कश्मीर में समाप्त होने से पहले, भारत और भारतीयों से बड़ी कीमत लेगा आतंक

कल श्रीनगर में पाकिस्तान हितैषी मीरवाइज़ उमर फारूक जामिया मस्जिद के अंदर तकरीर कर रहा था और बाहर उसके पत्थरबाज़ समर्थक, मीरवाइज़ की सुरक्षा में लगे डिप्टी एसपी मुहम्मद अयूब पंडित को पत्थरो से कूंच रहे थे. यह एक सार्वजनिक हत्या थी, जो मीरवाइज़ के इशारे पर की गयी थी.

इस हत्या से जहाँ पूरे भारत मे रोष है, वहीं विपक्ष के राजनैतिक नेताओं ने लाश पर एक बार फिर अपनी रोटियां सेंकते हुये, जम्मू कश्मीर की पीडीपी और भाजपा की सरकार पर ही इस हत्या की ज़िम्मेदारी डाल दी है और एक बार फिर कश्मीर की असलियत से मुंह मोड़ने से कोई गुरेज़ नहीं रक्खा है.

खैर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से इससे ज्यादा कोई उम्मीद भी नहीं है क्योंकि यह सब, उनकी ही कश्मीर नीति का परिणाम है. जहां तक केंद्र की मोदी जी की सरकार और जम्मू कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार का मामला है, वह मेरी दृष्टि से, तमाम विरोधाभास के बाद भी, कश्मीर की घाटी को एक ऐसे रास्ते पर लाने में सफल हो गये है, जहां पर पाक समर्थित कश्मीरी नेताओं और आतंकवादियों को अब पुलिस और सुरक्षा बलों में कार्यरत कश्मीरियों को मारना पड़ रहा है.

अभी हाल में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट उमर फयाज़, जो कश्मीर अपने घर छुट्टी पर आये थे, उनका आतंकवादियों ने अपहरण कर के हत्या कर दी थी और उसके बाद जम्मू कश्मीर के 6 कश्मीरी पुलिस वालों को वीभत्स रूप से मार दिया गया था.

कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा हत्या करना नयी बात नहीं है लेकिन कश्मीर में पाक समर्थित आतंकवादियों द्वारा, सुरक्षा बलों में कार्यरत कश्मीरियों की हत्या करना ज़रूर एक नयी बात है.

यह कश्मीरियों की हत्याएं, स्पष्ट रूप से दर्शा रही हैं कि पाक समर्थित कश्मीरी नेता और आतंकवादी दोनों ही, भारतीय सरकार व सेना के शिकंजे में इस तरह फंसते जा रहे हैं, जहां उनके लिए यह आत्मघाती कदम उठाना मजबूरी हो गया है.

वैसे तो किसी की भी हत्या दुःखद होती है लेकिन खास तौर से आतंक से प्रभावित क्षेत्र में भारत और उसकी जनता की सुरक्षा में लगे लोगों की हत्यायें और भी दुःख देती हैं. परन्तु यह हत्याएं आवश्यक है.

मुझे पूरी उम्मीद है कि कश्मीर में अभी और इसी तरह से पुलिस व सुरक्षा बलों में कार्यरत कश्मीरियों की हत्याएं, पाकिस्तान समर्थित आतंवादियों और कश्मीरियों द्वारा की जायेंगी. यह हर एक हत्या, पाक समर्थित कश्मीरियों और आतंकवादियों को जहां कश्मीर की जनता से दूर करेगी, वहीं शेष भारत में धारा 370 का समर्थन करने वालों को रक्तरंजित जनप्रकोप का सामना करना पड़ेगा.

कश्मीर में यह हत्याएं बहुत जरूरी थीं, क्योंकि किसी भी आतंक से प्रभावित इलाकों से आतंकवादियों को वहां मिल रही स्थानीय सहायता पर तब तक विराम नहीं लग सकता है जब तक स्वयं वहां का जनमानस उनके द्वारा फैलाए गये आतंक से त्रस्त नहीं हो जाता है.

पंजाब में भी आतंक इन्ही कारणों से समाप्त हुआ था और कश्मीर में भी ऐसे ही होगा. लेकिन कश्मीर, भारत और भारतीयों से एक बड़ी कीमत लेगा.

यहां दोनों, पंजाब और कश्मीर में एक बड़ा अंतर यह है कि पंजाब के समय, यह सब जानते हुये कि पंजाब का आतंकवाद कांग्रेस की देन है, शेष भारत एक था. लेकिन कश्मीर में स्थिति दूसरी है, यहां सब जानते है कि यह कांग्रेस की देन है लेकिन इसी के साथ शेष भारत में 3 दशकों से पाकिस्तान परस्त और कट्टर इस्लाम परस्त वर्ग भी तैयार हो चुका है जो सैद्धान्तिक रूप से या तो कश्मीर को भारत से अलग किये जाने को स्वीकारता है या फिर इस्लाम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तहत वहां इस्लामिक शासन ही चाहता है.

जैसा कि मैं अक्सर लिखता रहा हूँ कि भारत के निर्णायक भविष्य का समय पास आता जा रहा है जो जहां समाधान और संभावनाएं लायेगा वही रक्तिम संघर्ष और कष्ट भी लायेगा.

2017 का वर्ष करवटें लेने लगा है और आगामी हर 6 माह नित्य नये-नये कलेवरों में भारत के भविष्य को और स्पष्टता देता जायेगा. हमें कीमत तो देनी ही होगी, मुफ्त तो मौत भी नहीं मिलने वाली है.

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