आर्यसमाज को धन्यवाद : क्योंकि बिना विरोध नहीं हटते अवरोध

कभी कभी विरोधी अनजाने में आपकी बहुत सहायता कर देते हैं. उनका मुकाबला करके आप और मजबूत हो जाते हैं, किसी न किसी रूप में आप समृद्ध हो जाते हैं. इसका एक उदाहरण है आर्यसमाज. इस लेख में मुझे आर्यसमाज का खण्डन नहीं करना है, बल्कि आर्यसमाज को एक रूप में धन्यवाद देना चाहूंगा कि उसने अनजाने में क्या कर दिया. आर्यसमाज ने सनातन धर्म की सभी परंपराओं में अविश्वास किया, जिन परंपरा को इन्होंने माना भी उसमें अपने अनुसार मनमाने परिवर्तन कर लिए. जैसे वेद को ही देखिए, वेद की प्राचीन परिभाषा में वेद के दो भाग हैं,

१. सहिंता भाग और
२. ब्राह्मण भाग.

सहिंता भाग का अर्थ वेद मंत्रों की सहिंता से है. ब्राह्मण भाग में फिर तीन भेद हैं, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद और आरण्यक. सनातनी परम्परा के सभी आचार्यों, वैदिक धर्म के सभी सम्प्रदायों ने हमेशा यही माना. परन्तु आर्यसमाज की मान्यताओं के विरुद्ध होने के कारण इन्होंने पूरे ब्राह्मण भाग को ही वेद से निकाल दिया और केवल चार सहिंताओं को वेद मान लिया. यह वेद की बहुत बड़ी निंदा है इस दृष्टि से ये नास्तिक कहे जा सकते हैं.

इसी तरह सनातन धर्म की अधिकांश बातें इन्होंने नहीं मानी, अठारह के अठारह पुराणों को नकार दिया जिनके बिना आज हिन्दू धर्म की कल्पना भी मुश्किल है, और उनकी बहुत आलोचना भी की, भगवान के साकार स्वरूप और मूर्तिपूजा को भी नहीं माना. साथ ही सनातन धर्म के कुछ एक ग्रन्थों को छोड़कर किसी को नहीं माना, जिन्हें माना भी उनमें से इनके मत के विरुद्ध हर चीज को निकाल दिया, जैसे महाभारत का 90% भाग और रामायण, मनुस्मृति के 50% भाग निकाल दिए.

ऐसी परिस्थिति में जबकि इनका मत ऊपर ऊपर से बहुत चमकीला और अंदर से एकदम खोखला था, साथ में मुसलमानों ईसाईयों के विरुद्ध भी ये काम करते थे तो उससे बहुत लोग इनकी तरफ आकर्षित होते थे. सनातनी आचार्यों को इनका समुचित उत्तर देने की आवश्यकता महसूस हुई और उन्होंने दिया भी, जड़मूल से इनके मत के पाखण्ड का खुलासा बड़े परिश्रम से आचार्यों ने किया, इनके द्वारा सनातनधर्म पर लगाए गए सभी आरोपों का बड़ी कुशलता से सन्तों ने जवाब दिया. इनके मत द्वारा सनातन धर्म में जो जबरदस्त घालमेल किया गया था उसकी बड़े सलीके से सफाई की.

सनातन धर्म पर बाहर से बहुत हमले हुए, अंदर भी बहुत से खराब सम्प्रदाय हुए पर वे कभी वैदिक साहित्य से छेड़छाड़ नहीं कर पाए थे, मूल ग्रन्थों तक उनकी पहुंच सीमित थी पर आर्यसमाज ने आंतरिक रूप से वैदिक धर्म को क्षति पहुंचाई थी और सभी सिद्धांतों में मनमाने परिवर्तन करने का प्रयास किया इसलिए सनातन धर्म के प्रहरी आचार्यों का हृदय पुकार उठा, मचल उठा और प्राणप्रण से उन्होंने इस अतिक्रमण और आक्रमण का सामना किया. दयानन्द तिमिर भास्कर, आर्यसमाज की मौत आदि अनेक ग्रन्थ इनके खण्डन में लिखे. शास्त्रार्थ महारथी पण्डित माधवाचार्य शास्त्री जी द्वारा पुराण दिग्दर्शन और क्यों जैसे अद्वितीय ग्रन्थ मिले.

स्वयं धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज ने इनके मुख्य ग्रन्थ ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के उत्तर में ‘वेदार्थ पारिजात’ की रचना की जो कि वेदार्थ समझने की इच्छा रखने वालों के लिए एक मूलभूत ग्रन्थ बन गया. फिर उन्होंने यजुर्वेद के वेदार्थ पारिजात भाष्य की रचना की जिसमें आर्यसमाज के यजुर्वेद के भ्रामक अर्थों का सांगोपांग खण्डन करते हुए मूल आध्यात्मिक अर्थ प्रकट किया. इनके खंडन स्वरूप एक प्रामाणिक वेदभाष्य हिन्दूओं को मिल गया. इस तरह अपनी पुस्तकों में कदम कदम पर सनातन आचार्य आर्यसमाज के आक्षेपों का भी खण्डन करते चले.

अब वापस आते हैं मूल बात पर, आर्यसमाज के द्वारा उठाया गया हर आक्षेप सनातन धर्म के मुख्य विश्वासों/परम्पराओं/मान्यताओं पर प्रहार था, इसलिए जब आचार्यों ने उनका प्रतिउत्तर दिया तो उन विश्वासों/मान्यताओं/परम्पराओं का हर तरह आध्यात्मिक से लेकर वैज्ञानिक तक हर तरह का विवेचन किया, और बहुत सूक्ष्मता और प्रमाणिकता से उन सबका महत्व बताया. अगर आर्यसमाज ऐसे आक्षेप नहीं करता तो बहुत सम्भव था उन परम्पराओं/मान्यताओं/सिद्धांतों के महत्व पर उतना प्रकाश नहीं डल पाता.

इससे एक बहाना भी मिल गया और विशुद्ध विपुल वैदिक ज्ञान भी प्रकट हो गया. कई लोग ऐसा मानते हैं कि आर्यसमाज की वजह से सनातनी आचार्यों का बहुत समय नष्ट हो गया, जिस समय को वे और फलदायी कामों में लगा सकते थे, यह भी सोचने का एक तरीका है, सही है. परन्तु मैं पहले वाले को मानता हूँ इससे आगे के लोगों को हर सम्भावित प्रश्न का समाधान उपलब्ध हो गया, जिससे वे भटकने से बच पाएंगे और उसे पढ़ने से सनातन धर्म में उनकी श्रद्धा और बढ़ेगी.

हज़ारों लोग जो किसी भी वजह से आर्यसमाजी बन गए थे जब उन्होंने इन समीक्षाओं को पढा तो पुनः शुद्ध सनातनी हो गए वह भी और अधिक विश्वास के साथ. एक और बात, बहुत से श्रद्धावान धार्मिक लोग जब इस मत के आक्षेप सुनते हैं तो उन्हें बहुत कष्ट होता है फिर वे उसका उत्तर ढूंढने की कोशिश करते हैं, उस खोज में उन्हें ये ग्रन्थ मिलते हैं, जिन्हें पढ़कर उनकी श्रद्धा और ज्यादा बढ़ जाती है. आर्यसमाज ने हिन्दू धर्म को क्या योगदान दिया, क्या नफा नुकसान दिया वह अलग बात है. मुझे बस यही विचार आ रहा था कि जाने अनजाने में विरोधी भी फायदे पहुंचा देते हैं जिन्हें हम देख नहीं पाते.

– मुदित मित्तल

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