आपातकाल की खानदानी विरासत

देश ने सबसे पहली इमरजेंसी भारत-चीन युद्ध के समय साल 1962 में देखी जिसे देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने लगाया था.

युद्ध के समय इस संवैधानिक कानून के उपयोग करने की व्यवस्था है और साल 1975 में इंदिरा जी के द्वारा इसके तीसरी दफा इस्तेमाल से पहले, दूसरी बार 1971 के युद्ध के समय लगाया गया था देश में.

1947 के बाद का पाकिस्तान का पहला हमला और एनडीए की सरकार में अटल जी के समय का कारगिल युद्ध इसके अपवाद रहे.

भारत-चीन युद्ध के समय आखिर वे कौन से आंतरिक, अशांत हालात थे जिसके भय से नेहरू जी को इस संवैधानिक व्यवस्था को पहली बार लागू करने का निर्णय करना पड़ा?

नेहरू को देश के भीतर किनसे और किस तरह के विद्रोह, घरेलू अराजकता, विश्वासघात की आशंका थी… जिसके कारण संवैधानिक प्रावधान आपातकाल को बाबा अम्बेडकर की किताब से निकल पहली बार जमीन पर उतरना पड़ा? जो आजादी के तुरंत बाद के कठिन हालात, कारगिल के विश्वासघात जैसे युद्ध में भी नहीं लगाया गया जबकि लगाया जा सकता था!

नेहरू के कानों तक पहुँचा… इसी देश के पहले इमरजेंसी के वक्त, कलकत्ते से साम्यवादिओं, कामरेडों का नारा ”दिल्ली दूर लेकिन पेकिंग नजदीक है” जरूर बीते वक्त के पन्नों पर, सुर्ख रंगों में दर्ज है.

आगे यह समयानुकूल विद्रोह की रवायत साल 1975 की इमरजेंसी आते-आते इंदिरा और आपातकाल के समर्थन वाली भक्तिकाल में कैसे तब्दील हो गयी, यह भी एक स्वहित समयानुकूलन ही कहा जा सकता है.

आसमानी नारे लगाने की दार्शनिक गुलामी और वैचारिक मजदूरी में समय-बेसमय वर्तमान केंद्र सरकार पर इमरजेंसी जैसे हालात के तोहमत लगाने वालों, असहिष्णुता के प्रायोजित खेल में अवार्ड वापसी गिरोहों को एक तथ्य आईने के सामने खड़े होकर जरूर याद करना चाहिए –

भाजपा की एनडीए सरकार ने कारगिल युद्ध के समय संवैधानिक आधार और नेहरू-इंदिरा की शुरू की गयी परंपरा के बावजूद इस आपातकाल नाम की व्यवस्था को युद्ध के हालात में भी छुआ तक नहीं.

अपनी स्वामिभक्ति की खानदानी रवायतों को निभाने में… राजनैतिक, वैचारिक भक्ति करते हुए… खुशी, समर्थन की थालियाँ परोस… देश की सीमाओं से भी पार जाने वाली, आजादी से पहले कंपनी सरकार और आजादी के बाद सत्ताधारी पार्टी के छायावाद तले… अनैतिक गठजोड़ के तेल में अस्तित्व की पकौड़ियाँ लाल करते आने के इतिहास रखती जमातें…

…आज जब राजनैतिक समर्थन, विरोध में भक्ति, भक्त जैसे जुमलों से खेलती दिखती हैं… तो एक सहज जुमला उठता है : भारतीय राजनीति में भक्तिकाल के सृजनकर्ताओं को इसके पैदाइश की कोख नहीं तलाशनी चाहिये, खुद के पुरखों के अवशेष बरामद होंगे.

आजादी के बाद से अभी तलक… देश हित के मसलों तक राजनैतिक, दार्शनिक, वैचारिक भक्ति, भक्त और स्वामी की तलाश… इन ऐतिहासिक तथ्यों की आसान सी पड़ताल और पहचान करती हैं.

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