पंचम दा : पूरे चांद की रात में मटकों में रागों को घोंटता बेढब योगी

78 साल पुरानी एक शराब है, जिसके सहारे आज भी कई लोग जीते हैं. कहते हैं ये शराब जिसके मुंह लगी, फिर नहीं छूटी. इस शराब को ‘पंचम’ कहते हैं. आज इस शराब का सुरूर एक कतरा और बढ़ गया होगा. आज राहुल देव बर्मन का 73वां जन्मदिन है.

पिछले कई साल में पंचम के बारे में, उनके अलहदा संगीत के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है और आज भी फ़िल्मी पत्रकार उनके बारे में कोई भी नई बात जानने के लिए उत्सुक रहते हैं, क्यों. आज देशभर के डिस्को लाउंज में सबसे ज्यादा गीत पंचम के ही बजाए जाते हैं. पंचम के गीतों के रीमिक्स वर्जन से युवा पीढ़ी भलीभांति परिचित है. उनको मैं विद्रोही संगीतकार मानता हूँ. दुनिया सड़क पर चलेगी तो पंचम उसके किनारे पगडंडी पर गुनगुनाते हुए चलेंगे. कुछ तो ख़ास था इस बंदे में कि हमारे बाद की पीढ़ी भी उसके गीतों की मुरीद है.

कई किस्से हैं उनके, कुछ सुने कुछ अनसुने. आज पंचम दा की जिंदगी के उन कुछ पन्नों को खोलने की कोशिश करूँगा, जो बहुत कम लोग जानते होंगे. एक बार इंटरव्यू के दौरान एक सवाल उनके कमरे में रखी ट्राफियों के बारे में आया. उन्होंने कहा ‘ये तो बहुत थोड़ी है, कई तो मेरे गैराज और गोडाउन में पड़ी है. लेकिन तुम जानते हो मेरे लिए सबसे अच्छा अवार्ड कौनसा है. जब रेलवे स्टेशन पर कुली मेरा गाना गुनगुनाते हुए निकलता है और वो जानता भी नहीं कि ये गीत मैंने बनाया है.

मैं और पंचम कई बार कार से खंडाला निकल जाते. वो अपना बायां पैर मोड़कर सीट पर रख लेता. उसके हाथ में एक सिगरेट झूलती रहती और बायां हाथ कार की छत पर तबला बजा रहा होता. ऐसे ही एक सफर में कोई धुन उसके भीतर से बाहर आने को मचलती रही. बाद में खंडाला के रनडाउन होटल में एक बरसाती रात में उसने ‘खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों(खेल खेल में) की धुन बना डाली. -(आशा भोंसले)

जब पंचम के पिता सचिन देव दिल की बीमारी से जूझ रहे थे तो देव आनंद ने ही उनकी मदद की थी. बाद में देव का मन भी बदल गया जब उनकी फ़िल्म ‘स्वामी दादा'(1982) फ्लॉप हो गई. इस फ़िल्म में पंचम ने संगीत दिया था. ये वो दौर था जब फ़िल्मी संगीत में डिस्को का प्रवेश हो चुका था और पंचम से प्रोड्यूसर किनारा करते जा रहे थे. जैसे उसकी जिंदगी का कोई सुर बिगड़ गया था. ऐसे दौर में भी उसने सागर(1985) और इज़ाजत(1987) जैसे कालजयी गाने रचे.

पंचम और जी सकता था, हमें अपने सुरूर में और झूमा सकता था लेकिन वो ज़माने से हार गया. उसे नाकामियों से ज्यादा अपनों की बेवफ़ाई ने मारा. 1994 में जब वो नहीं था, तब उसकी फ़िल्म 1942 ए लव स्टोरी का संगीत आया. वो संगीत नहीं था बल्कि ‘चेरी’ थी. ये उस केक पर लगाई गई, जिसे पंचम ने खुद सजाया था. 1942 ए लव स्टोरी की कामयाबी उसका स्टारडम फिर लौटा लाती लेकिन तब तक वो बहुत दूर जा चुका था.

पंचम की कल्पना मैं एक बेढब योगी के रूप में करता हूँ. बाल बेतरतीब बढ़े हुए, श्वेत दाढ़ी में चमकती आँखे लिए वन-वन भटकता है. नई-नई जड़ी-बूटी लेकर आता है. फिर किसी पूरे चांद की रात में अलग-अलग मटकों में ‘रागों’ को घोंटता है.

जाते-जाते पंचम के एक गीत की बात. ये आम गीत नहीं है. पंचम के संदूक में कहीं कोने में दुबका बैठा रहता है. ये गीत नदी के दो किनारों के बीच है. एक किनारे पर जोगी है तो दूसरे किनारे पर जोगन. और बीच में पानी की कलकल करती ध्वनि है. और पंचम है बस पंचम.
‘भरी दुपहरी घाट पे देखो धूप जलाए रे
कैसे-कैसे जादू-टोने नदी बहाए रे
जोगी जाने, रोग पुराने
जोगी को मन का रोग दिखाना है’

 

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