सनातन धर्म में संस्कारों का महत्व -1

हिन्दू धर्म में आजकल वैदिक संस्कार केवल नाममात्र के रह गए हैं, जहाँ संस्कार प्रचलित भी हैं वहाँ भी उनके महत्व को न जानकर कर्तव्यपूर्ति अधिक होती है, विधि में भी अपनी सुविधानुसार परिवर्तन कर लिए जाते हैं इसलिए हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों को जानना बहुत आवश्यक है, इस श्रृंखला में हम सरल शब्दों में संस्कारों की बात करेंगे.

संसार में दो प्रकार की वस्तुएं हैं- एक प्राकृत दूसरी संस्कृत. प्रकृति प्रदत्त जो वस्तु अपने रूप में ही बनी रहती है जैसे सूर्य, वृक्ष, नदी, मिट्टी आदि तब उसे प्राकृत कहते हैं. पर जब प्राकृत वस्तु को अपने उपयोग लाने के लिए उसमें परिवर्तन या सुधार कर देते हैं तब उसे संस्कृत कहते हैं. यह जो सुधार किया जाता है, यही संस्कार है.

संस्कार तीन प्रकार का होता है : पहला दोषमार्जन, दूसरा अतिशयाधन, तीसरा हीनांगपूर्ति. प्रकृति प्रदत्त पदार्थ में यदि कोई दोष हो और उसे निवृत्त करने से हमारे उपयोग लाया जा सके तब उसको दोषमार्जन कहते हैं. उस पदार्थ में यदि कोई विशेषता उत्पन्न करके उसे उपयोग लेते हैं तब अतिशयाधन कहते हैं और यदि फिर भी कोई त्रुटि रह जाए जो किसी अन्य पदार्थ के सम्मिलन से दूर की जाए तब हीन-अंग पूर्ति कहते हैं.

सामान्यतया हम प्राकृत पदार्थों से हमारी आवश्यकताएं पूरी नहीं कर पाते, पदार्थों का संस्कार करके ही उन्हें उपयोग कर पाते हैं. उदाहरण के लिए लोहे या अन्य धातुओं को ही देखिए, वह जिस रूप में खदान से निकलता है, हमारे लिए बिल्कुल अनुपयोगी ही होता है, पर फैक्ट्रियों में पहले उसकी अशुद्धियाँ और खदानों के अन्य दोष हटाकर दोषमार्जन किया जाता है, फिर उसको विभिन्न रूपों में ढाल कर चाकू, गाड़ी, मशीनें आदि बनाकर उसकी विशेषता को बढ़ाकर अतिशयाधन किया जाता है, और अंत में चाकू में पकड़ और गाड़ी में अलग अलग पुर्जे लगाकर उनकी हीनांगपूर्ति कर दी जाती है तब ऐसी संस्कृत वस्तुएं हमारे बड़े काम आती हैं.

इसी प्रकार अन्न को देखिए, हम खेतों से सीधा अन्न की फसल निकालकर नहीं खाते, इसमें रूचि भी नहीं हो सकती और उससे तो हमारे दांत ही छिद-भिद जाएं, जीभ छिल जाए और पेट भी उसे पचा न सके. इसलिए पहले दोषमार्जन संस्कार में उसमें से अनुपयुक्त वस्तुएं भूसी, कंकड़-पत्थर निकाल दिए जाते हैं फिर उस दोषरहित अन्न को काटकर, कूटकर, पीसकर, पकाकर खाने योग्य विशेषता देकर अतिशयाधन संस्कार करते हैं और अंत में रूचि के लिए मीठा-नमक, मिर्च-मसाले डालकर रुचिकर बनाकर हींनागपूर्ति संस्कार भी कर देते हैं.

आज संसार में जड़ वस्तुओं के तो अच्छे अच्छे संस्कार करके भौतिक उन्नति की होड़ है पर मनुष्य को संस्कारित करने में गहरी उदासीनता है. परन्तु वैदिक संस्कृति का मुख्य लक्ष्य अंतर्जगत की उन्नति की ओर रहा था, इसलिए हमारे ऋषियों ने मनुष्यों के अनेक संस्कारों की सुंदर सर्जना की थी जिससे मनुष्य में उपयुक्त गुण लाकर उसे समाज के लिए बहुत उपयोगी बनाया का सकता था.

चरक ऋषि ने कहा है — ‘संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते’ अर्थात संस्कार पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह सद्गुणों को आधान कर देने का नाम है.

शास्त्रों में मनुष्य के संस्कारों को भी तीन तरह का बताया है – दोषमार्जन, अतिशयाधन और हीनांगपूर्ति. उन संस्कारों की चर्चा हम लेख के अगले भाग में करेंगे.

शेष क्रमशः….

– मुदित मित्तल

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