ये काली पट्टी आपके ‘इस्लाम’ का अंधेरा है

आखिरकार रहा न गया, बोलना ही पड़ा. ये जो काली पट्टी बांध के ईद मनाने का आयोजन आप कर रहे हैं न, यही शुद्ध शुतुरमुर्गी रवैया है, जो मोहम्मडन को अब भी 14 शताब्दी पीछे घसीट देता है.

आपकी पुरानी बीमारी है, संख्या में कम होने पर रोने लगना, काली पट्टी लगा लेना और जहां बहुसंख्यक हुए, वहीं केरल में एक हिस्से में ‘शरिया’ लागू कर देना, एक गली का नाम ‘गाज़ा पट्टी’ रख देना, बर्मा में हुई किसी घटना की खुन्नस मुंबई में शहीदों का अपमान कर देना, कैराना से लेकर मालदा और मुज़फ्फरनगर से लेकर सीमांचल तक, सब कुछ खुला और सामने है, कॉमरेड. उस पर सोचिए.

आप पहलू खान से लेकर अखलाक और न जाने कितनों के नाम गिनाते हैं, पर पंडित अयूब की मां, बीवी और बहन के निहायत ही अमानवीय डायलॉग्स भूल जाते हैं- ‘वह तो काफिर नहीं था, हिंदू या यहूदी नहीं था… फिर क्यों मार दिया, एक बार देख तो लेते….’

आखिर, इसे सुनकर आपकी रीढ़ की हड्डी सर्द क्यों नहीं पड़ जाती… क्योंकि आपके लिए भी वही सच है… आपको उसमें कुछ अलग दिखता ही नहीं, वस्तुतः आप भी उसी की तैयारी कर रहे हैं, उसी की ताक में हैं.

आपने गौर किया है, हिंदुत्व ने हमेशा ही अपने अंदर से ही सुधार के उपाय अपनाए हैं. आज की बात छोड़िए, बुद्ध और महावीर भी तो हिंदुत्व के अंदर से ही हुए.

मध्यकाल में बर्बर मुगलों के समय हिंदुत्व ने कबीर, तुलसी, रामानुज, रैदास, दादूदयाल दिए जिन्होंने कठोरतम शब्दों में धर्म की बुराइयों की आलोचना की और आधुनिक काल में राममोहन राय, स्वामी दयानंद से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक हुए, जिन्होंने हिंदुत्व को झाड़ा बुहारा.

चलिए, हिंदू तो काफिर हैं, बुतपरस्त हैं, उन्हें इलहाम नहीं हो सकता, लेकिन ईसाइयों तक ने खुद के अंदर से ही रिफॉर्म किए हैं. दो टुकड़े हो चुके हैं और इस भयंकर हिंसक धर्म ने अपने अंदर ही हिंसा को संजो लिया है. 200 साल तक आप ही लोग लड़े हैं न साहब!

इस्लाम का मकान बहुत वर्षो, सदियों से झाड़ा-पोंछा नहीं गया है. इसमें बहुतेरे जाले, बहुतेरी मकड़ियां लग चुकी हैं. धूल बैठ गयी है. आपके घर की सफाई, मैं या कोई नेता नहीं कर देगा. वे तो केवल आपका शोषण करेंगे. आप खुद सफाई कीजिए.

आखिर आप क्यों नहीं, काफिरों को वाजिब-उल-कत्ल बताने वाली आयतों पर बात करते हैं, क्यों नहीं दारुल-इस्लाम के कांसेप्ट पर चर्चा करते हैं, क्यों नहीं आप हलाला, तहर्रुश या तीन तलाक जैसी अमानवीय प्रथाओं पर खुद में ही बात करते हैं.

सोच कर देखिएगा, कि आखिर क्यों नहीं इस्लाम में एक भी सुधारवादी आवाज़ बर्दाश्त की जाती है. आखिर सरमद की खाल खींचने से लेकर बांग्लादेश के ब्ल़ॉगर की हत्या तक इस्लाम का दामन खून से तर क्यों है? आखिर क्यों एक इलहामी किताब के कंटेंट पर चर्चा तक से बड़े से बड़ा बौद्धिक मुसलमान डरता है, कांपता है…….

यह आपको ही करना है और जल्द करना है. पूरी दुनिया में आपके खिलाफ भावनाएं उच्चतम स्तर पर हैं. फैसला आपको करना है, आप 2017 में भी 1400 ईस्वी के मुताबिक ही रहना चाहते हैं या उसमें कुछ संशोधन मुमकिन है.

और हां, याद रखिएगा कि जब तक आप यह नहीं करेंगे, आपकी सेवइंयों में कश्मीरी केसर की लाली नहीं, खून की सुर्खी ही लोगों को दिखेगी. बाकी तो मेरी तरफ से भी ईद मुबारक रहेगी… बढ़िया कपड़े पहनिए, इत्र से तर होइए, भाईजान की फिल्म देख आइए और हमारे जैसे तो यही कर ही रहे हैं –

अजां हो गयी है, पिला जल्द साकी,
इबादत करूं आज मख़मूर होकर

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