GST की कहानी-2 : जानें, फायदों के बावजूद क्यों था इसका इतना विरोध

पिछली लेख में मैंने लिखा कि कैसे टैक्स के कैस्केडिंग इफेक्ट की वजह से वस्तुएं महँगी थी, भले दिखावे को कोई राज्य उन पर कम से कम सेल्स टैक्स लगाए. ये कैस्केडिंग इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट, देसी खपत सभी को प्रभावित कर रही थी. इसके बुरे नतीजे सभी को दिख रहे थे.

[GST की कहानी-1 : अर्थशास्त्र का सही नियम, नहीं लगना चाहिए टैक्स के ऊपर टैक्स]

जब लगभग समूचा विश्व GST की तरफ बढ़ चुका था, हम करीब 60 सालों तक पुरानी टैक्स व्यवस्था को ही ढोते रहे. 2000 के दशक में हमने सेल्स टैक्स की जगह वैट प्रणाली इंट्रोड्यूस की. लेकिन वो पूरे देश के लिए नहीं थी. सिर्फ राज्य के लिए थी. अंतर्राजीय सेल्स में वैट की जगह CST बरक़रार था. एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी, लक्जरी टैक्स सर्विस टैक्स अपनी जगह लग रहे थे.

फिर वैट की भी एक दर नहीं थी, चार दरें थीं. स्टील का बर्तन अगर उत्तर प्रदेश में 5% वैट पर होता तो वही बर्तन कर्णाटक में 14% वैट पर हो सकता था. राज्यों को अधिकार था कि वो वस्तुओं पर अपने मुताबिक वैट की दर लगा सकें.

यानि वैट सिर्फ एक इंटर मीडियटरी कदम था. समाधान नहीं था. साठ सालों के बाद भी देश एक टैक्स की मंजिल नहीं पा सका था.

एक देश एक टैक्स यानि कि टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन सरल होता, कंपनियों की टैक्स देने की कम्प्लायंस बढ़ती, ज्यादा से ज्यादा कम्पनियाँ, व्यापारी टैक्स ब्रैकेट में आते, प्रोडक्शन कॉस्ट कम होती, सभी की जिंदगी आसान होती.

GST के लिए 2006 में कांग्रेस सरकार ने गंभीर कोशिशें शुरू की. 2010 से GST लागू करने का लक्ष्य रखा गया. और जैसे देश में तूफान आ गया. बीजेपी, राज्यों, व्यापारियों, कंपनियों ने चौतरफा आलोचना शुरू की. GST को सपोर्ट से ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ रहा था.

कैसा विरोधाभास है, जो बीजेपी कल विरोध कर रही थी, आज वही इसे लागू कर रही है. तमाम राज्य जैसे गुजरात के CM मोदी जी (उस समय), महाराष्ट्र, केरल उस समय GST के प्रबल विरोध में थे.

तमाम ज्ञात फायदों के बाद भी GST का इतना विरोध क्यों था, आखिर ये कन्फ्लिक्ट क्यों था.

भारत का ढांचा संघीय है. संविधान केंद्र को शासन के अधिकार देता है तो राज्यों को भी देता है. संविधान के मुताबिक डायरेक्ट टैक्स केंद्र लगाता है. इनडायरेक्ट टैक्स में सर्विस टैक्स, एक्साइज ड्यूटी केंद्र लगाता है, तो थोक और खुदरा बिक्री पर लगने वाला वैट / CST राज्यों के पास जाता है.

किसी भी राज्य के लिए उसे प्राप्त होने वाले रेवेन्यू का लगभग 75-80% हिस्सा इनडायरेक्ट टैक्सेज़ से आता है. जिससे कोई भी राज्य सरकार जनकल्याणकारी योजनाएं चलाती है.

संविधान हर राज्य को अधिकार देता है कि वो किसी भी वस्तु पर टैक्स दर निर्धारित करे, छूट दे. कांग्रेस जो GST का प्रारूप ला रही थी उसमें राज्यों के अधिकार सीमित थे. सिंगल GST था, जो केंद्र को मिलता और केंद्र उसमे राज्यों को उनका हिस्सा देता.

अभी बीजेपी जो GST लायी है वो डुअल GST है, SGST और CGST. रेट भी एक की जगह 4 हैं. खैर इस पर विस्तार से चर्चा किसी और लेख में.

मुख्य बात ये थी कि कांग्रेसी GST में वस्तुओं पर टैक्स दर निर्धारित करने का राज्य का अधिकार खत्म हो जाता. किसी भी राज्य जिसकी आय का मुख्य स्रोत्र ही ये टैक्स हो उनके लिए इसे छोड़ना बहुत मुश्किल है.

तमिलनाडु में कभी बच्चों को स्कूल लाने के लिए मिड-डे मील योजना शुरू की. सभी ने आलोचना की. सवाल उठे इसका पैसा कैसे आएगा. केंद्र सपोर्ट नहीं कर रहा था.

