‘वांटेड’ के बाद पहली बार असफलता का स्वाद चखेंगे मिस्टर खान

“तूने अगर भारत माता की जय नहीं बोला तो तू हिंदुस्तानी नहीं है” और “हमसे देशभक्ति का सर्टिफिकेट मांगने वाले तुम कौन हो”.

जाने-पहचाने लग रहे हैं न ये संवाद. पिछले दो साल में अनगिनत बार बोले गए ये संवाद एक वर्ग विशेष के लिए जैसे प्रतीक बन गए हैं. ठीक यही संवाद जब हम सलमान खान की फ़िल्म ‘ट्यूबलाइट’ में सुनते हैं तो माथा ठनक जाता है. कबीर खान की ये फ़िल्म प्रत्यक्ष रूप से तो भारत-चीन सम्बंधों की बात कहती है लेकिन नेपथ्य में हमें चीन की जगह पाकिस्तान सुनाई देता है.

चीन का नाम लेकर देश के बहुसंख्यक वर्ग पर चोट करने की कोशिश है, वही भारतीय सैनिकों के भागने के दृश्य से निश्चित रूप से सेना का मान मर्दन हुआ है. हालांकि कबीर खान अपने इस संदेश को अमली जामा पहना नहीं पाए क्योंकि कहानी बनावटी लगती है.

छोटे से कस्बे में एक चीनी महिला का बेटे के साथ रहने आना और युद्ध शुरू होने के बाद उन पर हमले होना अस्वाभाविक लगता है. हमें नहीं लगता कि अतीत में कभी ऐसी घटनाएं हुई हैं.

कबीर खान का निर्देशन इस बार मूर्खता की हदें लाँघ गया. जादू से चट्टान हिलाने वाले दृश्य बहुत हास्यापद लगते हैं. स्क्रीनप्ले में कई छोटे छेद है जो फिल्मांकन में बड़े गड्ढे बन गए हैं.

सलमान खान जितना इस फ़िल्म में रोए हैं, उतना तो अपनी सारी फिल्मों में नहीं रोए होंगे. फ़िल्म का कोई एक दृश्य भी ऐसा नहीं रहा जो छाप छोड़ गया हो. एक नीरस अंत देखने के बाद दर्शक जब बाहर आता है तो उसे सलमान के स्टारडम में ताज़ी उभर आई दरार साफ़ नज़र आती है.

कबीर खान चाहते तो चीन के बजाय पाकिस्तान भी चुन सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. एक समुदाय की भावनाओं को देश तक पहुँचाने के लिए उन्होंने चीन के भ्रम का सहारा लिया.

तो इन सबमें सबसे नया ये है कि वांटेड के बाद मिस्टर खान पहली बार असफलता का स्वाद चखेंगे. फ़िल्म को दर्शक ने सिरे से नकार दिया है. कबीर खान की ऑडियोलॉजी भारत-पाक सरहद पर सिर पटक रही है क्योकि फ़िल्म प्रदर्शित होने से ठीक पहले एक कश्मीरी पुलिस अधिकारी की निर्मम हत्या कर दी गई.

‘ट्यूबलाइट’ जैसी एजेंडावादी फिल्मों को हमारा दर्शक स्वयं ही निरस्त कर देता है. सोचने वाली बात है कि राष्ट्रगान के समय थिएटर में स्वःस्फूर्त खड़े होने वाला भारतीय दर्शक क्या भारतीय सेना का अपमान सहेगा. कदापि नहीं.

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