होंने अपना हथियार निकाला लेकिन जानलेवा फायर नहीं किए. जांच से डरे होंगे.

पुलिस वालों को अब यह सोचने की आवश्यकता होगी कि जांच से डरोगे तो शायद जान से भी जाओगे. इसके पहले आप की जान बख्शी जाती थी, लेकिन अगर मारे जाओगे तो नेता फिर भी वोट बैंक को मनमानी करने देंगे.

वोट बैंक के आगे आप की जान की कोई कीमत नहीं है. ऊपर से आप हिन्दू हैं तो कुछ भी नहीं है. भारत सेक्युलर देश है इसलिए भीड़ का कोई मजहब नहीं पूछना चाहिए.

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