पढ़ना तो यही है : ‘लज्जा’ पढ़ने में लज्जा कैसी!

इतवार का दिन फुरसत का है, बीवी की डांट सुनकर कपड़े धोने या कोई नया व्यंजन बनाने का है, तो आज हम पढ़ने की अपनी दूसरी ‘डेट’ में हल्की-फुल्की किताब बताने जा रहे हैं (महज शैली और कथ्य की दृष्टि से).

जब केरल में कांग्रेसियों और कौमियों ने मिलकर सरेशाम गाय काटी थी, तब भी मैंने और मित्र आनंद कुमार ने सोचा था कि हम हरेक दिन कौमियों-कांग्रेसियों का बनाया एक कानून तोड़ेंगे, क्योंकि इन्होंने सरेआम गोवध कर कानून तो तोड़ा ही था.

यह किताब कौमियो-कांग्रेसियों ने प्रतिबंधित कर रखी थी (शायद अभी भी हो), क्योंकि यह मोहम्मडन राज के कु-परिणामों को पूरी मुखरता से बयान करती है. इस किताब के लिखने के बाद ही तस्लीमा नसरीन को वतन-बदर होना पड़ा, एक बार हैदराबाद में मोहम्मडन कट्टरपंथियों ने उनकी जमकर पिटाई भी की और ममता बानू ने उनको कोलकाता में शरण देने से भी इंकार कर दिया.

किताब की शैली साधारण है, लगभग डायरी शैली में लिखी यह किताब कथ्य की दृष्टि से भी कोई असाधारण नहीं है, लेकिन इसकी साधारणता में ही यह लोकप्रियता और असाधारणता के नए आयाम छूती है.

किताब में इसका विशद वर्णन है कि 1947 में लगभग 15 फीसदी हिंदुओं की आबादी वाला बांग्लादेश जो भारत की सहायता से ही स्वतंत्र भी हुआ, किस तरह केवल इस्लाम के नाम पर इतना कट्टर हो गया कि वह पाकिस्तानी फौजों की दरिंदगी औऱ क्रूरता भी भूल गया, जहां आज शरीयत का राज है और हिंदू शायद 1 फीसदी से भी कम. वह भी दोयम क्या तिरहम दरजे के नागरिक हैं.

तो, पेश है तस्लीमा नसरीन लिखित लज्जा. यह अमेज़न से लेकर फ्लिपकार्ट तक पर उपलब्ध है, अच्छी बात यह है कि कई भारतीय भाषाओं, यथा मराठी, तेलुगु, बांगला के साथ हिंदी में तो है ही. 150 रुपए से लेकर 400 रुपए तक की इसकी कीमत है….. तो, पढ़िए और राय कायम कीजिए…

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