बड़ा उत्तेजक, युद्धोन्मादी और रक्तरंजित है आगे का समय

जब से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका के राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प से मुलाकात हुयी है तब से मीडिया और सोशल मीडिया पर हर तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही है. एक तरफ जहां विपक्ष और मोदी विरोधी वर्ग ने इस मोदी ट्रम्प की मुलाकात को हवा हवाई बता कर खारिज कर दिया है, वहीं सारे मोदी समर्थक भी सन्तुष्ट नज़र नहीं आ रहे हैं. समर्थकों के एक वर्ग को यह बहुत खल रहा है कि ट्रम्प ने तो कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद के खात्मे की बात कही, वहीं मोदी जी इसमें से इस्लामिक शब्द को खा गये है. इसे मोदी जी की कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है.

मैं विपक्ष के प्रलाप को अच्छी तरह समझता हूं क्योंकि उनको यह अच्छी तरह मालूम है कि जिन विषयों पर मोदी जी ने ट्रम्प से बात नहीं की है, वह इस पहली मुलाकात का एजेंडा ही नहीं था. वह तो इस लिए भी प्रलाप कर रहे है क्योंकि उनको भविष्य का कयास लगाने का मौका नहीं मिल रहा है.

जहां तक समर्थकों में मोदी जी का इस्लामिक शब्द का न प्रयोग करने की हताशा है वह भी समझ में आता है क्योंकि उनको वैश्विक कूटनीति और उसके शब्दजाल को समझने की दिक्कत है.

वैसे तो इस 5 घण्टे की मोदी-ट्रम्प मुलाकात पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन मोदी समर्थकों को, थोड़े में, सरल भाषा में इसको समझाने का प्रयास करता हूँ.

पहली बात तो यह समझ लीजिये कि यह मोदी-ट्रम्प की मुलाकात किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अंतर्गत नहीं हुयी थी, इसलिए इसका एजेंडा भी कोई बहुत लंबा-चौड़ा नहीं था. यह एक अनशेड्यूल मुलाकात थी जो ट्रम्प के आपातकालीन निमंत्रण पर हुई थी.

यह मुलाकात किसी हेलो-हाय, जय श्री राम, सत श्री अकाल के लिये नहीं थी. यह मुलाकात, ऐसे दो शख्सों के बीच थी जो अनाधिकारिक रूप से, लम्बे समय से सम्पर्क में थे लेकिन आधिकारिक रूप से पहली बार आमने सामने हुये थे.

यह बात, भारत में कुछ ही गिने-चुनों को मालूम है कि मोदी जी की अनाधिकारिक, व्यक्तिगत टीम ने ट्रम्प के राष्ट्रपति के चुनाव में उतनी ही मेहनत की थी जितनी उसने मोदी जी के चुनाव में की थी.

मोदी जी को अच्छी तरह मालूम है कि ट्रम्प का ‘अमेरिका फर्स्ट’ उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उनका खुद का ‘मेक इन इंडिया’ महत्वपूर्ण है और दोनों का परस्पर हित को लेकर टकराव भी निश्चित है. इसलिये मोदी-ट्रम्प के बीच हुई इस पहली मुलाकात में इन किसी भी मुद्दे पर कोई भी बात नहीं होनी थी.

अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प के आग्रह पर, यह मोदी-ट्रम्प मुलाकात दरअसल, मोदी जी की 4 जुलाई से इज़रायल यात्रा के कारण हुयी है. लोगों को शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक ज़माने में अमरीका और इज़रायल की मध्य एशिया की अरब नीति एक ही होती थी और अमेरिका, इज़रायल का हर वैश्विक मंच पर समर्थन करता था लेकिन आज यह स्थिति नहीं है.

जब से नेतनयाहू, इज़रायल के प्रधानमंत्री हुये हैं तब से ओबामा काल के अमेरिका से उनका विरोध रहा है. दोनों में इस कदर विरोध था कि ओबामा ने इज़रायल के वामपंथी दलों को इसलिये समर्थन दिया हुआ था ताकि नेतनयाहू चुनाव हार जाय.

नेतनयाहू, ओबामा-हिलेरी की इस्लामिक ताकतों के प्रति नरमी की नीति से सहमत नहीं थे और इस्लामिक कट्टरपंथियों के विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही से खुश नहीं थे. हकीकत यह है कि अमेरिका का प्रशासन, इज़रायल की हठधर्मिता से नाखुश था जो कि उनकी मध्य एशिया की तेल नीति के लिये अहितकारी थी.

ट्रम्प अभी सऊदी अरब हो कर आये हैं और दो दुश्मनों, सऊदी अरब और क़तर दोनों को ही खरबो का सैन्य समान बेच आय है. मजेदार बात यह है कि इन दोनों ही देशों में, इन दोनों देशों की रक्षा के लिये उनके ही खर्चे पर अमेरिका की सेना भी तैनात है.

वहीं सऊदी अरब से ही ट्रम्प ने ईरान को निशाना बनाया है और सऊदी की पीठ पर हाथ रखा है. यह ट्रम्प के अमेरिका का इस्लामिक कट्टरवाद को समूल नष्ट करने के लिये, सुन्नी-शिया टकराव को बढ़ावा देने की नीति है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे.

