हरित क्रांति के दुष्परिणाम : आम जन से दूर हो गए स्वास्थ्यवर्धक मोटे अनाज

अन्न उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने के लिये 1966-67 में भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई. इसका श्रेय नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन बोरलॉग को जाता है.

चूंकि क्रांति एक जनप्रिय शब्द है और जनप्रिय शब्दों की खासियत होती है कि किसी भी कार्य, योजना का नाम इनसे जोड़कर रखने से आमजन में उसके स्वीकार्य की संभावनायें बढ़ जातीं हैं. लोग उसके नफे नुकसान का आंकलन करने की जहमत नहीं उठाते.

क्रांति शब्द बदलाव का द्योतक है… बदलाव लोगों को आकर्षित करता है… उस बदलाव के दूरगामी परिणाम अच्छे होंगे या बुरे, इस पर लोग दिमाग नहीं लगाते. तात्कालिक फायदा दूरगामी नुकसान की छवि धुंधली कर देता है.

हरित क्रांति के मामले में ऐसा ही हुआ. नॉर्मन बोरलॉग ने हरित क्रांति की शुरुआत की तो भारत ने भी बिना नफा नुकसान जोड़े घटाये, बगैर सोचे समझे इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया. आज इसके दुष्परिणाम हमारे सामने हैं.

मोटे अनाज जैसे जई, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, जौ एक आम भारतीय की थाली से पूरी तरह गायब हैं. अब हम सिर्फ चावल और गेहूं खाते हैं. इसमें भी वैराइटी गायब हैं.

गेहूं ज्यादा से ज्यादा सफेद, स्वादिष्ट आटा बनने वाला होना चाहिये, चावल ज्यादा से ज्यादा लम्बा, पतला, सुगन्धित होना चाहिये… उसका हमारे शरीर पर क्या अच्छा-बुरा असर पड़ता है, उससे मतलब नहीं रहा, हमें सिर्फ और सिर्फ स्वाद चाहिये.

वर्कआउट करने वाले और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने वाले लोग वही ब्राउन राइस खाते हैं जो धन के अभाव में प्रेमचन्द की कहानियों का गरीब किसान खाता था. इससे फैट नहीं बढ़ता. दिल की बीमारी, ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज़ की समस्या नहीं होती.

मोटे अनाजों में भरपूर फाईबर, प्रोटीन होता है जो कि शरीर की जरूरतों को पूरा करता है… जबकि गेहूं, चावल शरीर से ज्यादा जीभ की ज़रूरत पूरी करता है.

हरित क्रांति का लक्ष्य देश के सिंचित, असिंचित कृषि क्षेत्रों में संकर नस्ल के बौने पौधों के माध्यम से पैदावार ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना था. जेब के फायदे के लिये सेहत को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

प्रकृति के व्यवहार में गजब का सामंजस्य होता है. इसका अनुकूलन लाखों वर्ष की क्रमबद्ध परम्परा है जिससे छेड़छाड़ किसी भी रूप में नुकसनदायक है. प्रकृति के विरुद्ध जाकर छेड़छाड़ कर देना उपलब्धि नहीं आत्मघात है.

आज हर घर में दवा-दारू का खर्च बेहिसाब बढ़ गया है. कभी सोचा है हम बीमार पड़ते ही क्यों है? पहले के लोगों को ऐसी विलासी बीमारियां क्यों नहीं होतीं थीं? डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, हार्ट प्रॉब्लम हमारी विलासितापूर्ण जीवन शैली की ही उपलब्धि हैं.

पहले लोग ज्यादा तला, भुना, चिकना अफोर्ड नहीं कर सकते थे, गेहूं, चावल लक्जरी का प्रतीक था… सुबह जल्दी उठना, शाम को सात बजे तक खा पीकर सो जाना दिनचर्या थी…

मीलों पैदल चलना, साईकल चलाना जरूरत थी… स्वस्थ रहने का कारण थी… तब फर्जी बीमारियों पर पैसा फूंककर जिंदगी की वैलिडिटी बढ़ाते रहना सम्भव नहीं था… आज सम्भव है इसीलिये हम बेहिसाब तेल, मिर्च, मसाला खाकर उसे दवाओं से डाइल्यूट करने के कुचक्र में फंसे हैं.

हरित क्रांति के दुष्परिणाम हैं कि आज हमारे खेतों में गेंहू, धान के अलावा कुछ दिखता ही नहीं… मोटे अनाज महंगे हो रहे हैं…

भला हो योगी रामदेव का, कुछ देर से ही सही लेकिन लोगों को सजग करने आ गये… आज इलीट क्लास के लोग पतंजलि स्टोर से मोटे अनाज के पैकेट खरीदकर अपनी डाईट में शामिल कर रहे हैं.

अपने चारों तरफ लोगों को देखिये… बढ़ा हुआ पेट, लटकी छाती, पतले-पतले हाथ पैर… ये भोजन में असन्तुलन का ही नतीजा है… हम स्वास्थ्य और स्वाद में सामन्जस्य नहीं बैठा सके… यही हमारी हरित क्रांति की उपलब्धि है.

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