तत्कालीन सरकार ने कई वस्तुओं पर टैक्स दर बढ़ाई और उससे हुई अतिरिक्त आमदनी से मिड डे मील योजना को सपोर्ट किया. आज मिड डे मील योजना केंद्र और हर राज्य सरकार चला रही है. राज्य के अनूठे प्रयोग का ये एक उदाहरण है.

इसी तरह 80 के दशक में ही महाराष्ट्र ने सूखे के बाद किसानों को रोजगार देने के लिए रोजगार गारंटी एक्ट बनाया. जिसका पैसा प्रोफेशनल टैक्स एवं मौजूदा टैक्स दरों को बढाकर जुटाया. यही अधिनियम आगे चलकर मनरेगा का आधार बना.

ऐसी स्थिति में कोई भी राज्य टैक्स दर निर्धारित करने का अधिकार क्यों छोड़ेगा. अपने हाथ-पैर क्यों काटेगा. यही कारण है कि GST में कई स्लैब बने, टैक्स दरों के बैंड बन रहे हैं.

शराब और पेट्रोलियम प्रोडक्ट GST से बाहर रखे गए हैं. राज्य इन पर पहले की तरह कंट्रोल रखेंगे. क्योंकि लगभग हर राज्य के लिए ये दोनों तेल और शराब आय के मुख्य सोर्स हैं.

कैस्केडिंग इफेक्ट जिस पर पहला लेख पूर्णतया आधारित था, उसका असल फायदा तो राज्यों को ही था. टैक्स पर टैक्स लगता जाता तो उसका अंतिम फायदा तो राज्य को ही था. क्योंकि ये इफेक्ट सेल्स टैक्स या CST में ही था.

और ये पैसा जैसे राज्य सरकारों के मुंह में खून लगा रहा था. राज्य इस अतिरिक्त आमदनी को गंवाने को तैयार नहीं थे. GST लाइए लेकिन हर राज्य की शर्त थी कि उसे होने वाली आमदनी में कमी न होने पाए. जितना पैसा उसे सेल्स टैक्स से मिल रहा है, उससे एक पैसा कम किसी राज्य को मंजूर नहीं था.

कांग्रेस ने राज्यों को मनाने की बहुत कोशिशें की. पांच साल तक किसी भी घाटे को दूर करने की पेशकश हुई. जिसे बीजेपी सरकार ने भी अपनी नीति बनाया. इस नीति को न्यूट्रल रेवेन्यू फार्मूला भी कहा जाता है.

अब इस मांग को स्वीकार करने का अर्थ था GST टैक्स को ऊँची दर पर लगाना. कैस्केडिंग की वजह से इफेक्टिव टैक्स रेट 30% तक जाता था. अगर GST 12% पर आता तो निश्चित था हर राज्य के राजस्व में भारी कमी आती और केंद्र के लिए उसे पूरा करना असंभव होता जाता.

इस दर को निर्धारित करने का कोई सटीक फार्मूला भी नहीं था. अनुमान थे, तमाम थिंक टैंक, संस्थान इस काम पर लगे थे. जिन्होंने अंत में अपनी एक रिपोर्ट में GST की टैक्स दर 26% करने का सुझाव दिया.

26% का अर्थ था कि जनता, कंपनियों का विद्रोह, इन्फ्लेशन आसमान पर. अर्थव्यवस्था ज़मीन पर.

GST कई देशों में बहुत कम दरों पर है. जैसे न्यूजीलैंड में 10% GST लगता था, अब 15% हुआ है. इसका कारण है कि जितनी ज्यादा वस्तुएं GST के दायरे में होंगी, GST की दर उतनी कम रखी जा सकेगी.

लेकिन भारत में ऐसा होना मुमकिन नहीं. खाने पीने दूध सब्जी न जाने कितनी चीजों पर टैक्स न लगा है, न लग सकता है. फिर सरकार क्या करे?

टैक्स रेट कैसे निर्धारित हो. ज्यादा करें तो परेशानी, कम रखें और ज्यादा से ज्यादा चीजों पर टैक्स लगाएं तो परेशानी.

इसीलिए अभी जिस तरह का GST आया है वो एकदम सरल होने की जगह जटिल हो गया है. चार-चार दरें, उस पर से सेस, पेट्रोल डीज़ल, सिन यानी पापी वस्तुएं, सिगरेट, शराब, कोका कोला GST से बाहर इसीलिए हैं.

यही निगोशिएशन इतने साल चला है. इसीलिए सरकार इसे अपनी बड़ी विजय मानती है. यही कारण है कि जब मोदी सरकार आयी तो सबसे पहले लिए फैसलों में एक ये भी था कि केंद्र को मिलने वाले टैक्सों में राज्यों का हिस्सा 33% से बढाकर 42% कर दिया गया था.

योजना आयोग को भंग करने के पीछे बड़ी वजह राज्यों के ऊपर से केंद्रीय अंकुश खत्म करना था. और यही कारण है कि कांग्रेस GST कभी नहीं ला पाती. उसके बस का ही नहीं था.

कहानी अभी बाकी है, अगली क़िस्त में कुछ और बातें.

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