ये न तो काफ़िर था और न ही भारतीय सैनिक, फिर उसे क्यूँ मार दिया गया?

आगंतुक फ़ारसी जबान में बोला, “हुज़ूर आपके दरबार के विद्वानों से भरे होने का जिक्र सुना है!” अगले ही वाक्य में उसने अपनी भाषा बदल दी, “मैं भी उन्हें देखने चला आया”, इस बार वो पुर्तगाली में बोला. तीसरे वाक्य में उसकी जबान फ्रेंच थी, “मैं जांचना चाहता था कि क्या वो ये बता सकते हैं कि मेरा असली मुल्क कौन सा है?”

दरबारी हैरान थे वो सवाल सुनते ही बगलें झाँकने लगे. बिलकुल साफ़-साफ़ तीन अलग-अलग जबानों में बोलने वाले का असली मुल्क कोई कैसे पहचाने? सबने आगंतुक से अलग-अलग भाषाओँ में लम्बी बात-चीत की कोशिश की. नतीजा सिफ़र ही निकला, आगंतुक दस-पंद्रह भाषाएँ बड़े आराम से बोलता था.

बेइज्जती से घबराए महाराजा ने फुसफुसा कर महामंत्री से सलाह की, लेकिन वो भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे. किस्मत से महामंत्री के बूढ़े हो चले पिताश्री जीवित थे, वो अब दरबार आने के बदले कहीं भजन कीर्तन में मन लगाते थे.

महामंत्री ने आगंतुक से एक-दो दिन राजकीय मेहमान होने को कहा और राजा साहब को बताकर पिताजी के पास भागा. महामंत्री की वयोवृद्ध पिता ने समस्या सुनी, लाठी टेकते उठ खड़े हुए और बेटे के साथ ही दरबार आ गए.

थोड़ी देर तक आगंतुक को बोलते सुना फिर चिल्लाये, सिपाहियों इसे उठाकर कारागार में डाल दो! सिपाहियों की प्रतिष्ठा भी दरबार की इज्जत से जुड़ी थी, फिर सेवानिवृत हो चुके महामंत्री की बात टालने की कोई वजह भी नहीं दिख रही थी, चुनांचे आगंतुक को वो उठा कर कालकोठरी में फेंक आये.

एक-दो दिन तक तो वृद्ध उसे चैन से पड़ा रहने देते, मगर अचानक किसी सुबह तड़के ही पहुँच कर जेल में सोये आगंतुक पर एक बाल्टी ठंडा पानी फिंकवा देते. पहले दिन चीखता, घबराया आगंतुक उठा, दूसरी बार भी ऐसा होने पर हड़बड़ाता-बड़बड़ाता जागा. तीसरी बार जब वो चीख कर जागा तो वृद्ध ने कहा, “अब ठीक है, ले चलो इसे दरबार में”.

दरबार पहुँच कर वो राजा से बोले, “हुजूर ये अरब का कोई विद्वान् है”. सबने पूछा कैसे मालूम? तो वृद्ध बोले, “होशो हवास में तो ये अपनी जानकारी अपना ज्ञान इस्तेमाल कर लेता था, मगर मैंने इसे पहले बंदी बना कर दुखी कर डाला. फिर जब सुबह सवेरे ही इसपर आधे होश-आधी बेख़याली में ठंडा पानी पड़ता तो ये ‘या अल्लाह मदद’ चीखता हुआ जागता था. मातृभाषा का पता उसी से चला”.

ये चीज़ अब के दौर में करनी हो तो सिक्ख, बिहारी या मारवाड़ी पर इस्तेमाल कर सकते हैं. ये लोग कई जगहों पे जा के रहते हैं, और वहां की स्थानीय भाषा भी अच्छे से सीख जाते हैं.

पटना सिटी के गुरूद्वारे के आसपास के सरदार जी की भोजपुरी, मगही अच्छी होती है, हमने मैथिलि बोलते भी देखा है. बिहारी जाकर चेन्नई, तमिलनाडु, आन्ध्र में बस जाते हैं और एक पीढ़ी बीतते-बीतते मलयालम, तमिल, तेलगु बोलने लगते हैं.

उनकी असली भाषा पहचानना हो तो किसी बात पर गुस्सा दिला दीजिये. गुस्से में जैसे ही दिमाग काम करना बंद करेगा और वो गालियाँ बकने लगे तो उसकी असली भाषा बाहर आ जाती है.

जैसे ही “भैन…” बोला मतलब पंजाबी में सोच रहा है, “मदर…” या “धी…” पे वो हिंदी पट्टी का है ये आसानी से समझ आ जायेगा. मेक माय ट्रिप वाले प्रचार में नायक के “भैंस की आँख” कहते ही नायिका का “दिल्ली का है” पहचानना तो देखा होगा ना टीवी पर?

वही दोबारा देखना हो तो कश्मीर वाले पुलिस अधिकारी मुहम्मद अयूब के मरने पर उनकी माँ-बहन के रोने में सुन लीजिये. डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की ख़ुद की माँ और बहन रोते-रोते पूछ रही हैं कि उनका बेटा/ भाई न तो काफ़िर था और न ही भारतीय सैनिक, फिर उसे क्यूँ मार दिया गया?

इसे बेहद ग़ौर से बार-बार सुनिए और ध्यान दीजिए कि यह बात किसी दीनी मदरसे में जिहाद के लिए प्रशिक्षित इस्लामिक आतंकवादी की माँ-बहन नहीं बल्कि दो घरेलू, आम सी दिखने वाली मुस्लिम महिलाएँ कह रही हैं. ग़म की घड़ियों में सिर्फ़ एक काफ़िर या एक भारतीय सैनिक होने की वजह से बेरहमी कुचल कर मारा जाना बिलकुल सहज और जायज़ लगता है.

ठीक इसी तरह की प्रतिक्रिया 2015 के पेशावर आर्मी स्कूल हमले में मारे गए एक बच्चे की साधारण गृहिणी सी दिखती माँ की दिखी थी एक पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल पर. अपने बच्चे की लाश पर फूट-फूट कर रोते वक़्त भी जिसका मासूम सा सवाल यही था कि उसका बच्चा तो न हिन्दू था न यहूदी, फिर उसे क्यूँ इतनी बेदर्दी से हलाक़ कर दिया गया?

बाकी आप कश्मीरियत का हवाला जरूरी दीजिये, ‘पीट पीट कर किसी को भी मारना गलत ही है’, जैसे तर्कों से मोहम्मद अयूब की मौत को ढकिये. बस माहे-पाक ना कह बैठिएगा, हम फिर “बदर की जंग” याद दिला बैठेंगे.

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