यह है राजनैतिक-वैचारिक दलितपन का चरम

रामनाथ कोविंद जी का नाम एनडीए से राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर सामने आने के बाद से ही विपक्ष उर्फ गिरोहों में दलित विमर्श जोरों पर है.

दलित विरोध कर नहीं सकते, लेकिन संघी, राष्ट्वादी दलित का विरोध पैदायशी वैचारिक डीएनए से ताल्लुक रखता है, सो भांति-भांति प्रकार की खालें ओढ़ के विरोध हो रहा है.

दलित विमर्श का एक एंगल देखिए :

दलित कोई जाति नहीं है, यह एक वर्ग भाव है, उस तबके का जो समानता के अधिकार से वंचित रहा. शोषित रहा, पीड़ित रहा, दबा रहा, कुचला रहा. ऐसे में राष्ट्रपति जैसे शीर्ष पद तक की रेस में लगा कोई व्यक्ति दलित कैसे? क्या उसे दलित कहना उचित होगा? इसलिए दलित के नाम पर राजनीति… गंदी बात.

सहमत… पूरी तरह सहमत हूँ यहां मैं गिरोहों उर्फ विपक्ष की बात से.

लेकिन यही तो आरएसएस प्रमुख श्री मोहन भागवत जी भी कहते रहे हैं :

जातिगत आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए. जो अवसर में समानता के इस संवैधानिक उपाय से… सामाजिक, आर्थिक प्रगति कर चुके उन्हें इसके दायरे से बाहर किया जाना चाहिए. नए पात्रों को इस दायरे में शामिल करना चाहिए.

भागवत जी के कथन और कोविंद विरोध करते हुए गिरोहों के कथन में क्या फर्क है?

लेकिन भागवत जी के समीक्षा की बात कहने पर गिरोह चीखते रहे हैं : यह आरक्षण खत्म करने की साजिश है.

आज खुद भागवत जी की बात को अपने मुंह से कह निकले गिरोह! यह राजनैतिक-वैचारिक दलितपन का चरम है.

कुंदनवा कहिता है : बे बबवा! देश में विपक्ष को राजनैतिक और दार्शनिक बाप नसीब हो गए हैं.

राजनैतिक पुरुष आदरणीय आडवाणी जी के प्रति प्रेम देख : दार्शनिक पुरुष मोहन भागवत जी की बात गिरोहों के मुंह से सुन.

बधाई हो देश के राजनैतिक और दार्शनिक-वैचारिक विपक्ष : आज तुम संघियों की भाषा बोल रहे हो, संघी पुरुष के राष्ट्रपति उम्मीदवार न होने पर मुहर्रम कर रहे हो.

इतिहास से लेकर आज तक… राष्ट्रवाद दलित समर्थक है : बाकी सभी दलित विरोधी हैं, तथाकथित मनुवादी हैं, सामंत हैं.

बोल बबवा : नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे “दलितं” वर्धितोहम्.

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