यह क्या हाल बना रखा है, कुछ छोड़ते क्यों नहीं?

भारत से लौटा हूँ, तब से एक बात बहुत खटक रही है… जिसे देखो, उसका पेट निकला हुआ है. पहले हम समझते थे, मोटे लोगों का पेट निकलता है. अभी देखता हूँ, दुबले पतले लोगों का भी पेट निकल आता है.

खुद बहुत चिंतित हुआ, मेरा पेट भी थोड़ा निकल आया था. घर पर तीन भरपूर भोजन होता है… सुबह का नाश्ता, दोपहर को दबा कर दाल-भात और उसके बाद एक मीठी झपकी… शाम की चाय-पकौड़ी के बाद भरपेट रात का खाना…

खुराक पर लगाम लगाई… दिन में एक समय का भोजन छोड़ ही दिया हूँ. नाश्ता करता हूँ तो दोपहर का खाना छोड़ देता हूँ. या दोपहर का खाना खाना है तो नाश्ते से बच लेता हूँ. एक्सरसाइज तो एक मानसिक विलास ही है… किसी दिन पंद्रह मिनट कर पाता हूँ, तो तीन दिनों तक उसी का यूफोरिया रहता है…

दुख होता है देख कर… भारत एक अस्वस्थ देश हो गया है… अस्वस्थ आदतों का देश. हमारी पहली पीढ़ी है जब मिडिल क्लास का मुख्य खर्च रसोई का खर्च नहीं है. अब ज्यादातर घरों में तेल की राशनिंग नहीं है.. चीनी पर निगरानी नहीं है.

यह जो नई सम्पन्नता आई है, साथ में सम्पन्न आदतें नहीं आयी हैं. सड़कों पर दौड़ता कोई दिख जाए तो पागल ही गिना जाएगा. साईकल आज भी गरीब लोगों की सवारी ही है. 15-16 साल के लड़के भी खेलते नहीं दिखे. ब्यूटी पार्लर जाने वाली लड़कियाँ भी जिम जाती नहीं दिखीं. ब्यूटी पार्लर हर कॉलोनी में खुल गए हैं… जिम और खेल का वह कल्चर नहीं आया है. लड़कियाँ भी बदन बनाये लड़कों से नहीं पट रहीं, IT वालों पर फिदा हैं.

हमने योग को योगा बना दिया, यूएन तक पहुंचा दिया. अरब के शेखों को कपालभाति करवा दिया… पर खुद की ओर नहीं देख रहे… ये दुबले पतले हाथ पैर के साथ यह गोल मटकी लटका रखी है… यह क्या हाल बना रखा है? कुछ लेते क्यों नहीं?

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