योग हिन्दू है!

योग सब के लिए समान रूप से अपनाने योग्य और लाभदायक है, यह बात ठीक है पर यह बात पूरी तरह गलत है कि योग का किसी धर्म से लेना देना नहीं है.

योग विश्व को किसने दिया? सनातन वैदिक धर्म ने दिया, जब ये बात बात में खतरे में पड़ने वाले मजहब पैदा भी नहीं हुए थे उससे भी करोड़ों साल पहले वैदिक धर्म ने योग दिया.

जैसे किसी बच्चे के बारे में यह कहना कि इसे किसीने पैदा ही नहीं किया, यह आसमान से टपका, उतना ही यह गलत है कि योग का किसी धर्म से लेना देना नहीं है. सनातन धर्म योग का जन्मदाता है, सनातन धर्म सार्वभौम है, अतः योग स्वतः सार्वभौम है. सम्पूर्ण अष्टांग योग वेद वेदांगों के सिद्धांतों पर ही अवलम्बित है और वेद सनातन धर्म के हैं ईसाई मुसलमानों के नहीं.

योग महर्षि पतंजलि की देन है, वे सनातनी थे, हिन्दू थे. वे मुसलमान नहीं थे, ईसाई नहीं थे, बौद्ध, जैनी, यहूदी नहीं थे. तो किसी को यह बोलने का क्या अधिकार है कि योग का धर्म से लेना देना नहीं है. महर्षि पतंजलि जब योगसूत्र के दूसरे तीसरे अध्याय में स्पष्ट रूप से ॐ की व्याख्या कर रहे हैं, योग में ॐ के उच्चारण का प्रतिपादन कर रहे हैं तो किसी को यह बोलने का अधिकार किसने दिया कि योग हिंदुत्व से संबद्ध नहीं है?? योग हर प्रकार से धर्म का अंग है.

कोई बताए जीसस ने योग किया था क्या? मुहम्मद योगी था क्या? कौन योगी था इन अवैज्ञानिक पन्थों में? तो योग का इन मत पन्थों से कोई सम्बन्ध हो सकता है भला?? योगी पतंजलि थे, योगी श्री राम थे, योगी श्रीकृष्ण हुए, वे सब सनातनी हिन्दू थे. इसलिए योग को सनातन धर्म से अलग करना मूर्खता है. योग सनातन धर्म का अविभाज्य अंग है.

योग दिवस से यह नतीजा निकल रहा है कि योग को मात्र व्यायाम तक सीमित कर दिया है, सनातन धर्म का ऐसे योग दिवसों से कोई लाभ नहीं हो रहा.

जिसे योग करना है वह स्वीकार करे कि योग सनातन धर्म का अंग है और यह अत्यंत लाभकारी है इसलिए हम इसे स्वीकार कर रहे हैं, अन्यथा इसमें मनमाने परिवर्तन केवल पतन के कारण हैं, लाभकारी नहीं. यदि ऐसा नहीं होता तो ऐसे योग दिवस निष्फल हैं, इनसे सनातन धर्म को कोई लाभ नहीं, जब स्वयं धर्म से पृथक करने की बात कर रहे हो तो यह अपमान है योग का, धर्म का. हिन्दू शेर-चीतों का तर्क भी गज़ब है, कहते हैं देखो यह योग दिवस से सनातन वैदिक धर्म का प्रचार हो रहा है, अरे मेरे भाई जब सारी सरकारें, बाबे आदि सब के सब चीख चीख कर कह रहे हैं कि योग का धर्म से लेना देना नहीं तो इससे हिन्दू धर्म का कैसा प्रचार हुआ??

बाबा लोग तो योग को अहिंदू साबित करने को ऐसे तुल गए कि गुरुत्वाकर्षण को ईसाई बताने लगे, कहते हैं कि अगर तुम किसी को योग को हिन्दू मानने पर विवश करोगे तो हवा में तैरने की तैयारी करो, ग्रेविटी पर तुम्हारा अधिकार ही नहीं, हम योग की शेखुलरता नहीं जाने देंगे. वाह महाराज धन्य आप और आपकी ग्रेविटी, न्यूटन ने तो बस शोध के जगत में पूर्वप्रतिपादित सिद्धांत को ही अपना बताकर पेश कर दिया और इसलिए ग्रेविटी ईसाई कहला गई आपके अनुसार, पर हमारे ऋषि मुनियों ने वेद वेदांगों के समुद्र का मंथन करके योग रूपी अमृत को प्राप्त किया, फिर भी वह हिन्दू न हो सकी. आज हम असुरों को यह अमृत पिलाने के लिए बावले हुए जा रहे हैं, श्रीविष्णु को भी आज मोहिनी स्वरूप धारण करने की आवश्यकता नहीं, असुरों के मुंह में जबरदस्ती योगरूपी अमृतधारा उंडेल दी जाएगी.

राष्ट्रीय और हिंदुत्व की वर्तमान सच्चाई से परिचित होने पर भी विपरीत राग अलापने वाले सार्वजनिक संत बहुत खतरनाक होते हैं. कहीं पर आप देश और समाज की चिंता व्यक्त करो, और कहीं गलत रूप में ‘एक एव हि भूतात्मा, भूते भूते व्यवस्थितः’ का उपदेश देकर उल्टी गंगा बहाओ, पहले ही सोये हुए हिन्दू समाज को सार्वभौमिकता का सेकुलर इंजेक्शन दो!! जो देश और समाज से ऊपर उठ चुके हैं, वे योगी तो वास्‍तव में हिमालय चले गए, कभी कैमरे के सामने चहकते नहीं, लेकिन एसी हॉल में प्रवचन देने के बाद अगर कोई यह कहता है कि मेरा इन सबसे कोई लेना देना नहीं है, योग तो सार्वभौम है हिन्दू नहीं, तो मुझे दिखाई देता है कि मानो ‘योगऋषि’ स्वामी रामदेव जी केवल 9 दिनों के अनशन से अस्पताल में भर्ती होकर समाधि की उस अवस्था का उपदेश करते हों जब मानो कई वर्षों का निराहार योगी तो वृक्ष का तना ही बन गया और उसपर सांप फिरते हैं… या अहिंसा और शांति के दूत श्री श्री रविशंकर सफेद कबूतरों सदृश्य ISIS को शांति-प्रस्ताव भेजते हों और मलेच्छों की गुरुदक्षिणा में कटे सिरों की तस्वीरें प्राप्त होती हों….

यह देखकर सावरकर जी की गोमांतक के निनामी बाबा याद आते हैं, अब निनामी बाबा कौन थे यह जानने के लिए पढ़ें ‘गोमांतक’…

|| जय श्री राम ||

  • मुदित मित्तल

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