GST की कहानी-3 : इसे लागू करने के लिए क्यों अड़ी थी सरकार

पिछले दो लेखों में मैंने GST को लागू किये जाने के पीछे की वजहों के बारे में लिखा. और इन वजहों के बावजूद राज्यों, कंपनियों के GST के पुरजोर विरोध के बारे में लिखा. इस विरोध को दूर करने के लिए सरकार को सिंपल साधारण GST को कैसे थोड़ा जटिल करना पड़ा, इसका जिक्र किया.

[GST की कहानी-1 : अर्थशास्त्र का सही नियम, नहीं लगना चाहिए टैक्स के ऊपर टैक्स]

अब आगे…

आखिर केंद्र सरकार GST को लागू करने के लिए क्यों अड़ी थी. पहले कांग्रेस की सरकार भी थी जो दिखावे को मीटिंग पर मीटिंग कर रही थी लेकिन कोई समाधान दूर-दूर तक नहीं था.

फिर मोदी सरकार ने इतने राज्यों को कैसे मनाया, इतने समझौते क्यों किये?

इसके पहले मोदी सरकार ने डिमॉनेटिजेशन किया था जिसका घोषित उद्देश्य काले धन का खात्मा था, करप्शन पर लगाम थी. लेकिन एक सेकेंडरी कहिये या मुख्य उद्देश्य कहिये, डिमॉनेटिजेशन का उद्देश्य सरकार के लिए इनकम टैक्स बेस बढ़ाना था.

[GST की कहानी-2 : जानें, फायदों के बावजूद क्यों था इसका इतना विरोध]

कैशलेस इकॉनमी इसीलिए लायी गयी क्योंकि इससे कम्पनीज़ को अपनी इनकम छिपाना मुश्किल होगा. सब कुछ सामने होगा, कंपनी का भी और किसी व्यक्ति का भी. सबका रिकार्ड होगा.

यही उद्देश्य GST के पीछे भी है. अपने टैक्स बेस को बड़ा करने का. तमाम व्यापार जो कच्चे बिल पर चलते हैं उन्हें टैक्स के दायरे में लाने का.

GST दरअसल एक चेन है. ITC (इनपुट टैक्स क्रेडिट) चेन. GST एक्ट के मुताबिक किसी कंपनी या व्यापारी को टैक्स इनपुट का लाभ तभी मिलेगा जब उसके सप्लायर ने उसे प्रॉपर इनवॉइस दी हो, जिसमें सप्लायर ने कंपनी पर GST लगाया हो और बाकायदा सरकार को जमा भी किया हो.

क्यों सरकार GST को ऑनलाइन कर रही है, सॉफ्टवेयर बेस्ड बना रही है, शायद अब आप समझें.

एक डाटाबेस में सब रिकार्ड रहेंगे, कोई कंपनी टैक्स इनपुट क्लेम करेगी, तो पता चल जायेगा कि उसके पहले की कंपनी ने GST लेकर उसे चुकाया भी है या नहीं. और यही पूरी चेन के लिए होगा.

चेन में किसी ने भी GST बचाने की कोशिश की तो उसे बाकी सप्लायर ऐसा नहीं करने देंगे. क्योंकि उस कंडीशन में अगर एक कंपनी GST नहीं देगी, कच्चा बिल देगी, तो दूसरी कंपनी आगे GST का इनपुट क्लेम नहीं कर पायेगी, और उसकी प्रोडक्शन लागत बढ़ जाएगी. उसका माल बाकी प्रतिद्वंदी से महंगा हो जायेगा.

इसे सरकार सेल्फ पुलिसिंग कहती है. सेन्ट्रल और स्टेट टैक्स अथॉरिटी के अलावा सेल्फ पुलिसिंग टैक्स बेस को बढ़ाने में मदद करेगी.

ऐसा नहीं है कि सरकार को केवल अपनी चिंता है, सरकार ने GST एक्ट में एक प्रावधान और किया है, एंटी प्रोफिटियरिंग का.

1 जुलाई से ट्रांजिशन फेस है. कंपनियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ मिलेगा और साथ में कुछ कंपनियों के लिए उनके माल की टैक्स कीमत में बदलाव भी होंगे. टैक्स रेट बदलेगी. 5% टैक्स वाली वस्तु 12% या 18% ब्रैकेट में आएगी.

कम्पनियाँ अपनी वस्तुओं के दाम बढ़ाने की कोशिश करेंगी. इनपुट टैक्स बेनिफिट का फायदा कस्टमर को नहीं देंगी. इसी तरह घटे टैक्स दर को भी व्यापारी लोगों तक पहुँचाना नहीं चाहेंगे.

खास उदाहरण उन कंपनियों का है जिन्हें CST में सप्लाई मिलती रही है और आगे वो माल को बेचते हैं.

जैसे एक-दूसरे प्रदेश से 100 रूपये कीमत का कच्चा माल ख़रीदा उस पर 10% CST दिया. उस कच्चे माल से कोई वस्तु बनाई और उसे 200 रूपये में आगे बेचा. कस्टमर से 200 के ऊपर 12% वैट वसूल किया. कस्टमर को 224 रूपये कीमत पड़ी.

GST के बाद उसी कच्चे माल को उसने 112 रूपये में ख़रीदा अगर 12% GST माना जाये. और आगे 224 रूपये में बेचा. कस्टमर पर एहसान जताया कि GST में इनपुट टैक्स दर बढ़ गयी है. लेकिन उसने अपनी कीमत वही रखी है.

उसे 2 रूपये एक्स्ट्रा GST के जरूर कच्चा माल खरीदते समय चुकाने पड़े. पहले CST 10% था, लेकिन जब उसने अपना माल बेचा तो उसे GST के रूप में 24 रूपये मिले. जिसमें से उसे सरकार को सिर्फ 12 रूपये देने हैं. 12 रूपये टैक्स इनपुट के उसके पास आ चुके हैं

12 रूपये उसके पास हैं, 2 रूपये घटाकर भी उसे 10 रूपये का फायदा है. ये पैसा वो अपने पास रख सकता है या कस्टमर को रेट कम करके दे सकता है. उसके माल की कीमत 224 नहीं 215 रूपये होनी चाहिए.

अगर कोई कंपनी, व्यापारी ऐसा नहीं करता है तो GST एक्ट के तहत उस पर जुरमाना लगेगा. और उसे अपने तमाम कस्टमरों को अवैध ढंग से कमाया पैसा वापस करना होगा. एंटी प्रोफिटियरिंग अथॉरिटी स्वयं या किसी की भी कंप्लेंट पर जांच करेगी और सजा सुनाएगी.

हालांकि इस प्रावधान का विरोध हमारे प्रिय कांग्रेसी एवं वामपंथी ये कहकर कर रहे हैं कि इससे इन्स्पेक्टर राज की वापसी हो जाएगी. कंपनियों को टैक्स अथॉरिटीज़ से परेशानियां बढ़ेंगी.

लेकिन सरकार ने एक चीज बहुत साफ़ की है. सब कुछ ऑनलाइन. टैक्स अथॉरिटी और टैक्स पेयर के बीच कम से कम इंटरेक्शन.

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