अब यहीं बात आती है कि ट्रम्प ने कट्टरवाद और आतंकवाद के साथ इस्लामिक शब्द का प्रयोग किया क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से ईरान को इस्लामिक आतंकवाद के राजनीतिकरण के लिये जिम्मेदार बता चुके हैं, जो सही भी है, लेकिन मोदी जी यह नहीं कह सकते हैं.

मेरे ख्याल से जब ट्रम्प कह ही रहे हैं तो मोदी जी उसको कहने से बच गये. आज अभी भारत की प्राथमिकता, सऊदी और ईरान की चक्की से बच कर निकलना है क्योंकि उसको दोनों से ही लाभ लेना है, जो दोनों के टकराव की स्थिति में और ज्यादा होगा. विश्व एक नये समीकरण की तरफ बढ़ चुका है और बहुत कुछ आज समझ में आने वाला भी नहीं है.

यह मोदी-ट्रम्प की वह अनशेड्यूल मीटिंग थी जहां जो सामने बोला गया है वह सिर्फ एक दिखावा है, जिसे मीडिया के सामने पहले से रटे हुये डायलॉग बोल कर खानापूरी की गयी है.

यकीन मानिये, विश्व के अन्य राष्ट्रों के विदेश विभाग, उनकी गुप्तचर संस्थायें व थिंक टैंक, मेरी तरह इसका बिल्कुल भी संज्ञान नहीं ले रहे हैं. लेकिन जिस चीज़ को वह पढ़ रहे हैं, वह है दोनों के बीच का कम्फर्ट लेवल.

वह इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि ट्रम्प जैसा, बदतमीज़ और झक्की (उनकी इमेज यही है) अमेरिकी राष्ट्रपति, विश्व को यह प्रदर्शित करना चाहता है कि मोदी-ट्रम्प के बीच सम्बन्ध प्रगाढ़ हैं. ट्रम्प की बॉडी लैंग्वेज यह बता रही थी कि वे किसी अंजान व्यक्ति से नहीं मिल रहे हैं बल्कि वे किसी नियति को तय करने वाले रणनीतिकार का इंतज़ार कर रहे हैं.

जहां वैश्विक जगत में दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच प्रोटोकॉल बहुत महत्वपूर्ण होता है, वहीं अमेरिका का राष्ट्रपति, पत्नी समेत 5 मिनिट तक अगवानी के लिये बाहर खड़ा रहा है, वह बहुत कुछ कह जाता है. मेरा अंदेशा है कि ट्रम्प की अपनी नीति की सफलता के लिये, मोदी जी की भूमिका बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है.

ट्रम्प-मोदी की इस 5 घण्टे की मुलाकात में सबसे महत्वपूर्ण और भविष्य निर्णायक वह 15 मिनिट की एकांत में हुयी मुलाकात है, जिसकी कभी भी सार्वजनिक रूप से कोई भी चर्चा नहीं होगी. इस पर लोग भविष्य की गतिविधियों से सिर्फ अंदाज़ा ही लगायेंगे.

मेरा जो इस विषय पर अनुभव है उसके आधार पर मेरा आंकलन है कि इन 15 मिनटों में इन दोनों ने उस विषय पर बात की होगी, जो अब तक यह दोनों राज नेता, अनाधिकारिक सन्देशवाहकों के माध्यम से करते रहे हैं. इसमें बलूचिस्तान को लेकर अवश्य बात हुयी है.

इन 15 मिनटों में इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतनयाहू के लिये, अरब नीति को लेकर व्यक्तिगत सन्देश भी होगा. नेतनयाहू के मोदी जी से किस स्तर के व्यक्तिगत सम्बंध है वह उनके ‘my friend’ वाले ट्वीट से समझा जा सकता है.

नेतनयाहू हो या ट्रम्प, जब राजनेता सोशल मीडिया पर इतनी प्रगाढ़ता दिखाते है तो वह वैश्विक कूटनीति में, इसे दूसरों को सन्देश देने के रूप में देखा जाता है. मुझे इस मुलाकात से यह भान होता है कि मध्य एशिया/ ईरान / पाकिस्तान को लेकर कुछ पर्दे के पीछे चल रहा है.

मोदी जी की अमेरिका यात्रा की अचानक घोषणा और यात्रा की वैश्विक प्रतिक्रिया मिलने लगी है. अमेरिका ने ठीक मुलाकात से पहले पाकिस्तान में पनाह पाये हिजबुल के चीफ सईद सलाहुद्दीन, जो कश्मीरी भारतीय है, को कश्मीर में आतंकवाद का जिम्मेदार मानते हुये अन्तराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया है.

चीन की मानसरोवर यात्रा पर रोक और सिक्किम व अरुणाचल की सीमाओं पर चीनी सेना का उत्पात और पहली बार चीन का भारतीय सेना द्वारा उसकी सीमा में 3 किमी घुसकर कब्ज़ा करने का विरोध दर्ज कराना, यह सब मोदी ट्रम्प की मुलाकात की प्रतिक्रिया है. चीन, भारत को लेकर चिंतित है लेकिन उसी के साथ वह भारत से अभी युद्ध में भी नहीं उलझना चाहता है.

ईरान जहां शिया, सुन्नी-वहाबी द्वारा साफ किये जाते है, के राष्ट्रपति का कश्मीर पर बेमौसम बोलना भी इसी मुलाकात की प्रतिक्रिया है. आगे का समय बड़ा उत्तेजक, युद्धउन्मादी और रक्तरंजित है.

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