सनातन धर्म में संस्कारों का महत्व – 2

प्राचीन काल में बहुत बड़ी संख्या में संस्कार होते थे, गौतमसूत्र में अड़तालीस संस्कार बताए गए हैं. सुमन्तु ने पच्चीस संस्कार बताए थे. इनमें ज्यादातर अतिशयाधन होते थे जो मनुष्य को देवकोटि में पहुंचा देते थे. परंतु मुख्य रूप से 16 ही संस्कार अब हिन्दू जाति में प्रसिद्ध हैं जिनके नाम गौतम सूत्र के आरम्भ में आए हैं और जो व्यास जी ने इस युग के लिए अपनी स्मृति में उपयोगी बताए हैं. यह सोलह संस्कार हैं, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्त्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास, अंत्येष्टि.

सनातन धर्म की मान्यता है कि एक बार माता के गर्भ से जन्म होता है और एक बार संस्कारों से. मनुस्मृति का वचन है, ‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते’ अर्थात जन्म से तो सभी शूद्र पैदा होते हैं, संस्कारों से ही मनुष्य ‘द्विज’ बनता है. यह सभी शास्त्रीय संस्कार पूर्ण वैज्ञानिक हैं परंतु समय के साथ बाह्यआडम्बर ने भी इनमें स्थान ले लिया और वैज्ञानिक विधि से ध्यान हट गया.

बहुत समय केवल थोड़े ही लुप्तप्राय संस्कारों का प्रचार था. गर्भाधान, पुंसवन और जातकर्म आदि तो स्वप्न ही हो गए थे वहीं गुरुकुलीय परंपरा के अभाव में उपनयन आदि की भी बस किसी प्रकार कर्तव्यपूर्ति कर ली जाती थी. अधः पतित हिन्दू जाति में शास्त्रविहित संस्कारों का अभाव देखकर श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य जाति में संस्कारों के प्रचार के लिए उल्लेखनीय प्रयास किया था.

संस्कारों की शास्त्रीय पद्धति का काफी सम्बन्ध मनोविज्ञान से है. यदि शिशु के गर्भ में होते समय या उसे समीप बिठाकर यदि माता पिता वेदमन्त्रों द्वारा मन में यह भाव करें कि हम इसके दोष हटा रहे हैं(दोषमार्जन) या इसमें विशेषता ला रहे हैं(अतिशयाधन) तो उस मनोवृत्ति का प्रभाव शिशु के अंतःकरण पर जरूर पड़ता है. यह मनोविज्ञान सभी संस्कारों में काम करता है.

गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन संस्कार बालक के जन्म से पहले गर्भावस्था के संस्कार हैं. पति पत्नी शारीरिक, मानसिक आदि योग्यता और सामर्थ्य देखकर जब सन्तान उत्पत्ति के लिए तैयार होते हैं उसे गर्भाधान संस्कार कहते हैं. सन्तान जब माता के गर्भ में होती है तब उसके शरीर और मन को अपनी इच्छानुसार माता बना सकती है. इसलिए गर्भस्थ शिशु के शारीरिक विकास के लिए ‘पुंसवन’ और मानसिक विकास के लिए ‘सीमन्तोन्नयन’ संस्कार का विधान है. बालक के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए सूत्रों और चरक आदि सहिंताओं में माता के आहार और विहार के बहुत से नियम बताए गए हैं.

सीमन्तोन्नयन का सीधा सम्बन्ध बालक के मन और मस्तिष्क से है. शास्त्रकारों ने माता को ऐसा साँचा माना था जिसमें माता पिता बच्चे को जैसा चाहे ढाल लें, इसलिए माता पिता जैसा मानसिक जीवन व्यतीत करते हैं उसकी सीधी छाप गर्भस्थ शिशु पर पड़ती है जो अब पश्चिमी विज्ञान भी मानता है.

अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया के स्कूल ऑफ मेडिसिन के वरिष्ठ प्रोफेसर और डॉक्टर्स सोंजा एंट्रिंजर, क्लॉडिया बस, पथिक वाधवा आदि की रिसर्च का निष्कर्ष निकाला कि, “गर्भावस्था के दौरान, भ्रूण का मस्तिष्क नाटकीय ढंग से संरचनाओं और तंत्रिकाओं के रूप में विकसित होता है, जो भविष्य के सभी तरह के विकास के लिए आधार प्रदान करता है. इन शुरुआती तंत्रिका प्रक्रियाओं के बेहतर या बदतर के विकास के लिए भ्रूण का माहौल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

मातृ तनाव के कारण भ्रूण पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकते हैं. यह प्रभाव तनाव के कारणों, समय, अवधि और तनाव की तीव्रता पर निर्भर करते हैं. गर्भकाल में माता-पिता और भ्रूण के बीच का बॉण्ड और समृद्ध खुशहाल वातावरण, संभावित नकारात्मक परिणामों से बचाव करता है.”

आश्चर्य की बात नहीं है कि आज का विज्ञान यह कह रहा है. क्योंकि विज्ञान ने जब जब वैदिकज्ञान से दूर होने की कोशिश की तब तब उसे मुंह की खानी पड़ी, फिर लौटकर वेद की ही शरण में उसे आना पड़ा. हमारे यहाँ अभिमन्यु द्वारा सुभद्रा के गर्भ में ही अर्जुन द्वारा व्यूहरचना सीख लेने की कथा किसे नहीं पता. सुश्रुत सहिंता में इस विषय में अनेक श्लोक मिलते हैं. मनुस्मृति में भी लिखा है — “गर्भवती स्त्री जिस प्रकार की तस्वीर अपने हृदय में खींच लेती है, वह उसी प्रकार की संतान को जन्म देती है. इसलिए उत्तम सन्तान के लिए स्त्री को ऐसे वातावरण में रखना चाहिए जिससे सन्तान उत्तम तथा शुद्ध संस्कारों की हो.” (मनु० 9.9)

पुंसवन और सीमन्तोन्नयन संस्कारों में गर्भिणी के सामने वीणावादन व मधुर गायन का विधान भी सूत्रों में मिलता है. माता और शिशु के शारीरिक विकास और सुरक्षा हेतु पुंसवन संस्कार के लिए बेहद विस्तृत रूपरेखा ग्रन्थों में मिलती है. वहीं शिशु के मानसिक विकास हेतु सीमन्तोन्नयन संस्कार के लिए भी ग्रन्थों में और हिन्दू लोक परम्पराओं में बहुत सुंदर और वैज्ञानिक प्रारूप हैं. यही नहीं शिशु को गर्भ से ही मनचाहे गुण को प्राप्त कराने हेतु अलग अलग वर्णन मिलता है. माता मदालसा की कथा अत्यंत लोकप्रिय है, जिन्होंने गर्भ से ही अपने पुत्रों को ब्रह्मज्ञान हेतु तैयार किया था.

शेष क्रमशः………

– मुदित मित्तल

[सनातन धर्म में संस्कारों का महत्व -1]

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  1. Manav dharm ke aage manushya dwara nirmit sanskar,Sanskrit aur sabhyata ka robe dikhana samantshahi ka fashions hain.asal baat hoti hain aathrik Sanskrit I,samya sanskriti.aaj bhi jab Bharat main 55.corore ki aabadi BPL categaris main aati ho to unke liye Rozi,Roti,shiksha,health ki baat na kar achanak social media main sanatan,sanskriti,Sanskrit aur sabhyata ki charcha kaise chal paid hain.achha abhi abhi ek dalit rashrapati phir se Bharat ka rashtrapati ban gaya hain Isliye.

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