भटकाव और किनारे की व्यथा

बताइये कौन भटकता है नदी या किनारे?
चंचल, स्त्रीधर्मा नदी ही भटक सकती है
स्थिर, दृढ़ किनारे कभी नहीं

भावों के ज्वार से अनियंत्रित धारा भूल जाती है मार्ग कई बार,
किनारे हमेशा खड़े करते हैं बस एक उसका इंतजार,
कैसे उन पेड़ों से किनारों को बतियाते देख धारा चकित हो सकती है?
गोपीयों संग कृष्ण को देख राधा व्यथित हो सकती है?

जानती हो किनारो का पेड़ों से संबंध?
इशारा काफी हैं या लिखूं निबंध,
पढ़ा नहीं तुमने कभी
कैसे जड़ें बांधे रखती है किनारों को,
क्या कोई गाली देता है निष्काम सहारों को?

ना उन वृक्षों के फलों से किनारो को कोई मतलब होता है,
और ना किनारों के सौंदर्य से वृक्षों को दुर्भाव तलब होता है.
हमदर्दों की नीयत पे जिन्हें शंका होती है
उनके हिस्से तन्हा रोने की आशंका होती है.

सोचा है कभी परिस्थितियों के सूखे में
जब तुम किनारो को छोड़ बहने लगती हो खुद में,
तरसते किनारों का विरह में पेड़ ही तो सहारा बनते है,
चिंता ना करो, वर्षा होगी, वो फिर बहेगी सुखद इशारा करते हैं.

पढ़ती तो समझती, पेड़ ही तुम्हारे लिए मेघों को बुलाते हैं,
बरसते हैं मेघ उनके तप से और तुम्हें फिर से धाराप्रवाह बहाते है.
किनारो को जो फिर से तुम्हारा स्पर्श मिलता है,
उसके अंतर में इन पेड़ों का एहसान झलकता है.

तुम्हारी गलती नहीं है, पढ़, समझ पाने के लिए रुकना जरूरी होता है,
हृदय के छोटे से दरवाजे में घुसने के लिए थोड़ा झुकना जरूरी होता है.

ठहरो और देखो पीछे कभी दौड़ते अतीत के घोड़ों को,
मैंने तो कभी नहीं कहा भटकाव तुम्हारे प्रवाह के मोड़ों को?

श्रृंगार किया उन मोड़ों को तुम्हारी कमर का बल कहकर,
और तुम मुझे समझा रही हो निस्पृह मित्रता को छल कहकर.

देखो कभी की शैशव, युवा और अधेड़ तुम्हारी धारा होती है,
जो जन्म से ही हों परिपक्व वही मिट्टी सक्षम किनारा होती है.

मानता हूं स्वतंत्रता तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार होती है,
तुम, वो पेड़, नन्ही सी घास बस यही तो किनारों का संसार होती है.

“अवरुद्ध” करके स्वयं को, बांधो के झांसे में ना आओ तुम,
“किनारों” को दंडित करना है तो थोड़ा जोर से बह जाओ तुम.

इतना तेज बहो कि वो “मनहूस ” पेड़ों की जड़ें बचा ना पाये,
साथ बहकर तुम्हारे, मिट्टी थे फिर से बस मिट्टी ही हो जाये.

अच्छा है तुम्हारे विरह में सूख के टुकड़े टुकड़े होकर मरने से,
मिट जाए मिट्टी होकर तुम्हारे हाथों और बह जाए किसी झरने से.

जान लो कि अवरुद्ध हो जाने से केवल किनारे समाप्त नहीं होते,
बाधित हो प्रवाह धारा का तो स्वयं नदी को अभीष्ट प्राप्त नहीं होते.

समर्पण ना होता तो विरह में सूखे किनारो में दरारे नहीं होती,
नम ही रहते किनारे भी जो कभी कुओं से नमी मांग ली होती.

फर्क करना सीखो कुओं और पेड़ो में तुम भी,
फर्क करना सीखो भेड़ियों और भेड़ो में तुम भी,

बैठे हैं कई खाल ओढ़े तुम्हारी महफ़िल में
पेड़ तो नही हटेंगे, भेड़ियों को खदेड़ो तुम भी.

मोहब्बत है तुमसे, उसके सदके सौ बार झुक जाऊंगा,
निर्दोष हूँ तो कटघरे में एक क्षण भी ना रुक पाऊंगा.

सोने का हो भले, गर प्यार तेरा पिंजरे सा है,
तोड़ के सब बंधन अनंत गगन में उड़ जाऊंगा ..

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