भारत में कम्बोडिया के ‘किलिंग फील्ड्स’ बनाने में जुटे ये वायरस

1917 में रूस में ‘साम्यवादी क्रांति’ हुई थी और विश्व में पहली बार एक सर्वहारा वर्ग की ‘साम्यवादी सरकार’ का गठन किया गया था. पूरी दुनिया के प्रगतिवादियों, मजदूरों, श्रमिकोण और बुद्धिजीवियों ने इस क्रांति को सहस्त्राब्दी (1000साल) की सबसे महान घटना बताया.

2017 में उस क्रांति को हुए 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं. आम नागरिकों, शोषितों, वंचितों के नाम पर खड़ी हुई विचारधारा को देखकर लगा कि अब पूरी दुनिया में समाजवाद आने ही वाला है.

दुनिया के कई समाज और देश इस विचारधारा के झांसे में आ गये और कई देशों में साम्यवादी क्रांति कर कम्युनिस्ट सरकारों का गठन हुआ पर सरकार बनने के बाद इस विचारधारा ने ऐसे-ऐसे कारनामे किये और साम्यवादी समाज की स्थापना के नाम पर ऐसे क्रूर और जल्लाद तानाशाह दुनिया को दिये जिनके कारनामे सुनकर पूरी दुनिया दहल गयी.

1950-60 के दशक में कम्बोडिया के एक निजी स्कूल में इतिहास, भूगोल और साहित्य के एक शिक्षक थे जिनका नाम था- ‘सलोथ सार’ जो बाद में पूरी दुनिया में पोल पॉट के नाम से जाने गये. वे स्कूल के छात्रो में काफी लोकप्रिय थे उस समय उनकी राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी.

संयोगवश एक बार वे अपने अध्ययन कार्य के सिलसिले में फ्रांस गये जहां उनका परिचय ‘स्टालिनिस्ट कम्युनिस्ट पार्टी’ से हुआ और वे उस पार्टी में शामिल हो गये. पार्टी में रहते हुऐ उन्होने ‘मार्क्सवाद’ का अध्ययन किया और वे ‘मार्क्स’ के ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ से इतने प्रभावित हुए कि उनके जीवन का पूरा दर्शन ही बदल गया.

1953 में वे कम्बोडिया वापस लौटे, पर लौटने वाला यह शख्स साहित्य का मासूम और कोमल हृदय शिक्षक नहीं बल्कि एक कम्युनिस्ट विचारधारा में डूबा हुआ एक ऐसा व्यक्ति था जो अपने देश के सारे इतिहास की धारा को ही पलटने के संकल्प को मन में लेकर आया था.

उन्होंने आते ही कम्बोडिया के कम्युनिस्ट आंदोलन में भाग लिया. पोल पॉट ने कम्बोडिया में एक गुरिल्ला फोर्स का गठन किया और देश के उत्तर पूर्वी जंगलो में कैंप बनाया जिसे कि वियतनामी कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाको का संरक्षण मिला हुआ था. 1966 में वे चीन गये जहां उनको राज्य को वर्गरहित और साम्यवादी समाज बनाने की नयी प्रेरणा ‘माओवादी’ दर्शन से मिली.

1970 में कम्बोडिया के शासक सिंहानुक को अमेरिकी समर्थन से “लोन नोल” ने हटा दिया और सिंहानुक को आगे रखकर 1975 में पोल पॉट ने लोन नोल को हटा दिया.  घाघ कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाके पोल पॉट ने एक तीर से अनेक शिकार कर डाले और एक साथ ही सिंहानुक, लोन नोल, अमेरिका और वियतनाम को कम्बोडिया से उखाड़ फेंका. पोल पॉट के संगठन “खमेर रूज” ने पूरे देश पर नियंत्रण कर लिया.

इसके बाद पोल पॉट ने एक ‘ऊंची छलांग’ लगाई यानि कम्बोडिया को विशुद्ध कम्युनिस्ट राष्ट्र बनाने की शुरूआत. पोल पॉट ने फ्रांस और चीन में ‘मार्क्सवाद’ और ‘माओवाद’ की जो शिक्षा ग्रहण की थी उसके आधार पर उन्होंने कम्बोडिया में ‘शून्य वर्ष’ घोषित कर दिया.

