कमांडर जाधव प्रकरण में पकड़ाया पाकिस्तान का एक और सफेद झूठ

कमांडर कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान की ख़ुफ़िया ऐजन्सी आई एस आई ने ईरान से अपहरण करके फौजी अदालत में पेश करके ख़ुफ़िया गिरी के आरोप में सजाए मौत सुना दी.

अन्तरराष्ट्रीय अदालत ने पाकिस्तान की दलीलों को ठुकराते हुए निर्णय सुनाया है कि जब तक इस प्रकरण की अन्तिम सुनवाई अन्तर्राष्ट्रीय कोर्ट में पूरी न हो जाए पाकिस्तान जाधव को मौत की सजा नहीं दे सकता है.

पाकिस्तान की फौजी कोर्ट ने पाकिस्तान आर्मी एक्ट १९५२ की धारा ५९ और ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट सन् १९२३ की धारा तीन के अन्तर्गत सजाए मौत सुनाई है. हास्यास्पद बात यह है कि कुलभूषण जाधव पर पाकिस्तान का आर्मी एक्ट १९५२ लागू ही नहीं होता.

जहां तक ऑफीसियल सीक्रेट एक्ट १९२३ का प्रश्न है , वह पाकिस्तान बनने के पूर्व २५ साल पुराना है और तब पाकिस्तान का कोई अस्तित्व नहीं था ,. इस एक्ट को अविभाजित भारतवर्ष के लिए अंग्रेजों ने बनाया था. यह एक्ट स्वत: ही १९४७ में समाप्त हो गया , इसे पाकिस्तान की पार्लियामेन्ट ने कभी भविष्य में लागू होने का प्रस्ताव पास ही नहीं किया. जब उस एक्ट को पाकिस्तान में लागू करने की कोई अधिसूचना ही नहीं है तो उसकी धारा तीन के अन्तर्गत सजा कैसे दी जा सकती है.

पाकिस्तान ने गुरूवार २२ जून को कुलभूषण का एक वीडियो जारी किया है जिसमें ‘तीन मर्तबा’ यह दुहराया गया है कि भारत की गुप्तचर ऐजन्सी रॉ के मुखिया अनिल धस्माना को कुलभूषण रिपोर्टिंग करता था तथा धस्माना के आदेश पर ही वह पाकिस्तान में जासूसी कर रहा था. जाधव के इस वीडियो में यह भी कहलाया गया कि धस्माना ही दुबई के मार्फत हवाला के जरिये आतंकी कार्यवाही के लिये बडी मात्रा में पैसे भेजते थे. धस्माना ने ही एक बार ४० हजार डालर दुबई के मार्फत बलूचिस्तान में आतंक फैलाने भेजे थे.

कहा जाता है कि झूठ के सौ पर होते हैं. कोई कितना भी चालाक या बदमाश क्यों न हो , कहीं न कहीं झूठ बोलने वाले से कोई न कोई चूक जरूर हो जाती है, और सौ परों में से एक छोटा सा पर भी गिरकर पूरी कहानी को मटिया मेट कर देता है.

पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव का जुर्म कबूलियत का जो नया वीडियो जारी किया है और जिस लिखित क्षमा याचना का प्रचार कराया है उससे स्वत: ही यह सिद्ध हो गया कि पाकिस्तान की सभी दलीले बेबुनियाद हैं. क्योंकि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया ऐजन्सी कुलभूषण जाधव को ३ मार्च २०१६ को पकड़ कर गिरफ्तार करना बता रही है. जबकि अनिल कुमार धस्माना ने ३१ जनवरी २०१७ को दस महीने बाद “रॉ” के मुखिया का चार्ज सम्भाला है.

जिस समय पाकिस्तान ने जाधव को पकडा था उस समय धस्माना रॉ में थे ही नहीं तो फिर वह जाधव से जासूसी कैसे करा सकते हैं. अरे यह तो एक दम सफेद… सफेद… पक्का सफेद झूठ सिद्ध हो रहा है. जब धस्माना ने चार्ज लिया उस समय तो कुलभूषण पाकिस्तानी जेल में बन्द हो चुका था,  फिर भला पाकिस्तानी जेल में बन्द आदमी धस्माना के कहने से कैसे खुफियागिरी गिरी कर सकता है?

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