पोल पॉट गुरिल्ला युद्ध के दौरान जंगलो में रहे जहां वे कम्बोडियाई आदिवासियों के सम्पर्क में आए. आदिवासियों को पैसे और शहरी जीवन की कोई आवश्यकता नहीं थी. पोल पॉट उनसे बहुत प्रभावित थे. पोल पॉट ने सत्ता सम्हालते ही शहरों को खाली करने का आदेश जारी कर दिया. पूर्व “लोन नोल” सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों का खुलेआम बर्बरतापूर्वक कत्ल कर दिया गया.

बुद्धिजीवियों, उद्योगपतियों और सरकारी कर्मचारियों को खेतों में काम करने के लिये भेज दिया गया. जिन्होंने विरोध किया उनको उन्ही खेतो में तब तक पीटा जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गयी.

पोल पॉट ने अपने परिजनो को भी नहीं छोड़ा. उन्होने अपने दो भाइयों और एक भाभी को भी राजधानी से निकालकर इन खेटन में काम करने के लिये भेज दिया. इस दौरान पोल पॉट के बड़े भाई ‘सैलोथ छाय’ रास्ते में ही मारे गये.

पोल पॉट के कम्युनिस्ट संगठन खमेर रूज ने निजी धन, वाणिज्य और पारम्परिक शिक्षा समाप्त कर दी. पारिवारिक रिश्तों, व्यक्तिवाद, बुद्धिजीवियों और जातीय समूहों का बर्बरतापूर्वक दमन कर दिया गया. उनके शासन में धर्म और आस्था की इजाज़त नहीं थी.

लाखों लोग भुखमरी, बीमारी, बेगारी और मौत की सज़ा के कारण मारे गए. जिन खेतों में शहरी नागरिकों को काम करने भेजा था वहीं उनकी मृत्यु हो गयी. खेतों में शव यूं ही पड़े रहे बिना अंतिम संस्कार के. खमेर रूज के अत्याचारों की वजह से कम्बोडिया की 21% जनसंख्या खेतों में ही मारी गयी और शवों के ढेर लग गये. पूरी दुनिया में ये खेत ‘किलिंग फील्ड्स’ के नाम से कुख्यात हो गये.

इस दौरान वियतनाम ने खमेर रूज के विरूद्ध युद्ध छेड़ दिया. वियतनाम की सीमा पर संघर्ष के लंबे दौर के बाद वियतनामी सेना ने आखिरकार 1979 में ख़मेर रूज को सत्ता से बेदखल कर दिया.

1979 से 1997 के दौरान पोल पॉट अपने पुराने खमेर रूज के बचे हुए सहयोगियों के साथ अपनी गतिविधियों को कंबोडिया और थाईलैंड, के सीमा क्षेत्र से संचालित करते रहे और जहां, वे पुन: सत्तासीन हो गये साथ ही संयुक्त राष्ट्र ने उनकी सरकार को कंबोडिया की वास्तविक सरकार के रूप में मान्यता भी प्रदान कर दी.

1998 में खमेर रूज के एक गुट “टा मॉक” ने उनको बंदी बना लिया और उनको नजरबंद कर दिया. नज़रबंदी के दौरान पोल पॉट की मृत्यु हो गयी. यह अफवाह भी चली कि उन्हें जहर देकर मारा गया था पर आज तक इसका निराकरण नहीं हो पाया है.

कम्बोडिया में वर्तमान में जापान की तरह राजशाही + लोकतांत्रिक संसदीय सरकार है और पोल पॉट दुनिया छोड़कर चले गये है पर कम्बोडिया के लोग आज भी उस ‘कम्युनिस्ट दौर’ को याद कर सिहर उठते है.

भारत में भी आज एक बड़ा वर्ग ‘मार्क्सवाद’ के वर्ग, पूंजी और धर्म रहित, समाज की स्थापना के सपने देख रहा है. जेएनयू से लेकर बस्तर तक और केजरीवाल से लेकर केरल तक ये ‘मार्क्सवादी वायरस’ पूरे भारत को कम्बोडिया के “किलिंग फील्ड्स” में बदलने के सपने रात दिन देख रहे है.

केरल की कम्युनिस्ट सरकार ‘साम्यवादी विचारधारा’ के विरोधियों को आज भी ठीक वैसे ही कत्ल कर रही है जैसे पोल पॉट ने कम्बोडिया में ‘खमेर रूज’ के विरोधियों को खत्म किया था.

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